Friday, August 7, 2015

भारत में 4-5 तरह की अघोषित पोर्न और भी चलती हैं!


समाज को प्राइवेट पोर्न की अपेक्षा सार्वजनिक पोर्न ज्यादा झिकझोरता और शर्मशार करता है। और दुर्भाग्य व् दंश तो यह है कि यह पोर्न हमारी संस्कृति व् धार्मिक विरासत हमें दिखाती है अथवा परोसती है। इसके कुछ प्रकार इस प्रकार हैं!

1) देवदासी पोर्न: दक्षिण से ले मध्य भारत के मंदिरों में इसकी झलक देखने को मिलती है। इनकी दृष्टता और उददण्डता का आलम इतना है कि इसके विरुद्ध कानून बनने पर भी यह विद्यमान है। 'देवदासी' कीवर्ड से गूगल करने पे दर्जनों ऐसे किस्से उभर के आते हैं, जो बताते हैं कैसे आज भी प्राचीन काल की तरह दलित की बेटियों को देवदासी बना मंदिरों में रखने का दस्तूर बदस्तूर जारी है। बॉलीवुड ने इसपे 'चिंगारी' जैसी फिल्म बनाई है।

कितना बड़ा विरोधाभाष है कि दलित-शूद्र को अछूत-नीच-तुच्छ कहके, उनसे दूर रहने और घृणा करने वाले ही, दलितों की बेटियों को मंदिरों में देवदासी बना के भोगते आये हैं| मुझे नहीं लगता कि विश्व में धूर्तता और पाखंडता का इससे घिनौना रूप कोई और हो सकता है|

2) लड़की के पहली बार कपड़े आने पे मंदिर में सामूहिक दावत पोर्न: 2001 में आई 'माया' फिल्म में इस सामूहिक पोर्न की भयावहता को बड़ी बारीकी से उकेरा गया है। उड़ीसा-तेलंगाना-छत्तीसगढ़ की तरफ यह आज भी अंदरखाते जारी है, जिसकी कि 'माया' जैसी फिल्म पुष्टि करती हैं। इसके तहत जब लड़की के प्रथम बार कपड़े आते हैं तो मंदिर के पुजारी मंदिर के उसी गृभगृह में जहाँ ऐसी अवस्था में औरत का जाना वर्जित बोला जाता है, वहीँ पर सामूहिक बलात्कार करते हैं और उसी वक्त मंदिर के प्रांगण में लड़की के घरवाले समाज को भोज छका रहे होते हैं।

3) विधवा पोर्न: भारत में आज भी कुछ ऐसे समाज हैं जो विधवा औरत को दूसरे विवाह की चॉइस या उसके दिवंगत पति की सम्पत्ति पर उसको उसकी इच्छापूर्वक बसने देने की अपेक्षा उसको इन सबसे बेदखल कर विधवा आश्रमों में भेजते हैं। इन आश्रमों में धार्मिक और राजनैतिक लोग इन विधवाओं को वेश्याओं की तरह भोगते हैं। बॉलीवुड की 'वाटर' फिल्म इस तथ्य पर गहनता से प्रकाश डालती है। धन्य हो मेरे पुरखों का और समाज का कि मैं ऐसे समाज से आता हूँ, जहाँ विधवा भी कालांतर से अपनी इच्छ्पूर्वक जीवनयापन कर सकती हैं।

4) नागा-पोर्न: जैसा कि सब जानते हैं कि हमारे देश ही नहीं अपितु पूरे विश्व में 18 साल से कम के वयस्कों को पोर्न दिखाना, देखने देना व् उनके आगे अश्लील प्रदर्शन करना कानूनी अपराध है। और इसीलिए गए ज़माने तक नागा साधु और इनके अनुयायिओं को सामाजिक प्रदर्शन और प्रवेश की अनुमति नहीं रही है। परन्तु पिछले एक-दो दशक से देखने में आ रहा है कि ना तो टीवी वाले और ना खुद बाबा लोग इस कानून का पालन कर रहे हैं। टीवी वाले इनको मीडिया कवरेज दे घरों में माँ-बापों के लिए अपने बच्चों को इनसे दूर रखने में मुशिकलें पैदा कर रहे हैं तो खुद साधु लोग अपनी इस मर्यादा को तार-तार कर, भारतीय कानून को भी खुल्लेआम ठेंगा दिखा रहे हैं।

5) माता-राणी के जगरातों में भक्ति के नाम पर अशक्ति पोर्न: अभी जुलाई 2015 में आई 'गुड्डू-रंगीला' फिल्म में देखने को मिलता है कि खुद जगराता गाने वाला प्रसाद देने के नाम पर कैसे होस्ट के घर में घुस घर की महिला से अश्लील हरकत करता है। तो ऐसे में धर्म के नाम पर कामुकता और पोर्न फैलाने वालों को सिर्फ सरकार को ही नहीं वरन ऐसे लोगों को बुलाने और बढ़ावा देने वालों को भी सोचना होगा कि आप यह कौनसी संस्कृति और धर्म समाज में फैला या फैलवा रहे हैं।

और यही वजह है कि भारत में जहां भी साधु-साध्वियों के ऐसी गतिविधियों में विलीन होने के किस्से आ रहे हैं, उनके पीछे यह ऊपर बताये तत्व कारक की भांति कार्य करते हैं। उनको साहस और कई बार तो प्रेरणा तक देते हैं।

शुक्र है कि उत्तरी-पश्चिमी (मुख्यत: पंजाब-दिल्ली-हरयाणा-पश्चिमी उत्तरप्रदेश) भारत में यह प्रथाएं नगण्य हैं, परन्तु कब तक? जिस वेग और निष्ठा से लोग अंधभक्त और विवेकहीन बनते जा रहे हैं अथवा बनाये जा रहे हैं, उससे तो यही लगता है कि वो दिन दूर नहीं जब उत्तरी-पश्चिमी भारत भी इस नागपाश से नहीं बचा होगा।
समाज को याद रखना होगा कि समाज धर्म की दिशा से नहीं चलते, वो सामाजिक दिशा से चलते हैं। धर्म जहाँ व्यक्तगित मसला होता है, वहीँ समाज सार्वजनिक मसला।

जय यौद्धेय! - फूल मलिक

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