गीता प्रेस गोरखपुर के द्वारा छापी गई रामचरित मानस के दोहे
"शुद्र ग्वार ढोल और नारी
ये सब ताड़ना के अधिकारी "
के ताड़ना शब्द का अर्थ 1925 में 'दण्ड" व 2025 में "शिक्षा " क्यों और कैसे हो गया?
अपने कल्चर के मूल्यांकन का अधिकार दूसरों को मत लेने दो अर्थात अपने आईडिया, अपनी सभ्यता और अपने कल्चर के खसम बनो, जमाई नहीं!
गीता प्रेस गोरखपुर के द्वारा छापी गई रामचरित मानस के दोहे
"शुद्र ग्वार ढोल और नारी
ये सब ताड़ना के अधिकारी "
के ताड़ना शब्द का अर्थ 1925 में 'दण्ड" व 2025 में "शिक्षा " क्यों और कैसे हो गया?
यहूदी कयामत तक भटकते ही रहेंगे इनको कोई अपनी जमीन में रहने नही देगा ये इतने नाशुर हे जहा भी रहे हे इन्होंने उत्पात ही मचाया है!!
"चलीये देखते है यहूदियों ने 1000 वर्षों कितनी जंग जीती है ?? "
1080 में फ्रांस से भाग गए
1098 में चेक रिपब्लिक से भाग गए
1113 में क्यूवान रूस से बाग निकले ,
1113 ही में इनका कतले आम हुआ ,
1147 में एक बार फिर फ्रांस से निकल दिया गया ,
1171 में इटली से भाग गए ,
1188 में इंग्लैंड से निकल दिया गया
1198 में इंग्लैंड से भाग निकले ,
1290 इंग्लैंड से भाग निकले ,
1298 में स्विट्जरलैंड से भाग निकले जब 100 यहूदियों को फांसी दी गई ,
1306 में एक बार फिर फ्रांस से दे दखल किए गए ,300 यहूदियों को जिंदा जलाया गया ,
1360 में हंगरी से भाग निकले ,
1391 में स्पेन से निकाला गया 3000को फांसी 5000 को जिंदा जलाया गया ,
1394 में फ्रांस से एक बार फिर भाग निकले ,
1407 पोलैंड से भाग निकले ,
1492 में एक बार फिर स्पेन से भगाया गए इनके लिए हमेशा की पाबंदी लगाई गई ,
1492 में सिसली से बे दखल किया गया ,
1495 में लिथुआनिया से निकाले गए
1496 पुर्तगाल से भाग निकले ,
1510 में इंग्लैंड से भाग निकले ,
1516 में दुबारा पुर्तगाल सै निकल गए ,
1516 में सिसली में कानून बनाया गया यहूदी केवल यहूदी बस्तियों में ही रहेंगे ,
1524 में ऑस्ट्रिया से भाग निकले ,
1555 में फिर पुर्तगाल से भगाया गया ,
155 में रोम में कानून बना जिसमें इनको अपनी ही बस्तीयों में रहने की इजाजत मिली ,
1556 में इटली से निकले गए ,
1570 में जर्मनी से निकाल दिया गया ,
1629 में स्पेन और पुर्तगाल से भगाया गया ,
1634 में स्विट्जरलैंड से फिर भगाया गया ,
1655 में एक बार फिर स्विट्जरलैंड से भगाया ,1660 में कीफ से निकाला गया ,
1701 में स्विट्जरलैंड हमेशा के लिए निकाल दिया गया,
1806 में नेपोलियन का अल्टिमेटम,
1828 में कीफ से भाग निकले ,
1933 में जर्मनी से निकले वहां नस्ल कसी की गई इनकी ,
14 मई 1948 को फिलिस्तीन ने अपने मुल्क में यहूदियों को पनाह दी ,
इसके अलावा सबसे पहले रसूल अल्लाह ने खुद यहूदियों को शहर से निकाल दिया ,ये यहूदी की तारीख है जिसे आप खुद भी पढ़िए और दूसरों को भी शेयर कीजिए ,,ये दुनिया की अकेली ऐसी कौम है जो जमीन पर आलम ए इन्सानियत के नाम पर कलंक है !
इस कहावत में 'जट्ट' शब्द ही क्यों है, जानने हेतु अंत तक पढ़ें!
जो अन्तर्जातीय विवाह को ये कहकर बेहतर बताते है कि ये diversity बढ़ा कर better genes देता है वो facts को manipulate कर रहे है। genetic depression 2 तरह के होते है 1. ज्यादा नजदीक शादी करने से होने वाला inbreeding depression जिस से बचने के लिए हम गोत छोड़कर शादी करने की
नख-वख कुछ नहीं होता है; राजपूत राजाओं के इशारों पर, भाटों ने तुम्हारे अनपढ़ पुरखों का faddu काट दिया।
वैसे तुम तो तुम्हारे अनपढ़ पुरखों से भी अधिक अनपढ़ हो, इसीलिए तुमने नखों की कहानियों के आधार पर अपनी झूठी कुलदेवियाँ खोजनी शुरू कर दी।
वैसे “नख” क्या होता है?
राजपूत जाति की सामाजिक सरंचना सात पदानुक्रमों में बंटी हुई है:
१) *जाति* : राजपूत
२) *वंश* : सूर्यवंश, चंद्रवंश, ऋषिवंश, अग्निवंश, नागवंश
३) *कुल* : छत्तीस कुल, जिनकी वास्तविक संख्या अठतरह से ऊपर है (बिंगले)
४) *साख* : प्रत्येक राजपूत कुल कई साखों में बँटा हुआ है
५) *गोत्र* : प्रत्येक राजपूत साख का एक ऋषिगोत्र होता है
६) *खाँप* : प्रत्येक राजपूत साख कई खाँपों में बँटा हुआ है
७) *नख* : प्रत्येक राजपूत खाँप कई नखों में बँटी हुई है
अब आपको एक उदाहरण देता हूँ:
जयमल मेड़तिया का पूरा नाम इस प्रकार लिखा गया: जयमल, राजपूत (जाति), सूर्यवंशी (वंश), राठौड़ (कुल), कामधज (साख), गोतम (गोत्र), मेड़तिया (खाँप), विरमदेवोत (नख)।
तो फिर अन्य जातियों के नख कैसे हुए? - भाट की बही में कहानी इस प्रकार के टेम्पलेट में लिखी हुई है: एक बार एक राजपूत था, उसने किसी पराई जाति की महिला का डोला लूट लिया। उस महिला से होने वाली संतानें अपनी माता की जाति में शामिल हो गए। माता की जाति में क्यों? क्योंकि हिन्दू शास्त्रों में प्रतिलोम विवाह अमान्य है, इसीलिए वो राजपूत उस महिला को पत्नी का दर्ज़ा नहीं दे सकता था, इसीलिए वो महिला उसकी रखैल मात्र थी। रखैल की संतानें अपनी माता की जाति में ही शामिल हो सकती हैं।
कभी नॉर्मन ज़िगलर, रिचर्ड सरन इत्यादि को पढ़ो। कभी नैणसी की ख्यात और विगत पढ़ो। कुञ्जियों को पढ़ने से कुछ नहीं समझ आएगा। - Shivatva Beniwal
हरियाणा की पहली विदेशी बहू महारानी ओलिव
गठवाला खाप एकता का सबूत !!दादा घासीराम मलिक और चौधरी छोटूराम के आपस में घनिष्ठ संबंध थे।19 फरवरी 1868 को दादा घासीराम हुए,1881 में चौधरी छोटूराम पैदा हुए थे दादा घासीराम 13 साल बड़े थे ,उम्र में बड़े सर फजले हुसैन,सेठ छाजुराम लांबा,दादा घासीराम मलिक को चौधरी छोटूराम काका जी(चाचा जी) कहा करते थे। चौधरी साहब को नेता बनाने दादा घासी का बड़ा सहयोग था,वो सोनीपत में आयोजित लाख की भीड़ वाली धन्यवादी पंचायत थी जब पंजाब सूबे में यूनियनिस्ट पार्टी भारी बहुमत से विजई घोषित हुई थी चौधरी छोटूराम भी चुनाव जीत गए थे इस अवसर पर गठवाला खाप ने सोनीपत जिले में किसानों की ओर सम्मानित करने के लिए लगभग सभी जीते हुए उम्मीदवारों को बुलाया था,लाहौर से प्रधानमंत्री सर चौ फ़जले हुसैन (तिवाना मलिक)मुख्य अतिथि के रूप में पधारे।वे पंचायत में आ तो गए थे लेकिन उनका मन आशंकित,संशय, पसोपोस में था कहीं कोई ऐसी वैसी बात ना हो जाए जिससे नई नई यूनियनिस्ट पार्टी या उनकी छवि को नुकसान हो,ऊपर से कुछ कोस पर दिल्ली अंग्रेज वायसराय भी बैठा पंचायत पर अपनी पैनी नजर गड़ाए हुए था उसने डीसी सहित प्रशासन को हाई अलर्ट मोड पर रख दिया था ऐसे में खुशी के साथ साथ आयोजन की सफलता को ले कर तनाव की स्थिति बन चुकी थी मानो पूरे देश की निगाह इस पंचायत पर टिकी थी।जैसे जैसे आयोजन तिथि का समय नजदीक आता गया सरगर्मियां तेज हो गई सबमें यही कौतूहल था कि देखो अब क्या होता है,दादा घासीराम मलिक बेशक कम पढ़े लिखे थे मगर वे बहुत ही कढ़े हुए व्यक्तित्व थे।उन्होंने धैर्य से काम लिया और सबसे पहले सोनीपत पुराने रोहतक की सभी खापों को भी शामिल होने का आह्वान किया,नतीजे में दहिया,खत्री,अंतिल,हुड्डा सहित छोटी बड़ी सभी खापों के चौधरी भी सक्रिय हो चले। गठवालो ने भी अपनी अपनी ड्यूटियां बांट ली,हजारों बिछाने वाले खरड़,दरीयां,शामियाने इकट्ठा किए गए।लाखों आदमियों के भोजन के लिए क्विंटलों अनाज,दूध,घी इकट्ठा किया गया लगभग हर कुढ़ी,हर ढोले ,हर घर ने स्वेच्छा से अपना सहयोग किया। हजारों हुक्का पानी पात सहित जमा किए गए।लगभग 500 हलवाई,दस हजार कार्यकर्ता रहे होंगे जिन्होंने युद्ध स्तर की तैयारियों के बीच दिन रात कड़ी मेहनत से मोर्चा संभाला।आने वाले हर दस व्यक्तियों पर सेवा पानी के लिए एक आदमी तैनात था। गठवाला खाप की समस्त सरदारी, तपे, थांबे का आर्थिक ब्योंत इतना था कि बाहर वाले से किसी से कोई मदद नहीं ली गई।पंचायत का दिन आया तो सबको खाना खिला कर पंचायत शुरू हुई अध्यक्षता खुद दादा घासीराम कर रहे थे उनका निर्देश लेने के लिए सैकड़ों युवा करबद्ध खड़े थे जो दादा के आंख के इशारे को तुरंत पढ़ लेते और जो भी कमी रहती पूरा कर देते।आम पंचायत की जगह मंच को D की तरह बनाया गया था जो लगभग 12/15 फुट ऊंचा था सैकड़ों बड़े बड़े धुत्तू लाउडस्पीकर लगे हुए थे पंचायत की भीड़ बिल्कुल शांत,एकचित,अनुशासित थी क्योंकि दादा जी ने कह दिया था कि यह पंचायत आप लोगों की है आपके लिए ही है इसीलिए अनुशासन की जिम्मेवारी भी आप सभी की है।पूरे मान सम्मान के साथ दोपहर बाद तक सभी वक्ता बोले,प्रधानमंत्री फजले हुसैन व चौधरी छोटूराम सहित सभी गणमान्यों को ऊंट घोड़े हाथियों ढोल नगाड़ों के साथ खुले रथ पर बैठा कर लाया गया मांग व प्रस्ताव दिए गए,शांति से पंचायत चली अब *अंत में बोलने की बारी वयोवृद्ध फजले हुसैन की आई जिनका रुतबा की शहंशाह से कम नहीं था,जब वे बोलने लगे तो बोला नहीं गया गला रुंध गया,भावनाएं उमड़ पड़ी और उनकी आंखों से झर झर नीर बहने लगा तभी उनको पानी दिया गया और संयमित हो कर बोले मैं तो पूरे पंजाब में अपनी दाढ़ी को बड़ी मानता था लेकिन महानता के काम में लगी हुई मेरे से बड़ी एक नहीं तीन तीन दाढ़ियां यह पंचायत में बैठी हैं पहली दाढ़ी दादा घासीराम की दूसरी कप्तान टोडर सिंह मलिक की जिसने ये व्यवस्था संभाली तीसरी भगत फूल सिंह मलिक की जिन्होंने इस पंचायत को इतिहास में अमर कर दिया वास्तव में जैसा सुना था उससे कई गुना पाया।लोगों बोलो मैं तुम्हारा क्या काम करूं?तब दादा घासी राम ने कहा था कि म्हारे छोटू को मंत्री बना दे फेर काम तो हम आप ही इससे कढ़वा लेंगे,फजले हुसैन ने तब पहले चौधरी छोटूराम को कश्मीर का प्रधानमंत्री बनाने की बात कही इस पर लोगों की भावनाएं देख चौ छोटूराम ने हाथ हिला कर इनकार कर दिया इसके बाद उन्होंने चौधरी छोटूराम को पंजाब का माल मंत्री घोषित कर दिया और बोले लाहौर आ कर शपथ ले कर अपना काम संभाल ले और फटाफट इन किसानों की सारी मांगे मान कर अपना किया वायदा पूरा कर।मलिकों की अगुवाई की इस पंचायत ने ही चौधरी छोटूराम को नया आयाम स्थापित करने में मदद की।मेरे प्रिय साथियों आज देश आजाद है किसानों की कितनी मांगे आजाद भारत की सरकारें पूरा कर रही हैं यह आपको अच्छी तरह पता है ऐसी बेकद्री कभी नहीं देखी लेकिन इतिहास गवाह है चौधरी छोटूराम के समय में किसी किसान ने भूख हड़ताल, अनशन, आंदोलन, मार्च तो दूर मांगपत्र भी नहीं दिया यहां तक कि किसान अपने खेत खलिहान घर से बाहर भी नहीं निकला था सिर्फ अपनी अंतर्रात्मा की आवाज पर किसान का बेटा होने के नाते दर्द समझ कर एक नहीं पूरे 29 कानून बना डाले उसको पूरा हक दे दिया। यहां तक कि किसान के गेहूं का दाम बढ़वाने को ले कर वायसराय तक से भिड़ गया।ऐसी सोच के पीछे उनके साथ सहयोगी रहे दादा घासीराम मलिक का परामर्श बड़ा काम आया था।इसीलिए तो आज हम कहते हैं इस धरती पे फेर दुबारा पैदा चौधरी छोटूराम घासी राम करदे। इतिहास से जुड़ी पोस्ट अच्छी लगे तो ना जानने वाले भाइयों को जरूर शेयर करना मत भूलना।
आपका प्रिय जसबीर सिंह मलिक
बहुत सारे लोगों को इस बात की शायद ही जानकारी हो कि मारवाड़ आँचल में जाट के बिना ब्राह्मण, राजपुरोहित और राजपूत लड़कियों का विवाह अधूरा हैं।
मात्र किसान शब्द सोच-समझ के इस्तेमाल किया करो:
आज सर छोटूराम निर्वाण दिवस विशेष:
*सर छोटूराम को भी 'किसान मसीहा' नहीं अपितु 'दीनबंधु' व् 'जमींदारी-उत्थानक' तरीके से शब्द ज्यादा सूट करेंगे; वह कैसे यह नीचे समझें:*
क्योंकि एक तो आप जो वेस्ट-यूपी-हरयाणा-पंजाब-उत्तरी राजस्थान में जो खेती-बाड़ी वाले हो; आप सिर्फ किसान नहीं अपितु उसके साथ साथ जमींदार भी हो!
दूसरा इसलिए क्योंकि बिहार-बंगाल-उड़ीसा साइड 'किसान' उसको कहते हैं जो जमींदार के यहाँ हल चलाता है, उसकी बेगारी करता है| यानि वहां दोनों शब्द के अर्थ भिन्न हैं|
इसलिए वहां के जो प्रवासी यहाँ आ रहे हैं वह आपकी पूरी व् सही तस्वीर ले ही नहीं पा रहे हैं व् आपको सिर्फ किसान मान के, उनके वहां के सिस्टम-कल्चर वाला किसान मानते हैं|
और वहां ऐसा इसलिए है क्योंकि वहां है 'सामंती-जमींदारी' जो वर्णवाद पर आधारित होती है, जिसमें जमींदार सामंत होता है, जो अमूमन खुद खेत में काम नहीं करता अपितु उसके लिए किसान करता है व् वह डोळे/मैन्ड पे खड़ा हो के आदेश देता है बस|
जबकि आपके यहाँ ऐसा सिस्टम रहा ही नहीं अपितु आपके यहाँ आपके खाप-खेड़े-खेत के दर्शनशास्त्र में "उदारवादी जमींदारी" कल्चर रहा है; इसलिए आप सिर्फ किसान नहीं हो, उसके साथ साथ आप खुद ही जमींदार भी रहे हो!
अत: अपनी पहचान व् परिभाषा को सही-सही शब्द दीजिये!
वेस्ट-यूपी-हरयाणा-पंजाब-उत्तरी राजस्थान इस क्षेत्र को एकमुश्त शब्द में विनेश राणा भाई वाले शब्द सप्ताब से भी सम्बोधित कर सकते हो; यानि पांच आब पंजाब की व् दो आब गंगा-जमना यानि कुल सप्ताब!
जय यौधेय! - फूल मलिक
वीर गोकुला का वास्तविक ग्राम: ब्रज क्षेत्र का तिलपत (तिल्हू) या हरियाणा का तिलपत?
*फ्रांस में स्नान की डुबकी व् इंडिया की डुबकी - जरा फर्क जानो:*
ऐसा मत मानो कि कुम्भ जैसे स्नान की डुबकियां तुम्हारे यहाँ ही होती हैं; सलंगित फोटोज देखो 👆👆👆व् फर्क समझो! यह फोटो हर नए साल के दिन फ्रांस के सुदूर उत्तरी शहर (फ्रांस-इंग्लैंड वाली यूरो टनल के नजदीक) डंकर्क शहर के अटलांटिक महासागर के तट (बीच) पर डुबकी लगाने वाले फ्रेंच लोगों की हैं; जो कड़ाके की माइनस डिग्री वाली ठंड में यहाँ इस दिन इकठ्ठा होते हैं, पहले नाचते-गाते हैं, फिर महासागर में डुबकी लगाते हैं| इस डुबकी को Le Bain des Givrés कहते हैं| है ना बिल्कुल किसी कुम्भ के मेले या गंगा में डुबकी लगाने वाला जैसा ही सिस्टम? तो फिर फर्क क्या है, जो मैं यह फोटो साझे कर रहा हूँ?
फर्क यह है: इनको जूम करके देखें, कहीं कोई कूड़ा-कर्कट दिख रहा है; जैसे हमारे यहाँ कुम्भ-स्नान या गंगा-डुबकी के किनारों पे दिखाई दे जाता है; लोग अपना अधिकार मान के छोड़-डाल के गंदा करके जाते हैं? या हवा में दिल्ली की तरह कोई प्रदूषण या कण? कितना AQI होता है आजकल अपने यहाँ; वो आप बेहतर जानों; यहाँ तो AQI सुई 10 का मार्क छू जाए तो अलर्ट जारी हो जाता है|
उत्तरी भारत के परिवेश में यह सेलेब्रेशन के साथ अपने वातावरण व् गली-गाम की सफाई रखने का कल्चर सिखों या कल तक खापों के नगर खेड़ों में पाया जाता रहा है| याद करो, वो जो आज 40 साल से ऊपर हैं; तुम्हारे बचपन के दिन? जब सांझी मनती थी तो कूड़ा मैनेजमेंट कैसे होता था तुम्हारे पुरखों का? कैसे वो कचरे के टाइप के हिसाब से कुरड़ियाँ तक अलग-अलग रखते थे? कैसे वापिस आएगा या मैंटेन रहेगा यह सिस्टम; सिर्फ तब जब अपने कल्चर-किनशिप को वैल्यू दोगे; 5000 साल पहले के अला-फलां काल्पनिक वंशों के साथ अपनी वंशावली जोड़ने से पहले 50-500 साल पहले तुम्हारे पुरखे क्या करते थे, क्या उनका कल्चर-कस्टम-सिस्टम था, जब उसकी सुध लोगे|
जय यौधेय! - फूल मलिक
कुलदीप सेंगर केस से समझिए कि हम खाप-खेड़ा-खेत किनशिप को जारी व् संरक्षित क्यों रखना चाहते हैं और क्यों तथाकथित चतुर्वर्णीय व्यवस्था को मानवता के लिए राक्षस मानते हैं:
कुलदीप सेंगर जिस जाति से आता है उसी जाति से उसके द्वारा पीड़ित की गई रेप-विक्टिम व् उसका परिवार आता है| और यह वह जाति है जो वर्णवव्यस्था में क्षत्री कहलाती है|
पिछले हफ्ते ही कुलदीप सेंगर को देश की अदालत ने जमानत दी है और शायद ब्री करने तक की बातें हो रही हैं| परन्तु मजाल है जो इस जाति का एक भी व्यक्ति उस रेप पीड़िता के साथ खड़ा हो?
अभी तक हमने उदाहरण देखे थे, दूसरे धर्म व् जाति की बेटियों के अंधभक्त बलात्कारियों के पक्ष में इनको जुलूस निकालते हुए, इनका समर्थन करते हुए; बलात्कारियों को संस्कारी बताते हुए| और एक दम सूं-सां-चप वाला सन्नाटा है| सोशल मीडिया पर कोई लगा भी हुआ है तो खाप-खेड़ा-खेत फिलोसॉफी से आने वाले समाजों से ही लगा हुआ है|
होता यह मामला खाप-खेड़ा-खेत कल्चर के यहाँ का तो क्या अपराधी को इतना मूक समर्थन देता आपका-हमारा समाज? बस इसीलिए हम कहते हैं कि इन फंडियों-चतुर्वर्णियों से अपने कल्चर-किनशिप, असल-फसल-नस्ल की बाड़ पहले झटके कीजिए!
चतुर्वर्णीय व्यवस्था मतलब नारी के प्रति टोटल संवेदनहीनता; सेंगर मसले में देख रहे हो, इससे पहले बेटियों के पहलवान आंदोलन में देख चुके हो!