Sanjrann (सांजरण)
अपने कल्चर के मूल्यांकन का अधिकार दूसरों को मत लेने दो अर्थात अपने आईडिया, अपनी सभ्यता और अपने कल्चर के खसम बनो, जमाई नहीं!
Wednesday, 26 August 2026
सुल्तान-उल-कौम नवाब जस्सा सिंह अहलूवालिया और महाराजा जवाहर सिंह भरतपुर
Thursday, 20 August 2026
जब दादा सर छोटूराम जी ने स्पेशल अमेंडमेंट करके 38 साल के लम्बे इंतज़ार व् टसल के बाद दिलवाया, "गौड़-ब्राह्मण, चौहान, कुरैशी व् जांगड़ा (जिसके तहत पांचाल, सैनी व् विश्वकर्मा सब-ग्रुप्स भी आते हैं) को 'Statutory/Notified Agriculturists Tribes' का स्टेटस:
बात सन 1900 की है, अंग्रेज Punjab Alienation of Land Act (1900) बना रहे थे, इसके तहत तब के यूनाइटेड पंजाब की 'Agriculturists Tribes' चिन्हित की जा रही थी; इसके तहत दस जातियां चिन्हित की गई, जो थी - जाट, जट्ट, राजपूत, गुज्जर, अहीर, माली, पठान, सैयद, बिलोच व् मुग़ल! परन्तु अंग्रेजों ने गौड़-ब्राह्मण, चौहान, कुरैशी व् जांगड़ा को इस लिस्ट में नहीं जोड़ा|
फिर जब यूनियनिस्ट पार्टी की सरकार आती है व् दादा सर छोटूराम जी 'रेवेन्यू-मिनिस्टर' बनते हैं तो इस एक्ट में दो Amendments लाते हैं Punjab Alienation of Land (Amendment) Act of 1938 और Punjab Alienation of Land (Second Amendment) Act of 1938/1939 व् गौड़-ब्राह्मण, चौहान, कुरैशी व् जांगड़ा (जिसके तहत पांचाल, सैनी व् विश्वकर्मा सब-ग्रुप्स भी आते हैं) को भी इसमें जोड़ देते हैं|
इस एक्ट की ख़ास बात यह थी कि इसके तहत आने वाली जातियों की जमीन इस ग्रुप से बाहर कोई खरीद-बेच नहीं सकता था!
इसी से संबंधित सलंगित है एक लिटरेरी रिफरेन्स! इस रिफरेन्स के आधार पर गूगल-जैमिनी से पूछा तो उसने और विस्तृत डिटेल्स निकाल के दे दी!
जय यौधेय!
Monday, 17 August 2026
ये विभाजन की विभीषिका लाने वाले गद्दार थे कौन ?
क्या ये सही हिस्ट्री हैं
Wednesday, 12 August 2026
खूंटी पर टंगे खंडवे और डोगे
खूंटी पर टंगे खंडवे और डोगे
पंडित जवाहर लाल नेहरू से झज्जर विधानसभा की सीट मांगकर लाए थे पंडित भगवत दयाल शर्मा जी। पंडित नेहरू ने कहा था कि पंडित जी वहां से प्रोफेसर शेर सिंह चुनाव लडते हैं, वहां तो मैं भी चुनाव लडूं तो हार जाऊंगा। पंडित जी ने कहा कि टिकट तो यहीं की चाहिए और पंडित भगवत दयाल शर्मा जी प्रोफेसर शेर सिंह कादियान के सामने चुनाव में आ डटे।
प्रोफेशर शेर सिंह अलग मिजाज के नेता थे लेकिन पंडित जी के मिजाज देखकर बात कर लेने के उस्ताद थे। मुकाबला कांटें का तब्दील होता गया और धीरे धीरे जातीय रंग लेने लगा। इस पर पंडित जी ने अंतिम चोट मारी और कहा मैं चौधरियों के खंडवे डोगे खूंटी पर टंगवा दूंगा और प्रोफेशर शेर सिंह चुनाव हार गए।
चुनाव के बाद समर्थकों में मार काट की स्थिति बनीं तो प्रोफेशर शेर सिंह बडी सी मुस्कान चेहरे पर लेकर मतगणना स्थल से बाहर निकले और कहा कि हम जीत गए। समर्थकों ने कंधे पर उठा लिया और वहां से चले गए और इस तरीके से जाति की कडवाहट पर समझदारी की जीत हो गई।
आजकल भाजपा की प्रदेश अध्यक्ष डॉ अर्चना गुप्ता जी राजनीति के तवे पर 1967 वाली रोटी सेंकना चाहती हैं लेकिन वो ये बात भूल जाती हैं वो मुकाबला दो राजनीतिज्ञ लोगों में था। दोनों चुनाव के बाद गले मिले और बात खत्म। जीवन भर वो लोगों के बीच में रहे और कभी अपने सम्मान समारोह आयोजित नहीं करवाए। सम्मान दोनों को ही मिला लेकिन लोगों ने अपने दिल से किया। लोगों को बोलकर कंधों पर लोई नहीं डलवाते थे पहले नेता।
वक्त की बात है जब पंडित जी बुजुर्ग हुए तो दिल्ली में रहने लगे। एक दिन उनका बेटा पडोस के करियाणा स्टोर पर कुछ सामान लेने गया तो विवाद हो गया और उन्होंने पंडित जी के बेटे की पिटाई कर दी। स्वतंत्रतता सेनानी पंडित भगवत दयाल शर्मा जी भी वहां पहुंचे तो उनको भी धक्के मारे गए। पुलिस तो मुकदमा तक दर्ज नहीं कर रही थी लेकिन भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने जब ये मामला लोकसभा में उठाया तब जाकर पंडित जी ओर उनके बेटे को इंसाफ मिला। एक हरियाणा ये भी है।
हरियाणा में जाति एक कडवी सच्चाई है लेकिन फिर भी लोग अपने बाप को बाप ही कहते हैं मां का लोग नहीं। राजनीति में भी एक शिष्टाचार होता है, अपने से ज्यादा समाज की सोचनी होती है। जहर की बीज की फसल का कडवापन वो लोग भी लेते हैं जिनका उस फल से कोई सरोकार नहीं होता है।
हरियाणवी समाज को भी अब अब जात पात से आगे बढकर ये सोचना चाहिए कि हम अपने परिवार का उत्थान कैसे करें? कैसे हरियाणा आगे बढे? कैसे भ्रष्टाचार खत्म हो? कैसे अच्छे नेता चुनाव जीतें?
क्या आपने देश के किसी भी मंत्री के बेटे को कांवड लाते देखा है?
खैर भगवान उनको सद्बुद्धि दे - By Dharmendra Kanwari
Wednesday, 5 August 2026
करनाल 1764 से पहले ना शहर था ना कोई बस्ती
करनाल 1764 से पहले ना शहर था ना कोई बस्ती। करनाल क्षेत्र पानीपत जिले का हिस्सा था और तहसील घरोंडा थी।
करनाल शहर पहली बार महाराजा जींद श्री गजपत सिह ने 1764 मे बसाया गया। उससे पहले करनाल के मिट्टी के टीले के उत्तर पश्चिम भाग मे वजीरपुर नाम की एक सराय और छोटी बस्ती थी जिसे अब दयालपुरा कहा जाता है और इस टीले के बाकि हिस्से पर कही-कही अव्यवस्थित कच्ची बस्तीया थीWednesday, 22 July 2026
साँगवान खाप का युद्ध जींद राजा के साथ (हरियाणा )
(सन् 1863–64) हरियाणा
Saturday, 20 June 2026
आज राम-मंदिर में चोरी के मसले पर एक बात याद आई:-
होता जो "खाप-खेड़े-खेतों-खाड़ों के दर्शनशास्त्र वाला उतना ही जागरूक समाज कि जितना 1870-1875 में था, तो उसको कन्विंस करने को कोई महर्षि दयानंद लाए जाते व् मूर्ती-पूजा को व्यर्थ बताते हुए लिख के लाते कि, "जब राम, अपने चंदे की ही रक्षा नहीं कर सकता तो मेरी क्या रक्षा करेगा?"
दादा नगर खेड़ों/बैयों/भूमियों से मूर्ती-पूजा नहीं करने के कांसेप्ट को बिना उसको क्रेडिट दिए, उसको कॉपी कर, उसका आधार बना के आर्य-समाज की स्थापना करते हुए, 'सत्यार्थ-प्रकाश' में यही तो लिख के लाए थे कि, 'वह व् उनके पिता शिवजी की पूजा कर रहे थे; उनकी मूर्ती के आगे से चूहा प्रसाद खा गया तो उनको ज्ञान हुआ कि, "जब यह मूर्ती खुद अपने प्रसाद की रक्षा नहीं कर सकती, तो मेरी क्या क्या करेगी"? बिना क्रेडिट दिए कॉपी करने की बात इसलिए कि 'आर्य-समाज' का कांसेप्ट जहाँ के वह थे, वहां तो फैला नहीं यानि गुजरात में; यह इस खापलैंड पर ही क्यों अंगीकार हुआ; क्योंकि मूर्ती-पूजा नहीं करने की मति दादा नगर खेड़ों के जरिए यहाँ पहले से ही मौजूद थी|
अब समझने की बात यह देखें कि इसमें "आर्य" शब्द जो जोड़ा वह तो ईरान का है; तो यही ईरान से आए हुए किसको माना जाता है जिनमें आर्य-समाज इतना ज्यादा फैला? क्यों सत्यार्थ-प्रकाश के ग्यारहवें सम्मुलास में "जाट जी" बोल-बोल के, "खाप-खेड़ा-खेत-खाड़ा दर्शनशास्त्र" के सबसे बड़े समूह की इतनी स्तुति की गई व् बाकियों की क्यों नहीं की गई? क्योंकि 1761 में जब पेशवा-लोग पानीपत हारे, तो इनको आभास हुआ कि तुमको जाट को सताने का श्राप लगा जो तुम्हारी पानीपत में हार हुई| Read Maharaja Surajmal and Peshwa meetin in Gawalior for coming together to fight Panipat - read how this episode went. तो उस श्राप से मुक्ति पाने हेतु आर्य-समाज लाने से पहले, जाट को, शिवजी का रूप बता, 1761 से 1870 तक शिवाले बना-बना जाट को उसका रूप बता उसकी स्थापना के प्रयास जब सिरे नहीं चढ़े तो फिर आर्य-समाज आता है|
खैर, आज फिर से "शिवजी का प्रसाद" चूहे द्वारा खाने किस्म की ही घटना हुई है, परन्तु इस बार चूहे के जगह असली इंसान हैं व् शिवजी की जगह राम| मतलब मूर्तिपूजा की व्यर्थता वही है जो 1875 में 'आर्य-समाज' के जरिए बताई गई व् आर्य-समाज से भी पहले मूर्ती व् मर्द-पुजारी रहित 100% औरत की धोक-ज्योत लीडरशिप वाले दादा नगर खेड़ों/बैयों/भूमियों के जरिए आपके-हमारे पुरखे सदियों से स्थापित कर, प्रैक्टिस करते आए|
सिर्फ यही क्यों, नाथ व् साध परम्परा, रामपाल कांसेप्ट, रामरहीम कांसेप्ट, राधा-स्वामी कांसेप्ट, निराकार-कांसेप्ट, दिनौद कांसेप्ट - सभी तो मूर्ती-पूजा रहित कांसेप्ट हैं? तो क्यों नहीं यह मूर्ती-पूजा नहीं मानने-करने वाले आपस में सरजोड़ के व् तालमेल करके चल रहे?
यह आपसी तालमेल व् सरजोड़ कर लेवें तो यह अधिकतर बदलाव अपनी naturality में वापिस आ जाएंगे व् भटकन मिट जाएंगी! इसको ले कर प्रयास कीजिए, अगर हर प्रकार की राजनीति पर वही प्रभाव व् पकड़ चाहिए तो जो खाप-खेड़ा-खेत-खाड़ा के दर्शनशास्त्र के पुरखों की रही व् रहती आई!
जय यौधेय! - फूल मलिक
Friday, 19 June 2026
फिरोज़ शाह तुगलक और खाप पंचायत!
Sunday, 7 June 2026
जाटों में लड़की और बहु में फर्क होता था!
यह सच है कि शरणार्थियों ने ही आकर हमें रहना सिखाया है। आज हरियाणा के जाटों में लड़कियां इंस्टाग्राम पर कुल्ले मटकाती हैं और बाप पैसे चुग रहा है । बाप को इंस्टाग्राम की तरफ से आया कोई मोमेंटो टाइप दिखा रही हैं कि देखो मैंने नाच नाच कर बगड़ फोड़ दिया , इंस्टा ने मुझे फर्स्ट क्लास टैक्सी घोषित कर दिया है और बाप प्राउड फील कर रहा है । किसने सिखाया यह जाटों को ? क्या यह जाटों का सामाजिक व्यवहार था ? किस जाति में बेटी की उम्र की लड़की की बॉडी को कॉम्प्लीमेंट दिये जाते हैं ? यह इतना खुलापन जाटों में कौन लेकर आया ? कोई बोहर गाम का पैसे वाला नांदल है , कोई डीघल का अहलावत है , कोई हिसार का दुहन है , लड़कियां मुंह मारती घूम रही हैं और इंस्टा पर खुलेआम प्राउड फील कर रहे हैं उनपर । बड़ी बात है कि कौम के बड़े चिंतक और लिखाड़ उनका विरोध नहीं कर रहे क्योंकि सरकारी आदेश है कि जबतक जाटों के आखिरी घर में मलाइका अरोड़ा पैदा न हो जाए, यह सिलसिला चलते रहना चाहिए । अगर विरोध किया तो नेता नहीं बनने दिए जाओगे ।
जाटों में लड़की और बहु में फर्क होता था, दूर से देखने पर ही पता लग जाता था कि गाम की छोरी है या गाम की बहु है । लेकिन आज जाटों की लड़कियां अपने ही गांव में खुद को एक चीज की तरह पेश करने वाली ड्रेस पहनती हैं। बहुएं थोड़ा बहुत लाली सुर्खी लगा लिया करतीं , अब लड़कियों ने हद कर रखी है । पंद्रह साल की होते ही इनमें जाट की जाटनी बनने की इच्छा किस कौम ने पैदा की ? खुले बाल किस कौम में लड़कियां रखतीं थी ? शरणार्थियों में तो रखतीं थीं , अब जाटों वालियों में होड़ लगी है , किसने सिखाया इन्हें ?
सबसे बड़ी बात हरियाणा के जाट अरोड़ा खत्रियों का मजाक बना रहे हैं कि ये मामा बुआ की लड़की से शादी करते हैं , यह हमारा कल्चर नहीं । अरे भाई तुमने तो अपने घर की लड़कियों तक को नहीं छोड़ा। सगी बहन के साथ जिम में तंग कपड़ों के साथ व्लोग बना रहे हो , यह किसने सिखाया तुम्हें ?
यह सच है शरणार्थियों ने तुम्हें अपना रहना सहना सिखा दिया जबकि मेजॉरिटी होते हुए तुम उन्हें अपना रहन सहन और तौर तरीके नहीं सिखा पाए ।
इससे साबित होता है बेहद हल्के और बड़बोले लोग हो तुम । और यह जो भाईचारा भाईचारा शब्द बोल रहे हो , भाईचारा भी उन्हीं शरणार्थियों ने निभाया है कि सरकार उनके साथ थी फिर भी तुम्हारी तसल्ली बख्श गुल्लक नहीं तोड़ी और इस बिकाऊ और सेंटर की गुलाम लीडरशिप की गुलामी से बाहर नहीं आए तो क्या पता ये लोग भाईचारा भी तोड़ दें ।
Ashish Rana
Friday, 22 May 2026
1886 के अध्ययन ने जाटों को भारत की सर्वोच्च जाती माना गया है!
1886 के अध्ययन ने जाटों को भारत की सर्वोच्च जाती माना गया है किताब के पेज का स्क्रीनशॉट देखिए,
Sunday, 17 May 2026
प० रामकुमार गौतम अगर आप यही बात हमारे देश के CJI श्री सूर्यकांत जी से कहलवा दो
प० रामकुमार गौतम अगर आप यही बात हमारे देश के CJI श्री सूर्यकांत जी से कहलवा दो कि चौटाला साहब एंटी ब्राह्मण थे तो मैं मान लूंगा कि आप सही कह रहें हैं।
चौटाला साहब किसी ब्राह्मण से खफा या खिलाफ जरूर रहे होंगे, पर पूरी ब्राह्मण बिरादरी के खिलाफ रहे होंगे यह बिल्कुल भी नहीं मान सकता। क्योंकि यदि ऐसा होता तो वो श्री सूर्यकांत जी को अपनी सरकार का एडवोकेट जनरल नहीं बनाते! यदि ऐसा होता तो अजय सिंह चौटाला का PA ब्राह्मण नहीं होता, जोकि शायद आजतक उनका PA है। क्योंकि PA बहुत बड़ा राजदार होता है, तो कोई ऐसे व्यक्ति को अपना राजदार क्यों ही बनाएगा जिसके समाज के वो खिलाफ हो?
चौटाला साहब ब्राह्मणों के खिलाफ थे या नहीं, इसका कोई कागजी प्रमाण तो नहीं है, परंतु पंडित जी आप जाटों के दिल से खिलाफ रहें हैं, इसके तो कागजी प्रमाण हैं। कागजी प्रमाण यह है कि जब सन् 1990–91 में जाटों को हरियाणा में BC आरक्षण दिया गया तो आप जाटों के आरक्षण के विरुद्ध सन् 1993 में सुप्रीम कोर्ट गए थे। आपने ये घाव किसी एक जाट को नहीं दिया था, बल्कि पूरे जाट समाज को दिया था। जिसको जाट समाज आजतक झेल रहा है। और जाटों ने फिर भी आपको दो बार विधायक बना दिया! - Rakesh Sangwan
Saturday, 16 May 2026
साहसी जट्टी गुलाब कौर (बीबी गुलाब कौर/गदर की बेटी)
Wednesday, 13 May 2026
ओशो ध्यान वाले इधर ध्यान दें!
ओशो ध्यान वाले इधर ध्यान दें





