Monday, 17 August 2026

ये विभाजन की विभीषिका लाने वाले गद्दार थे कौन ?

क्या ये सही हिस्ट्री हैं

ये विभाजन की विभीषिका लाने वाले गद्दार थे कौन?
एक बार फिर इतिहास खंगाला जाएं।
भारत विभाजन का पहला वक्तव्य हिंदू महासभा के 19वें अधिवेशन में सावरकर ने 1937 में दिया ! भारत विभाजन का पहला अधिकारिक प्रस्ताव श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने सिंध संसद में जिन्नाह के साथ पास किया । द्विराष्ट्र सिद्धान्त देने वाला सावरकर ही था । जब देश आजादी की अंतिम लड़ाई लड़ रहा था तब सावरकर और जिन्नाह बंगाल, सिंध, और NWFP {आज का बलोचिस्तान} में गठबंधन सरकारे चला रहे थे ।
सावरकर ने 1942 में हिन्दूमहासभा के 24वें अधिवेशन में क्रान्तिकारियों को जेल डालने और ब्रिटिश को सहयोग करने की अपील की , जिन्ना पहले देश विभाजन के खिलाफ था, बाद में सावरकर ने उसे हिन्दू और मुस्लिम राष्ट्र के फायदे समझा कर गुमराह किया, सावरकर ने ही जिन्ना को मुस्लिम लीग में जाने को उकसाया ।
सावरकर ने आजाद हिंद फौज के खिलाफ ब्रिटिश के साथ मिल कर मिलिट्री कैम्प लगाये, सुभाष चन्द्र बोस और गांधी की हत्या का कुचक्र रचा । हिन्दूवादियों ने मिल कर हजारों आजाद हिन्द फौजियों की हत्या करवाई ।
2 जुलाई 1942 को श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने लार्ड हर्बर्ट को चीट्ठी लिख कर कांग्रेस नेताओं और भारत छोड़ो आन्दोलन को कुचलने की अपील की ।
गोलवलकर ने भी ब्रिटिश के समर्थन की घोषणा की थी, आरएसएस के अधिवेशन में बोला कि ब्रिटिश ही हमारे भाग्यविधाता है ।
आडवानी ने खुद बताया था कि आरएसएस के निर्देश पर आजादी के आन्दोलन में कभी में हिस्सा नही लिया, हां अलवर के दंगों में आडवाणी ने खूब नाम कमाया ।
अटल बिहारी ने क्रांतिकारी लीलाधर वाजपेयी के खिलाफ मुखबीरी कर उन्हें 3 साल की जेल करवाई, अटल बिहारी विभाजनकारी शक्तियों को नमन करने मीनार ए पाकिस्तान गया , अटल जिन्नाह की मजार पर सर झुकाने वाला पहला संघी है ।
देश आजाद होने के तीसरे साल ही संघ ने एक और साजिश रची । आर्मी चीफ जनरल करिअप्पा को कत्ल करने की साजिश, संघ ने पहले उत्तर भारत और दक्षिण भारत का ध्रुवीकरण किया फिर करिअप्पा की हत्या की कोशिश की । इस मामले में 6 लोगों को सजा हुई थी ।
गांधी जी की हत्या करने के बाद आरएसएस ने लड्डू बांटे, आरएसएस पर बैन लगा ।
भारत की आजादी के दिन आरएसएस के मुखपत्र द ऑर्गेनाइजर ने अपने संपादकीय में भारत के तिरंगे झंडे का विरोध किया, और घोषणा की थी कि हिंदू इस झंडे को न कभी अपनाएंगे, न कभी इसका सम्मान करेंगे ।
आजादी के दिन जब देश तिरंगा फहरा रहा था तो संघी तिरंगा जला रहे थे , पैरों से कुचल रहे थे ।
स्वतंत्रता के 75 वें साल में डरपोक संघी ने सडकों पर गढ्ढे खुदवाऐ , सडकों पर कीलें बिछाईं , देश की राजधानी को बंधक बनाया
एैसे में दंगाइयों का #विभाजन_दिवस मनाना तो बनता है क्यों कि उनके डीएनए, में विभाजन ही था ,विभाजन ही है ,और विभाजन ही रहेगा विभाजन को बिसात बनाकर राजनीति करना इनकी पैतृक गुणवत्ता में शामिल है इसमें नया कुछ नहीं है ।

By: Satish Singh Tomar









Wednesday, 12 August 2026

खूंटी पर टंगे खंडवे और डोगे

 खूंटी पर टंगे खंडवे और डोगे

पंडित जवाहर लाल नेहरू से झज्जर विधानसभा की सीट मांगकर लाए थे पंडित भगवत दयाल शर्मा जी। पंडित नेहरू ने कहा था कि पंडित जी वहां से प्रोफेसर शेर सिंह चुनाव लडते हैं, वहां तो मैं भी चुनाव लडूं तो हार जाऊंगा। पंडित जी ने कहा कि टिकट तो यहीं की चाहिए और पंडित भगवत दयाल शर्मा जी प्रोफेसर शेर सिंह कादियान के सामने चुनाव में आ डटे।

प्रोफेशर शेर सिंह अलग मिजाज के नेता थे लेकिन पंडित जी के मिजाज देखकर बात कर लेने के उस्ताद थे। मुकाबला कांटें का तब्दील होता गया और धीरे धीरे जातीय रंग लेने लगा। इस पर पंडित जी ने अंतिम चोट मारी और कहा मैं चौधरियों के खंडवे डोगे खूंटी पर टंगवा दूंगा और प्रोफेशर शेर सिंह चुनाव हार गए।

चुनाव के बाद समर्थकों में मार काट की स्थिति बनीं तो प्रोफेशर शेर सिंह बडी सी मुस्कान चेहरे पर लेकर मतगणना स्थल से बाहर निकले और कहा कि हम जीत गए। समर्थकों ने कंधे पर उठा लिया और वहां से चले गए और इस तरीके से जाति की कडवाहट पर समझदारी की जीत हो गई।

आजकल भाजपा की प्रदेश अध्यक्ष डॉ अर्चना गुप्ता जी राजनीति के तवे पर 1967 वाली रोटी सेंकना चाहती हैं लेकिन वो ये बात भूल जाती हैं वो मुकाबला दो राजनीतिज्ञ लोगों में था। दोनों चुनाव के बाद गले मिले और बात खत्म। जीवन भर वो लोगों के बीच में रहे और कभी अपने सम्मान समारोह आयोजित नहीं करवाए। सम्मान दोनों को ही मिला लेकिन लोगों ने अपने दिल से किया। लोगों को बोलकर कंधों पर लोई नहीं डलवाते थे पहले नेता।

वक्त की बात है जब पंडित जी बुजुर्ग हुए तो दिल्ली में रहने लगे। एक दिन उनका बेटा पडोस के करियाणा स्टोर पर कुछ सामान लेने गया तो विवाद हो गया और उन्होंने पंडित जी के बेटे की पिटाई कर दी। स्वतंत्रतता सेनानी पंडित भगवत दयाल शर्मा जी भी वहां पहुंचे तो उनको भी धक्के मारे गए। पुलिस तो मुकदमा तक दर्ज नहीं कर रही थी लेकिन भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने जब ये मामला लोकसभा में उठाया तब जाकर पंडित जी ओर उनके बेटे को इंसाफ मिला। एक हरियाणा ये भी है।

हरियाणा में जाति एक कडवी सच्चाई है लेकिन फिर भी लोग अपने बाप को बाप ही कहते हैं मां का लोग नहीं। राजनीति में भी एक शिष्टाचार होता है, अपने से ज्यादा समाज की सोचनी होती है। जहर की बीज की फसल का कडवापन वो लोग भी लेते हैं जिनका उस फल से कोई सरोकार नहीं होता है।

हरियाणवी समाज को भी अब अब जात पात से आगे बढकर ये सोचना चाहिए कि हम अपने परिवार का उत्थान कैसे करें? कैसे हरियाणा आगे बढे? कैसे भ्रष्टाचार खत्म हो? कैसे अच्छे नेता चुनाव जीतें?

क्या आपने देश के किसी भी मंत्री के बेटे को कांवड लाते देखा है?

खैर भगवान उनको सद्बुद्धि दे - By Dharmendra Kanwari

Wednesday, 5 August 2026

करनाल 1764 से पहले ना शहर था ना कोई बस्ती

 करनाल 1764 से पहले ना शहर था ना कोई बस्ती। करनाल क्षेत्र पानीपत जिले का हिस्सा था और तहसील घरोंडा थी।

करनाल शहर पहली बार महाराजा जींद श्री गजपत सिह ने 1764 मे बसाया गया। उससे पहले करनाल के मिट्टी के टीले के उत्तर पश्चिम भाग मे वजीरपुर नाम की एक सराय और छोटी बस्ती थी जिसे अब दयालपुरा कहा जाता है और इस टीले के बाकि हिस्से पर कही-कही अव्यवस्थित कच्ची बस्तीया थी

By: Virender Lather



Wednesday, 22 July 2026

साँगवान खाप का युद्ध जींद राजा के साथ (हरियाणा )

(सन् 1863–64) हरियाणा

'तारीखे-फूलनाम रियासत जीन्द में लिखा हुआ है कि सन् 1857 के बाद अंग्रेजों ने दादरी का इलाका राजा जीन्द को, सन् 1857 के विद्रोह में ब्रिटिश सरकार की सेवा के बदले में, पुरस्कार के रूप में दे दिया। उस समय सांगवान खाप का सरदार हीरासिंह जी थे। उसने चरखी में उस फैसले को मानने से इनकार कर दिया। राजा जीन्द ने सन् 1863–64 में वास्तविक अधिकार करने के लिए चरखी पर चढ़ाई कर दी थी। सांगवान, श्योराण और फौगाट किसानों की खापों ने सरदार हीरासिंह को अपना नायक चुना लिया था। उसने राजा के विरुद्ध लड़ाई लड़ी। वह लड़ता हुआ चरखी के खेतों शहीद हो गया था । उसके स्थान पर लड़ाई की कमान झोजू कलां के ही चौधरी चन्द्रभान को दी गई बाद में । युद्ध के दूसरे अवसर पर बौंद के पंवार राजपूतों का सतगांवां भी किसानों के साथ आ गया मिल गया ,
👉👉 परन्तु बींद खुर्द के ठाकुर नौरंगसिंह ने दुश्मन पक्ष का साथ दिया। उस युद्ध में राजा जीन्द हारकर भाग लिया। किसानों ने उसका बौंद तक पीछा किया।
👉👉
फिर जीन्द और पटियाला राज्यों की मिली जुली सेना ने दोबारा आक्रमण किया। दिल्ली से ब्रिटिश आफिसर टोनकिन तोपें लेकर आए। दूसरी बार लड़ाई झोजू कलां में हुई। टोनकिन ने गांव पर तोपों से गोले मारे। आज भी दो चौपाल गोलाबारी से क्षतिग्रस्त पड़ी हैं। इलाके को तबाह कर दिया। लोगों में भगदड़ मच गई। लोग जान बचाने के लिए और पहाड़ी मोर्चे लेने के लिए मानकवास की पहाड़ियों में जा छुपे। चौ० चन्द्रभान बीकानेर भाग गया।
चौ. अनन्तराम फौगाट मौडी के विख्यात आदमी थे। उसके बीकानेर राज-घराने से अच्छे सम्बन्ध थे। चौ० अनन्तराम ने सन् 1857 के विद्रोह में अंग्रेजों को पनाह दी थी। चौ० अनन्तराम के कहने पर राजा बीकानेर ने बीच में आकर चौ० चन्द्रभान और राजा जीन्द में सन्धि करा दी। जीन्द में उस समय रघबीर सिंह राजा था। ग्राम पूठी (सीमान) जिला हिसार के स्थान पर सन्धि हुई। चौ० चन्द्रभान ने जीन्द राज्य की अधीनता स्वीकार करली। राजा ने चौ० चन्द्रभान को सरोपा पेश किया। उसको 250 रुपया सालाना का वजीफा और एक ग्राम रामबास भी जागीर में दे दिया।
सरदार हीरासिंह की सम्पत्ति को सन् 1863 में जब्त बहक सरकार कर लिया गया। उसकी हवेली पर आज भी सरकारी मोहर लगी हुई है। ताला लगा हुआ है। हीरासिंह की औलाद ग्राम चौधराण में बसी हुई है। झोजू के चौ० वेगराज ने राजा जीन्द से पगड़ी बदल दोस्ती कर ली। वे फिर जीन्द दरबार में ही रहे।
ठाकुर नौरंगसिंह बौंद खुर्द निवासी अंग्रेज मेटकाफ साहब के मित्र थे। टाकुर साहब ने पहले समय में ऊंटों पर बिठाकर सुरक्षित भिवानी और हिसार पहुंचाया था। उस सेवा के बदले में और चरखी, बौंद की लड़ाई में अंग्रेजों की सहायता करने के कारण मेटकाफ साहब ने ठाकुर नौरंगसिंह को एक सिफारशी सनद दी और उसे छुछकवास (झज्जर) के बीड़ में 4000 बीघे और खातीवास (झज्जर) में 500 बीघे जमीन पुरस्कार में दे दी। वहां राजपूतों का बराणी गांव बसा हुआ है।
धर्मेंद्र कंवारी जी की वॉल से सह धन्यवाद

Saturday, 20 June 2026

आज राम-मंदिर में चोरी के मसले पर एक बात याद आई:-

होता जो "खाप-खेड़े-खेतों-खाड़ों के दर्शनशास्त्र वाला उतना ही जागरूक समाज कि जितना 1870-1875 में था, तो उसको कन्विंस करने को कोई महर्षि दयानंद लाए जाते व् मूर्ती-पूजा को व्यर्थ बताते हुए लिख के लाते कि, "जब राम, अपने चंदे की ही रक्षा नहीं कर सकता तो मेरी क्या रक्षा करेगा?"


दादा नगर खेड़ों/बैयों/भूमियों से मूर्ती-पूजा नहीं करने के कांसेप्ट को बिना उसको क्रेडिट दिए, उसको कॉपी कर, उसका आधार बना के आर्य-समाज की स्थापना करते हुए, 'सत्यार्थ-प्रकाश' में यही तो लिख के लाए थे कि, 'वह व् उनके पिता शिवजी की पूजा कर रहे थे; उनकी मूर्ती के आगे से चूहा प्रसाद खा गया तो उनको ज्ञान हुआ कि, "जब यह मूर्ती खुद अपने प्रसाद की रक्षा नहीं कर सकती, तो मेरी क्या क्या करेगी"? बिना क्रेडिट दिए कॉपी करने की बात इसलिए कि 'आर्य-समाज' का कांसेप्ट जहाँ के वह थे, वहां तो फैला नहीं यानि गुजरात में; यह इस खापलैंड पर ही क्यों अंगीकार हुआ; क्योंकि मूर्ती-पूजा नहीं करने की मति दादा नगर खेड़ों के जरिए यहाँ पहले से ही मौजूद थी|


अब समझने की बात यह देखें कि इसमें "आर्य" शब्द जो जोड़ा वह तो ईरान का है; तो यही ईरान से आए हुए किसको माना जाता है जिनमें आर्य-समाज इतना ज्यादा फैला? क्यों सत्यार्थ-प्रकाश के ग्यारहवें सम्मुलास में "जाट जी" बोल-बोल के, "खाप-खेड़ा-खेत-खाड़ा दर्शनशास्त्र" के सबसे बड़े समूह की इतनी स्तुति की गई व् बाकियों की क्यों नहीं की गई? क्योंकि 1761 में जब पेशवा-लोग पानीपत हारे, तो इनको आभास हुआ कि तुमको जाट को सताने का श्राप लगा जो तुम्हारी पानीपत में हार हुई| Read Maharaja Surajmal and Peshwa meetin in Gawalior for coming together to fight Panipat - read how this episode went. तो उस श्राप से मुक्ति पाने हेतु आर्य-समाज लाने से पहले, जाट को, शिवजी का रूप बता, 1761 से 1870 तक शिवाले बना-बना जाट को उसका रूप बता उसकी स्थापना के प्रयास जब सिरे नहीं चढ़े तो फिर आर्य-समाज आता है|


खैर, आज फिर से "शिवजी का प्रसाद" चूहे द्वारा खाने किस्म की ही घटना हुई है, परन्तु इस बार चूहे के जगह असली इंसान हैं व् शिवजी की जगह राम| मतलब मूर्तिपूजा की व्यर्थता वही है जो 1875 में 'आर्य-समाज' के जरिए बताई गई व् आर्य-समाज से भी पहले मूर्ती व् मर्द-पुजारी रहित 100% औरत की धोक-ज्योत लीडरशिप वाले दादा नगर खेड़ों/बैयों/भूमियों के जरिए आपके-हमारे पुरखे सदियों से स्थापित कर, प्रैक्टिस करते आए|


सिर्फ यही क्यों, नाथ व् साध परम्परा, रामपाल कांसेप्ट, रामरहीम कांसेप्ट, राधा-स्वामी कांसेप्ट, निराकार-कांसेप्ट, दिनौद कांसेप्ट - सभी तो मूर्ती-पूजा रहित कांसेप्ट हैं? तो क्यों नहीं यह मूर्ती-पूजा नहीं मानने-करने वाले आपस में सरजोड़ के व् तालमेल करके चल रहे?


यह आपसी तालमेल व् सरजोड़ कर लेवें तो यह अधिकतर बदलाव अपनी naturality में वापिस आ जाएंगे व् भटकन मिट जाएंगी! इसको ले कर प्रयास कीजिए, अगर हर प्रकार की राजनीति पर वही प्रभाव व् पकड़ चाहिए तो जो खाप-खेड़ा-खेत-खाड़ा के दर्शनशास्त्र के पुरखों की रही व् रहती आई!


जय यौधेय! - फूल मलिक

Friday, 19 June 2026

फिरोज़ शाह तुगलक और खाप पंचायत!

फिरोज़ शाह तुगलक और खाप पंचायत 

1352 ईशवी की घटना है जब दिल्ली के बादशाह फिरोजशाह तुगलक ने धार्मिक प्रतिबंध और जजिया जैसे कर आम जनता पर लगा दिए थे, साथ ही साथ बादशाह के बिगड़ैल सैनिकों और अधिकारियों ने चारों तरफ लूट मचा रखी थी। हरयाणा में सर्वखाप पंचायत का एलान हुआ। याद रखियेगा के हरयाणा में दिल्ली ग्रामीण, आज का पश्चिम उत्तरप्रदेश भी शामिल था। सर्वखाप पंचायत ने हरेक बिरादरी से ज्ञानी योद्धा चुने, जातिगत संख्या के अनुरूप। 
इसमें ब्राह्मण (25), जाट (66), अहीर (15), गुज्जर (15), राजपूत (15), वैश्य बनिया (10), चमार (5), धानक (4), बढई (8), लुहार (6), सैनी (5), जुलाहे (5), तेली (5), कुम्हार (4), खटीक बाल्मीकि (4), रोड (4), रवे (3), धोबी (3), नाई (2), जोगी (2), गोसाई (2), कलाल (2) 
कुल 210 वीरों को तैयार किया जुल्मी सत्ता से बात करने के लिए। सही समय पर वो लोग तुगलक के दरबार पहुंचे। पंचायत रिकॉर्ड के अनुसार 150 और आदमी तैयार करके भेजे ताकि दिल्ली की एक एक खबर पंचायत तक पहुंचे।
बादशाह की तरफ से आदेश हुआ के सिर्फ 5 आदमी ही बादशाह से बात करेंगे। किसी भी योद्धा को तलवार, भाला या अन्य हथ्यार ले कर जाने की अनुमति नहीं थी । खैर 5 वीर जाने को तैयार हुए। 
हरभजन जाट, सदाराम बाह्मण, रुड़ामल बनिया, अंतराम गुज्जर और बाबरा बाल्मीकि। 
बाकि 205 वीर बाहर जयकारे लगाने लगे। 

हरभजन जाट ने बादशाह से कहा... जजिया हटाया जाए, मंदिर और धार्मिक कामों में कर और दखलंदाजी बन्द हो। 

बादशाह के काज़ी मुइउदुदीन ने कहा ... इस्लाम कबूल करलो, तुम्हारी बातें मान ली जाएंगी। 

हरभजन जाट ने अपने साथियों की तरफ देखा और काजी को कहा... धर्म का सम्बंध आत्मा से है। हरेक को अपने धर्म अपने पंथ को मानने की आज़ादी है। यही हमारे पूर्वजों और खाप पंचायतों का न्याय है। इसमें कोई ज़बरदस्ती नहीं हो सकती।।

काजी ने कहा ... क्या तुम अपने धर्म के लिए अपने प्राण दे सकते हो?

हरभजन के साथ साथ पांचों साथियों ने कहा... बिल्कुल दे सकते हैं। 

बादशाह के काज़ी ने बादशाह के आदेश पर महल के बाहर एक बहुत बड़े खड्डे में आग लगवाई और कहा के... प्रमाण दो तुम सब के तुम्हे धर्म और आज़ादी प्राणों से प्यारे हैं।।

पांचों योद्धा एक एक करके अग्नि में कूद गए। उसके बाद काज़ी ने बाकियों से पूछा के ... क्या तुम लोग भी सबूत दोगे या इस्लाम कबूल करोगे?

वहीं मुसलमान फकीर बालूशाह ने काज़ी को रोकने का प्रयास किया और काजी को कहा के ये खुदा की तौहीन है। हर इंसान को अपने ईमान पर रहने का हक़ है। लेकिन काजी के साथ तकरीबन तकरीबन सारे मुल्ला मौलवियों ने इस काम को शरीयत अनुसार जायज़ ठहराया। बाकि 205 योद्धा भी अग्नि में कूद गए। 


Source: सर्वखाप पंचायत रिकॉर्ड, श्री जगदेव शास्त्री जी का लेख, बलिदान विशेष अंक, पेज 151-152

(कितने किस्सों को हमसे छिपाया गया, क्यों नहीं ये इतिहास पढ़ाया गया)

Sunday, 7 June 2026

जाटों में लड़की और बहु में फर्क होता था!

यह सच है कि शरणार्थियों ने ही आकर हमें रहना सिखाया है। आज हरियाणा के जाटों में लड़कियां इंस्टाग्राम पर कुल्ले मटकाती हैं और बाप पैसे चुग रहा है । बाप को इंस्टाग्राम की तरफ से आया कोई मोमेंटो टाइप दिखा रही हैं कि देखो मैंने नाच नाच कर बगड़ फोड़ दिया , इंस्टा ने मुझे फर्स्ट क्लास टैक्सी घोषित कर दिया है और बाप प्राउड फील कर रहा है । किसने सिखाया यह जाटों को ? क्या यह जाटों का सामाजिक व्यवहार था ? किस जाति में बेटी की उम्र की लड़की की बॉडी को कॉम्प्लीमेंट दिये जाते हैं ? यह इतना खुलापन जाटों में कौन लेकर आया ? कोई बोहर गाम का पैसे वाला नांदल है , कोई डीघल का अहलावत है , कोई हिसार का दुहन है , लड़कियां मुंह मारती घूम रही हैं और इंस्टा पर खुलेआम प्राउड फील कर रहे हैं उनपर । बड़ी बात है कि कौम के बड़े चिंतक और लिखाड़ उनका विरोध नहीं कर रहे क्योंकि सरकारी आदेश है कि जबतक जाटों के आखिरी घर में मलाइका अरोड़ा पैदा न हो जाए, यह सिलसिला चलते रहना चाहिए । अगर विरोध किया तो नेता नहीं बनने दिए जाओगे ।

जाटों में लड़की और बहु में फर्क होता था, दूर से देखने पर ही पता लग जाता था कि गाम की छोरी है या गाम की बहु है । लेकिन आज जाटों की लड़कियां अपने ही गांव में खुद को एक चीज की तरह पेश करने वाली ड्रेस पहनती हैं। बहुएं थोड़ा बहुत लाली सुर्खी लगा लिया करतीं , अब लड़कियों ने हद कर रखी है । पंद्रह साल की होते ही इनमें जाट की जाटनी बनने की इच्छा किस कौम ने पैदा की ? खुले बाल किस कौम में लड़कियां रखतीं थी ? शरणार्थियों में तो रखतीं थीं , अब जाटों वालियों में होड़ लगी है , किसने सिखाया इन्हें ? 

सबसे बड़ी बात हरियाणा के जाट अरोड़ा खत्रियों का मजाक बना रहे हैं कि ये मामा बुआ की लड़की से शादी करते हैं , यह हमारा कल्चर नहीं । अरे भाई तुमने तो अपने घर की लड़कियों तक को नहीं छोड़ा। सगी बहन के साथ जिम में तंग कपड़ों के साथ व्लोग बना रहे हो , यह किसने सिखाया तुम्हें ? 


यह सच है शरणार्थियों  ने तुम्हें अपना रहना सहना  सिखा दिया जबकि  मेजॉरिटी होते हुए तुम उन्हें अपना रहन सहन और तौर तरीके नहीं सिखा पाए ।


इससे साबित होता है बेहद हल्के और बड़बोले लोग हो तुम । और यह जो भाईचारा भाईचारा शब्द बोल रहे हो , भाईचारा भी उन्हीं शरणार्थियों  ने निभाया है कि सरकार उनके साथ थी फिर भी तुम्हारी तसल्ली बख्श गुल्लक नहीं तोड़ी और इस बिकाऊ और सेंटर की गुलाम लीडरशिप की गुलामी से बाहर नहीं आए तो क्या पता ये लोग भाईचारा भी तोड़ दें ।


Ashish Rana

Friday, 22 May 2026

1886 के अध्ययन ने जाटों को भारत की सर्वोच्च जाती माना गया है!

1886 के अध्ययन ने जाटों को भारत की सर्वोच्च जाती माना गया है किताब के पेज का स्क्रीनशॉट देखिए,

2014 के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय में जाटों का सर्वोच्च सामाजिक स्तर बताते हुए उन्हें भारत की इकलौती आर्य(इंडो आर्यन) जाती बताया गया है जिन्हें पिछड़ा वर्ग बिल्कुल नहीं माना जा सकता दूसरा स्क्रीनशॉट देखिए!

1999 में महर्षि दयानंद यूनिवर्सिटी ने अपने गैर जाट प्रोफेसर्स से एक सर्वे करवाया था जिसका तुलनात्मक अध्ययन ब्राह्मण,राजपूत,अहीर,गुज्जर,कुर्मी,यादव आदि जातियों से किया गया जिसमें यहां भी जाटों का सामाजिक स्तर सर्वोच्च पाया गया!

जाट देश का इकलौता आर्य समूह है जिन्हे आज के युग में भी जातीय गौरव हासिल है बस राजनीति में फंसे हुए लोग ही अपने आप को अछूत मानते है इन दस बारह लोगों को छोड़कर और बामसेफ और आदि किसान समूहों के तनख्वा धारी बीस तीस जाटों को छोड़कर पूरी जाट कौम अपने ऊपर गर्व करती है
रक्त और नस्ल पे गर्व करने वाली जातियां ही देश और धर्म की रक्षा कर पाती है








Sunday, 17 May 2026

प० रामकुमार गौतम अगर आप यही बात हमारे देश के CJI श्री सूर्यकांत जी से कहलवा दो

 प० रामकुमार गौतम अगर आप यही बात हमारे देश के CJI श्री सूर्यकांत जी से कहलवा दो कि चौटाला साहब एंटी ब्राह्मण थे तो मैं मान लूंगा कि आप सही कह रहें हैं।


चौटाला साहब किसी ब्राह्मण से खफा या खिलाफ जरूर रहे होंगे, पर पूरी ब्राह्मण बिरादरी के खिलाफ रहे होंगे यह बिल्कुल भी नहीं मान सकता। क्योंकि यदि ऐसा होता तो वो श्री सूर्यकांत जी को अपनी सरकार का एडवोकेट जनरल नहीं बनाते! यदि ऐसा होता तो अजय सिंह चौटाला का PA ब्राह्मण नहीं होता, जोकि शायद आजतक उनका PA है। क्योंकि PA बहुत बड़ा राजदार होता है, तो कोई ऐसे व्यक्ति को अपना राजदार क्यों ही बनाएगा जिसके समाज के वो खिलाफ हो?


चौटाला साहब ब्राह्मणों के खिलाफ थे या नहीं, इसका कोई कागजी प्रमाण तो नहीं है, परंतु पंडित जी आप जाटों के दिल से खिलाफ रहें हैं, इसके तो कागजी प्रमाण हैं। कागजी प्रमाण यह है कि जब सन् 1990–91 में जाटों को हरियाणा में BC आरक्षण दिया गया तो आप जाटों के आरक्षण के विरुद्ध सन् 1993 में सुप्रीम कोर्ट गए थे। आपने ये घाव किसी एक जाट को नहीं दिया था, बल्कि पूरे जाट समाज को दिया था। जिसको जाट समाज आजतक झेल रहा है। और जाटों ने फिर भी आपको दो बार विधायक बना दिया! - Rakesh Sangwan


Saturday, 16 May 2026

साहसी जट्टी गुलाब कौर (बीबी गुलाब कौर/गदर की बेटी)

 


साहसी जट्टी गुलाब कौर (बीबी गुलाब कौर/गदर की बेटी)गदर आंदोलन की प्रमुख साहसी,पराक्रमी क्रांतिकारी इतिहास की बहादुर महिला थी।
गदर की धी/बेटी पंजाब की महाहड़/मदाहड़ गोत्र की जट्टी (जाटनी) थीं। इनका जन्म लगभग 1890 में पंजाब के संगरूर जिले के बख्शीवाला गांव (सुनाम क्षेत्र) में एक साधारण किसान परिवार में हुआ था। 
प्रारंभिक जीवन और विदेश यात्रा
•  गुलाब कौर का विवाह मान सिंह से हुआ।
•  बेहतर जीवन की तलाश में वे पति के साथ मनीला (फिलीपींस) चली गईं, जहाँ से आगे अमेरिका जाने की योजना थी।
•  मनीला में रहते हुए उनका संपर्क गदर पार्टी के नेताओं (बाबा हाफिज अब्दुल्ला फज्जा, बाबा बंता सिंह, बाबा हरनाम सिंह टुंडीलत आदि) से हुआ। गदर पार्टी 1913 में विदेश में बस गए भारतीयों (खासकर पंजाबी सिखों) द्वारा ब्रिटिश राज के खिलाफ सशस्त्र क्रांति के लिए बनाई गई थी। 
गदर आंदोलन में योगदान
गुलाब कौर ने गदर पार्टी जॉइन कर ली और जल्द ही मनीला ब्रांच की प्रमुख नेता बन गईं।
•  उन्होंने महिलाओं को भी क्रांति में शामिल होने के लिए प्रेरित किया।
•  पत्रकार का भेष बनाकर (प्रेस पास के साथ) गदर पार्टी के सदस्यों को हथियार वितरित किए।
•  गदर अखबार और क्रांतिकारी साहित्य की छपाई की निगरानी की तथा इसे फैलाया।
•  वे भर्ती (रंगरूट) करने और लोगों को ब्रिटिश विरोधी भाषण देने में भी सक्रिय रहीं।
1914 में जब गदर पार्टी ने भारत लौटकर सशस्त्र विद्रोह करने का आह्वान किया, तो गुलाब कौर ने पति को छोड़कर (जो अमेरिका जाने को तैयार थे) अपनी मातृभूमि चुन ली। वे लगभग 50 अन्य गदरियों के साथ S.S. Korea जहाज से भारत वापस आईं। 
भारत में क्रांतिकारी गतिविधियाँ
भारत पहुँचकर उन्होंने कपूरथला, होशियारपुर, जालंधर और आसपास के क्षेत्रों में:
•  जनता को जागृत किया।
•  सशस्त्र क्रांति के लिए संगठित किया।
•  गदर पार्टी का प्रचार-प्रसार और हथियारों का वितरण जारी रखा।
ब्रिटिश सरकार ने उन्हें सेडिशन (राजद्रोह) के आरोप में गिरफ्तार कर लाहौर जेल में 2 वर्ष की सजा दी।
बलिदान और विरासत
•  जेल से रिहा होने के बाद भी वे क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय रहीं।
•  उनका निधन 1941 में हुआ।
गुलाब कौर को “गदर की बेटी” (Ghadar Di Dhee) कहा जाता है। वे गदर आंदोलन में सक्रिय सबसे प्रमुख महिलाओं में से एक थीं। साहसी जट्टी(जटनी) का जीवन साहस, त्याग और देशभक्ति का बे मिशाल दर्शन है,जिन्होंने आरामदायक जीवन,पति और परिवार को त्यागकर मातृभूमि की आजादी के लिए सब कुछ दांव पर लगा दिया।
आज भी पंजाब में उनकी याद में गदरी मेला आदि कार्यक्रमों में सम्मान दिया जाता है।
उनकी पूरी कहानी केसर सिंह की किताब “गदर दी धी/बेटी गुलाब कौर” में विस्तार से मिलती है।
जय गदर! जय हिंद! 🇮🇳
जट्टी(जटनी)की गौरव कहानी जो भुलाई नहीं जा सकती।


Wednesday, 13 May 2026

ओशो ध्यान वाले इधर ध्यान दें!

 ओशो ध्यान वाले इधर ध्यान दें

☺️
पिछले दिनों मेरे पास एक महिला का फोन आता है व वह पहले खूब हंसती है हींहींहींहीं और फोन पर कहती है कि वो कितनी सौभाग्यशाली है कि मेरे से बात कर पा रही है। मैंने तो सोचा था कि आपका कोई सहयोगी फोन उठायेगा व आपसे बात एप्वाइंटमेंट लेकर करनी होगी। मैंने उससे फोन करने का कारण पूछा तो वो कहने लगी कि उनके वहां कोई ओशो का आश्रम बना रहा था तथा वो इसे प्राकृतिक भवन निर्माण सामग्री से बनाना चाहते हैं। मैंने कहा कि हमारे यहां हर महीने प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया जाता है। आप अपना नाम व पता लिख कर 098120 54982 पर वाट्सएप करदे। आपको हमारे प्रशिक्षण कार्यक्रम की विस्तृत जानकारी मिल जाएगी। उसने वाट्सएप कर दिया व मैंने संदेश भेज दिया।
दो दिन बाद उसी आश्रम से किसी आदमी का फोन आता है और वह कहता है कि मलिक साहब मैंने भिवानी बैंक में नौकरी कर रखी है। हम दोनों हरियाणा से ही हैं। आप एक काम करो हमें प्राकृतिक भवन निर्माण सामग्री के फार्मूले बता दो। मैंने कहा कि श्रीमान यह प्रेक्टिकल विषय है, आपको प्रशिक्षण प्राप्त करना चाहिए। वो बंदा तो भड़क गया कि हम लोगों से पैसे लेते हैं हम आपको पैसे कहां से दें❓
मैंने उस सज्जन को कहा कि चलो हम आपको निशुल्क सिखा देते हैं, आप ओशो आश्रम वाले मेरी गायों कि एक महीने सेवा कर दें व इनका एक महीने का खर्च उठा लें। इतनी सी बात सुन कर तो उस बंद का रूप ही बदल गया और वो कहने लगा कि यह काम हम क्यों करें❓ मुझे भी गुस्सा आ गया व ......
दो दिन बाद फिर उसी बंदे का फोन आया व वह कहने लगा कि मैं नोट गिन रहा हूं क्या❓ मैंने कहा कि हां मैंने नोट गिनने की मशीन लगा रखी हैं वो दिन रात नोट ही गिनती रहती हैं। तू फोन रख।
अब कल शाम को वाट्सएप पर एक वृद्ध व्यक्ति ओशो की व ओशो के विचारों को पंजाबी में लिख कर भेजने लगा जिसमें वहीं बातें लिखी हैं जो हर कोई आश्रम वाला लिखता जैसे कि हमें नशामुक्त जीवन जीना चाहिये व ध्यान करना चाहिए।
मैं समझ गया कि इनकी खुजली अभी मिटी नहीं है। मैंने कहा कि आम आदमी से हम प्रशिक्षण फीस 21000/- लेते हैं क्योंकि वो घर बनाना सीखते हैं, आपसे मैं 31000/- लूंगा क्योंकि आप आश्रम बनाना सीखना चाहते हो।
इतना सुनते ही उस महाराज जी को तत्व ज्ञान हो गया व वह कहने लगा कि यह कौन-सा बड़ा काम है, मिट्टी ली व आश्रम बना लिया। हम कल से लोकल मिस्त्री से आश्रम बनवा लेंगे।
मैं बोला सुण भाई तुम ओशो वाले किसी को फ्री में पाणी भी नहीं पिलाते व एक दिन का कम से कम 850/- लेते हो। हम सबको फ्री खाना खिलाते हैं व यहां रहने का भी कुछ नहीं लेते। हमारे यहां पांच दिन ओफलाइन व 180 दिन ओनलाइन प्रशिक्षण के हम मात्र 21000/- लेते हैं यानी कि हर दिन के लगभग सौ रूपए।
अगली बार अगर किसी आश्रम वाले का फोन आयेगा तो उनके लिए फीस 41000/- होगी। मई महीने का प्रशिक्षण कार्यक्रम 27 मई से 31 मई तक आयोजित किया जाएगा। अगर आप को प्रशिक्षण प्राप्त करना है तो सीट बुक करा लें।
ठीक करया नै रै⁉️
सबको भारतीय ज्ञान मुफ्त में ही क्यों चाहिए यह बात मैं आज तक नहीं समझ पाया। थारै समझ आई हो तै कमेंट करके अवश्य बतायें ☺️☺️
APJ=√अणपढ़ जाट - Dr. Shivdarshan Malik

muस्लिमों में अपने रिश्तेदारों में निकाह करना हलाल (जायज़) है, यह सच है। - लेकिन

muस्लिमों में अपने रिश्तेदारों में निकाह करना हलाल (जायज़) है, यह सच है।

लेकिन हिंदुओं के धार्मिक ग्रन्थ मत्स्य पुराण के अध्याय 3 और 4 में ब्रह्मा और सरस्वती का प्रसंग आता है।

उसमें बताया गया है कि ब्रह्मा अपनी ही पुत्री सरस्वती के सौंदर्य को देखकर मोहित हो गए।

चूंकि ब्रह्मा अपनी ही पुत्री को भोगना चाहते थे इसलिए उन्होंने अपने पुत्रों–पुत्रियों को भी आपस में वैवाहिक संबंध स्थापित करने के लिए बोल दिया।

सभी के जाने के बाद ब्रह्मा ने अपनी पुत्री के साथ सम्बन्ध बनाए और मनु नामक पुत्र को जन्म दिया।

मुस्लिमों को दिन रात गोबर और मूत्र का सेवन कर करके कोसने वाले हिंदुओं इसपर आपका क्या कहना है?

यहां तो अपनी पुत्री को भी नहीं बख्शा जा रहा और सगे भाई–बहन भी परस्पर वैवाहिक सम्बन्ध बना रहे हैं।

ज्योतिबा फुले ने अपनी पुस्तक गुलामगिरी में इसीलिए ब्रह्मा को "........*" बोला था। - Sunil Deswal

Friday, 24 April 2026

पोज एज ए फ्रेंड, एक्ट एज आ स्पाई!!

 पोज एज ए फ्रेंड

एक्ट एज आ स्पाई!!

रॉबर्ट ग्रीनी की किताब पढ़ता हुआ शख्स, पॉवरफुल हो सकता है। लेकिन मित्र, सहयोगी, प्रेमी या किसी का वेल विशर नही हो सकता।
●●
यह किताब जो सिखाती है, वह 48 नियम इस तरह है-

1- मालिक से ज्यादा होशियार मत दिखना
2- दोस्त पर भरोसा नहीं, दुश्मनों को यूज करें।
3- इरादे छुपाकर रखो।
4- बात साफ हो जाये, उतना न बताओ।
5- छवि बनाकर रखो, हर कीमत पर बचाओ
6- ड्रामा करो, ध्यान खींचो।
7- काम दूसरों से करवाओ, क्रेडिट खुद लो
8- चारा फेंककर लोगो को अपने दायरे में लाओ।
9- बात बहस नहीं, एक्शन करो, निपटा दो।
10- नाखुश और बदकिस्मत लोगों से दूर रहें।
11- लोगों को अपने पर निर्भर बनाये रखो।
12- सलेक्टिव ईमानदारी और उदारता दिखाओ।
13- मदद मत मांगो, सौदा करो।
14- दोस्त बनकर रहो, जासूसी करते रहो।
15- दुश्मन को पूरी तरह कुचलकर खत्म कर दें।
16- महत्वपूर्ण अवसर पर गायब हो जाएं, इंपोर्टेंस बनेगी। 
17- दूसरों को टेटर में रखें। अप्रत्याशित व्यवहार करें।
18- सुरक्षित किले मत बनाएं, अकेलापन खतरनाक है।
19- अपने से वजनी पहलवान से पंगा न लें।
20- किसी से वादा/कमिटमेंट न करें।
21- सामने वाले के सामने मूर्ख दिखे, और फंसा लें।
22- मूर्ख बनकर मूर्ख को फंसाएं
23- सरेंडर का नाटक करें, मौका पाकर हमला करें।
24- अपनी ताकत को केंद्रित रखें, रिसोर्स न बिखराएँ।
25- परफेक्ट दरबारी बनें।
26- खुद को री इन्वेंट् करते रहें।
27- अपने हाथ साफ रखें। गन्दा काम दूसरे से करायें।
28- पर्सनालिटी कल्ट बनायें।
29- एक्शन में हिम्मत और साहस से उतरें।
30- अंत बिंदु तक की प्लानिंग करें।
31- उपलब्धियों को दिखायें की बड़ा आसान था
32- शत्रु के विकल्प नियंत्रित करें, अपने दिए विकल्प से ही खेलने दे।
33- दूसरों की इच्छाओं से खेलें।
34- कमजोरी तलाश करें, उसी से चूड़ी टाइट करें।
35- खुद को राजसी तरीके से पेश करें, राजा जैसा बर्ताव करें।
36- टाइमिंग की कला में माहिर बनें।
37- जो नहीं मिल सकता, उसे घटिया कहो।
38- नयनाभिराम इवेंट रचो
39- सोचें जैसा चाहें, लेकिन बर्ताव वो सुंदर हो।
40- पानी में बवंडर बनाकर मछली पकड़ें।
41- मुफ्त के माल के ट्रेप दूर रहें।
42- महान व्यक्ति के जूतों में पैर न डालें।
43 - चरवाहे को मार डालो, भेड़ें बिखर जाएंगी।
44- दूसरों के दिल और दिमाग से खेले।
45- नकल (मॉक) करके गुस्सा दिलाएं।
46- बदलाव का उपदेश दें, लेकिन ज्यादा सुधार न करें।
47- कभी बहुत परफेक्ट न दिखें।
48- आकारहीन बनें।
●●
किताब पॉवरफुल है, प्रैक्टिकल है। पर आप कितना प्रैक्टिकल होना चाहते है, आप पर निर्भर है।

मेरी समझ में यह बेईमान, धोखेबाज, स्वार्थी, क्रूर, ड्रामेबाज, नकली आदमी और असली रोबोट बनाने की किताब है। इसे पढ़ने वालों से सावधान रहिये।

उसे अपनी कीमती चीज- धन, भरोसा, वोट, बिजनेस पार्टनरशिप, या राज्यसभा की सीट कतई मत दीजिये
●●
आम आदमी पार्टी के मितरों से क्षमा, यह पोस्ट जरा पहले लिखनी चाहिए थी। लेकिन आपको जब से झाड़ू मिली है, कचरा ही बटोर रहे हो।

भाजपा वाले न पढ़ें। तुम्हारे तो गैंग में सबई इसी कैटगरी के हैं। तुम धोखेबाजी में प्राकृतिक प्रतिभा के धनी हो। ये लल्ला किताब पढके तुमको क्या ही धोखा देगा।