Saturday, August 8, 2015

चौपाल, यूरोप और खाप!


हरयाणा के जाने-माने पुरातात्विक वैज्ञानिक सर रणबीर सिंह फोगाट की भारत की 3 लाख किलोमीटर से ज्यादा की यात्रा और 35 साल से ज्यादा की खोज के तथ्यों व् अनुभव के अनुसार खापलैंड पर जो सार्वनजिक सामाजिक चौपाल-परस {इंग्लिश में कम्युनिटी हॉल (Community Hall), फ्रेंच में होटल-दु-विल (Hotel-de-Ville} का कांसेप्ट है यह सिवाय खापलैंड के पूरे भारत में कहीं नहीं मिलता। क्योंकि यह कांसेप्ट खापों का कांसेप्ट है इसलिए यह खापलैंड पर ही मिलता है, बाकी भारत में कहीं भी ऐसी कांसेप्ट या ऐसे चौपालें नहीं मिलती हैं। सर के अनुसार यह कांसेप्ट भारत में और कहीं नहीं है सिवाय खापलैंड के।

जब मैं यही France के मामले में देखता हूँ तो ठीक खापलैंड के हर गाँव में जैसे चौपाल होती हैं, वैसे ही यहाँ होटल-दु-विल (Hotel-de-Ville) होते हैं यानि सोशल कम्युनिटी सेंटर होते हैं। ऐसे ही कम्युनिटी हॉल इंग्लैंड, बेल्जियम, जर्मनी वगैरह में भी सुनने को मिले हैं। हालाँकि मुझे फ्रांस में रहते हुए और काम करते हुए काफी अच्छा अरसा हो चुका है परन्तु आज ऐसे ही वीकेंड पे लिल्ल शहर की गलियों में घूमते-घूमते दिमाग में बात टकराई और ऐसी टकराई की इतनी बड़ी अनालॉजी (समानता) निकली कि यूरोपियन कल्चर के साथ खाप कल्चर की यह समानता देख मन गद-गद हो उठा।

इस अनालॉजी में खाप और यूरोप की तुलना बैठती देख खापलैंड पर रहने वाली गैर-खाप जातियाँ यह जरूर कहना चाहेंगी कि खापों के यहां क्या अलग से हैं, हमारे यहाँ भी बनी हुई हैं। तो इस पर यही कहूँगा कि हैं जरूर हैं परन्तु अगर यह कांसेप्ट आपका है तो आपकी जाति के जो लोग खापलैंड से बाहर के भारत में रहते हैं वहाँ यह चौपालें क्यों नहीं है?

यहां जोड़ता हुआ चलूँ कि खापलैंड के क्षेत्र में इसी हेरिटेज के आधार पर सरकारी योजनाओं से विशेष पैकेज दे दलितों के यहां 1980-90 के दशक में ताऊ देवीलाल ने हर गाँव में हरिजन चौपाल बनवाई।

मेरे नेटिव समाज की सोशल इंजीनियरिंग व्यवस्था से एक और लोकतान्त्रिक कांसेप्ट का उद्भव और यूरोप से उसकी समानता मिलना गर्व की बात है।

Jai Yauddheya! - Phool Malik

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