Tuesday, 5 November 2024

कनाडा में जो मंदिर वाला मुद्दा उछाला गया है, उस पर कोई अटैक नहीं हुआ है!

 कनाडा में जो मंदिर वाला मुद्दा उछाला गया है, उस पर कोई अटैक नहीं हुआ है: सुनने में आया है कि वह एक परी प्लांट मंडी और फंडियों द्वारा हमारे विशेष कर जाट बच्चों के खिलाफ एक रची गई साजिश है अतः हम सर्व खाप पंचायत की तरफ से अपने बच्चों से आग्रह करना चाहेंगे के ऐसे धर्मांध पाखंडी व्यक्तियों से दूर रहे। और आप जिस भी देश में हैं उसे देश के प्रति अपनी वफादारी का सबूत दे किसी बाहरी साजिश का शिकार ना हो आपके माता-पिता ने आप बच्चों को अपना निर्वाह करने के लिए भेजा है। यहां स्वास्थ्य शिक्षा विकास रोजगार सब कुछ समाप्त हो चुका है आपसी संबंध विच्छेद करके भाई किया जा रहा है लोकतंत्र की हत्या देख रहे हैं और उसी को देखते हुए आप अपनी जमीन गिरवी रख के विदेश तक पढ़ाई के लिए, नौकरी के लिए या रोजगार के लिए गए हो तो आप अपनी जिम्मेवारी के प्रति सजग रहे हैं और विशेष कर कनाडा वाले मामले में तो आपने धर्मनिरपेक्षता का पालन करते हुए अपने कौम के प्रति वफादारी निभाते हुए ऐसी घिनौनी पाखंडवादी हरकतों से दूर रहे और कनाडा के प्रति अपनी वफादारी का फर्ज निभाने की कोशिश करें। वहां आपके जाट सिख छोटे भाई भी बहुत मिलेंगे जो आपकी मदद करने के लिए तत्पर रहेंगे,घबराने की कोई आवश्यकता नहीं लगन और मेहनत से कनाडा देश के प्रति वफादारी निभाते हुए अपने कार्य में लीन रहे।

यह खुद पर विक्टिम कार्ड खेलने की सोच रहे थे; परन्तु फ़ैल हो गया है और जो हरयाणा या जाट शब्द के नारे प्रयोग हुए हैं वह सिर्फ इन दोनों शब्दों की "ब्रांड-वैल्यू" से डराने के लिए प्रयोग हुए हैं; जो कि जाट की आड़ में जाट से मिलती-जुलती जातियों के लड़को से करवाए जा रहे हैं; हाँ एक आध% बताए गए हैं आरएसएस बीजेपी समर्थक जाट भी वहां,परन्तु वह अग्रणी नहीं हैं और ना ही उनके पास इतनी फुरसत| 


आपके घर वालों ने जमीनें गिरवी रख के, लोन उठा-उठा के वहां भेजो हो, वहां; यह तथाकथित कोई मनुवादी नहीं आने वाला तुम्हें मुसीबत में पड़ने पर बचाने के लिए और आएगा तो तुम्हारी ही जेबें खाली करवाएगा| सिर्फ लठ तुम्हारे हाथ में फ्री के जरूर पकड़ा देंगे, इसके अन्यथा तुम्हें फाक्का नहीं है| इतने ही तुम इनको प्रिय होते तो यह तुम्हें इंडिया में ही रोजगार दिलवा देते| यहाँ तुम्हारे साथ 35 बनाम 1 करने वाले वहां तुम्हारे कैसे हो जाएंगे? किसान आंदोलन, मणिपुर कांड से ले पहलवान आंदोलन में अपनों का हर्ष देख चुके हो? इसलिए कोई फंडी तुम्हें बहलाने-फुसलाने भी आए तो दूर रहना इनसे;  रोजगार करके, घर की गरीबी दूर करने या जिंदगी सेट करने गए हो तो उसी पे ध्यान रखो| धर्म के नाम पे अपने पुरख-आध्यात्म, अपने पूर्वजों के बताए हुए रास्तों  को आगे रख के चलो, उसी में मुक्ति है इस पॉइंट की! अन्यथा वही बात, आज भी तुम्हारे माँ-बाप कहीं ना कहीं DAP की लाइन में खड़े होंगे; कहो जरा इनको कि उनको खाद ही टाइम पे व् सहूलियत से दिलवा देवें ये; दो मिनट में कितने अपने हैं सब समझ आ जाएगा! यह धर्मांधता आपके भविष्य के लिए कुछ नहीं काम आने वाली।

   11 दिसंबर 1995 का सुप्रीम कोर्ट का भी आदेश है हिंदू कोई धर्म नहीं यह एक जीवन पद्धति है हिंदू शब्द एक गाली गलौच का विदेशी शब्द है

   अतः हमारी प्रार्थना है कि इन सब धर्मवादी भावनाओं में न भर के ना ही इनके बहकावे आएं और इन चीजों से दूर रहकर जिस देश में भी हो उस देश के प्रति वफादारी से अपना कार्य करते रहे और अपना जीवन निर्वाह करें।

  डॉ ओमप्रकाश धनखड़ प्रधान धनखड़ खाप, कोऑर्डिनेटर सर्व खाप पंचायत।

      सुमन हुड्डा प्रदेश अध्यक्ष सर्वखाप महिला विंग हरियाणा, तथा प्रदेश अध्यक्ष भारतीय किसान यूनियन (चडूनी)

     अतर सिंह काध्यान प्रवक्ता काध्यान खाप एवं अध्यक्ष व्यापार मंडल बेरी झज्जर।

इस संदेश को अपने तमाम ग्रुप्स व् सर्किल में फैला दीजिए!

Friday, 1 November 2024

पश्चिमी उत्तर प्रदेश मे रक्षाबंधन बिलकुल भी नही मनता था ,लेकिन भाईदूज पर भाई जरूर जाते थे!

 पश्चिमी उत्तर प्रदेश मे रक्षाबंधन बिलकुल भी नही मनता था ,लेकिन भाईदूज पर भाई जरूर जाते थे । उस समय चिट्ठी और फोन जैसी सुविधा तो थी नही ,तो त्योहार ही एक ऐसा समय होता था ,जब बहन भाई का इंतजार करती थी । बरसात के मौसम के बाद इन दिनो गेंहू की बुआई हो जाती थी ,तो किसान को भी समय मिल जाता था , तब खील बताशे लेकर भाई बहन के घर जाते थे । अगर भाई किसी कारणवश नही जा पाये तो बहन भाई के लिए एक गोला उठाकर रख लेती थी ,क्योंकि गोला लम्बे समय तक खराब नही होता ।जब भी बहन मायके जाती थी तो यही गोला भाई के लिए ले जाती थी । हमारे बागपत ,शामली ,मुजफ्फरनगर, मेरठ मे भाईदूज पुराने समय से मनाया जाता रहा है ।  जबकि हापुड गाजियाबाद, बुलंदशहर अलीगढ इस तरफ भाईदूज का चलन पहले नही था ।ये लोग रक्षाबंधन को ज्यादा महत्व देते हैं । पिछले साल किसी ने लिखा था कि गोबरधन हमारा त्योहार नही है , मै अपने यहां देखती थी गोबरधन पर बडो को कहते सुना है । भाई आज तो म्हारा त्योहार (तुहार ) है । गोवर्धन पर सारे खेती के औजार ,बैल ,दूध ,दही से संबंधित सामान हांडी ,रई,बिलौनी ,हल पात्था गन्ने सब कुछ रखा जाता था । और प्रसाद स्वरूप सबके यहां गन्ना ही बंटता था । गोवर्धन से पहले बाबा किसी को भी गन्ना नही चूसने देते थे । हर क्षेत्र मे त्योहार मनाने का कारण अलग अलग परिस्थितियों पर निर्भर करता था ।


Anita Chaudhary Meerut

Thursday, 31 October 2024

उज्जड़ कुआ बाट देखरया नेज्जू की पनिहारी की।

 उज्जड़ कुआ बाट देखरया नेज्जू की पनिहारी की।

ल्या री सासू दे दे झाकरी ,भर लाऊं मैं पाणी की ।
सच्चे घोट्टे की काढ चूंदड़ी, कंद का दामण भारी दे दे
टूम ठेकरी गळ की गळसरी,गात्ती-पात्ती सारी दे दे।
हाथां के हथफूल काढ दे,जूती पै फुलकारी दे
पिंडी ऊपर मोर मोरणी , कड़ी छैलकड़े भारी दे दे।
नाड़ा दे घूंघरूआं का, तागड़ी मेरी प्यारी दे दे
आंख्या पर दो तिल खिणवादे , ठोड्डी पै टिकारी दे दे।
ऊंचा चूंडा बंधवा दे मेरा नाई की न बुलवा कै
चूंडे ऊपर लगा बोरला मोती मणिए जड़वा कै।
बाळां के मैं किलफ लगा चाँदी की देखै बणवा कै
धोळा कुड़ता पहरूंगी आजदर्जी के पै सिमवा कै।
पाँच शेर की टूम टमोळी आज पहरा मनै तुलवा कैं
संगी सवेहली जेठाणी मेरी देख मन्नै पड़ैं गस खा कैं।
कान कै पाच्छै कर काळा टीका
ना लगै टोक किसे स्याणी की
ल्या री सासू दे दे झाकरी, भर लाऊं मैं पाणी की ।

Sunita करोथवाल

Monday, 28 October 2024

डेह जाट - आफताब अहमद व मामन खान जाट जाति से हैं!

इस बार मेवात क्षेत्र से जो तीन मुस्लिम विधायक बने हैं उनमें से दो आफताब अहमद व मामन खान जाट जाति से हैं, पर इस ओर शायद ही किसी का ध्यान गया हो | इसका कारण है धर्म। नस्ली भाईचारे के बीच धर्म एक बहुत बड़ी दिवार है, जोकि दोनों तरफ से ही खड़ीं की जाती है। अगर कोई अपने को जाट का बेटा कह दे तो धर्मों के ठेकेदार तोहमत लगानी शुरू कर देते हैं, गुरु पीर पैगम्बरों की दुहाई देना शुरू कर देते हैं। लोग अपना कबीला बढ़ाते हैं, परन्तु जाट एक ऐसी जाति है जो अपना ही कबीला घटाने में विश्वास रखती है और इसीलिए देहात में एक आम कहावत है कि “जाटड़ा और काटड़ा (कट्टा) अपने को ही मारते हैं। रहबरे आज़म चौधरी छोटूराम कहते हैं – ‘जट्स एंड संसार (मगरमच्छ) कबील गालदा‘ , यह हमारी कौम की कमजोरी है। हमारे विरोधी सब अवसरों पर इसका लाभ उठाते हैं।

“ का , कबूतर , कम्बो कबील पालदा ,
जाट , मया , संसार कबील गालदा “
बिलकुल सही कहा है, कौवा कबूतर आदि सब अपना कबीला पालते हैं, पर जाट, झोटा, मगरमच्छ ऐसे हैं जो अपने कबीले का ही नुकसान करते हैं। जाट दूसरों के बहकावे में आकर खुद को बांटता आया है। चौधरी छोटूराम एक ऐसे रहबर हुए जिसने इनको एक झंडे निचे एक किया था, इनको इनके एक्के इकलास की ताक़त का एहसास करवाया था। परन्तु अफ़सोस कि उनके जाने के बाद इन्होने बिखरने में महीने भी नहीं लगाये। मैं आज के हरियाणा की बात करूँ तो आज कुछ गिनती के ही लोगों को पता होगा कि हरियाणा के मेवात क्षेत्र में जो मुस्लिम हैं उनमें बहुल संख्या मुस्लिम जाटों की है। गिनती के लोग ही जानते हैं कि अलवर रजवाड़े के विरुद्ध जो आन्दोलन हुआ था वह यूनियनिस्ट पार्टी के चौधरी मोहम्मद यासीन खान की अगुवाई में हुआ था, वह कौन थे किस जाति किस गोत्र के थे? चौधरी मोहम्मद यासीन खान धैंगल 1936 में यूनियनिस्ट पार्टी से पंजाब अस्सेम्ब्ली के सदस्य भी बने थे और इनको चौधरी छोटूराम के 14 हनुमानों में से एक माना जाता था। चौधरी मोहम्मद यासीन खान डागर/धैंगल गोत्र के जाट थे और इन्हीं के पौत्र जाकिर हुसैन इस बार बीजेपी की तरफ से चुनावी मैदान में थे। जाकिर हुसैन चुनाव हार गए और कांग्रेस से आफ़ताब अहमद धैंगल (डागर) चुनाव जीते। ऐसे ही फिरोजपुर झिरका से कांग्रेस के उम्मीदवार मामन खान की जीत हुई। इनके बारे में भी लोग सिर्फ इतना ही जानते होंगे कि कोई मेव मुस्लमान होंगे। जबकि मामन खान भी जाट है और इनका गोत्र गोरवाल है।
धैंगल असल में डागर गोत्र की ही पाल/खाप बताई जाती है। बृज क्षेत्र में जिन जाटों ने धर्म परिवर्तन किया उन्हें डेह कहा जाने लगा। डेह यानि जो डह गया। 11 वीं सदी में मेवात क्षेत्र में लोगों ने इस्लाम अपनाना शुरू किया था। बृज क्षेत्र के डागर पाल के जिन जाटों ने इस्लाम अपनाया उन्हें डेह जाट कहना शुरू कर दिया। डागर पाल के इन मुस्लिम जाटों का गोत्र डागर से धीरे धीरे कब कैसे धैंगल हुआ इसकी जानकारी आज खुद इनके ही लोगों को बहुत कम है।| ऐसे ही मामन खान जिनका गोत्र गोरवाल है, इस गोरवाल का इतिहास यह बताया जाता कि इनकी वंशावली महाराजा सूरजमल से जाकर मिलती है। ऐसे ही हथीन से मरहूम जलेब खान विधायक होते थे, जिनके बेटे इजराइल ने इस बार कांग्रेस की टिकट पर हथीन से चुनाव लड़ा था। जलेब खान अक्सर कहते थे कि मैं रावत गोत्री जाट हूँ।
मेवात में मुस्लिम जाटों को डेह कहने का नुकसान ये हुआ कि अब इन्होने अपने मूल गोत्र की बजाए पाल/खाप के नाम पर ही गोत्र लिखने शुरू कर दिए, जैसे कि धैंगल ,छिरकलोत आदि। मेवात में पालों का नक्शा पोस्ट के साथ लगाया है। मेवात में सहरावत, तंवर, पंवार,देशवाल, डागर,बडगुर्जर आदि ऐसे कई मुस्लिम जाट गोत्रों के गाँव हैं जो साथ लगते पलवल क्षेत्र में हिन्दू जाट गोत्रों के गाँव हैं। ये डेह जैसे बेतुके शब्दों का पूरा-पूरा फायदा उठाया कुछ पोंगा-पंथी इतिहासकारों ने, इन्होने इन मेवाती जाटों के दिमाग में कुछ नया ही इतिहास डाल दिया, जिस कारण आज ये खुद अपने मूल से हटकर पोंगा-पंथी इतिहास का शिकार हो कर अपने मूल से कट चुके हैं। इस लेख में मेरे कहने का सार यह है कि कब तक आखिर ऐसे बंटे रहेंगे? जब रहबरे आज़म चौधरी छोटूराम की बात करते हो तो उनके सूत्र को भी समझो। कबीलदारी कैसे होती है यह सर छोटूराम के फलसफे से समझो, न कि कट्टर पोंगे-पंथियों के फलसफे से। कब तक इन पोंगे पंथियों की बातों में आकर डहते रहोगे? नस्ली इतिहाद ही हमारी असली ताकत है और यही हमारे रहबर चौधरी छोटूराम का सन्देश था। अगर दिल से रहबरे आज़म का सम्मान करते हो तो उनके सन्देश का भी सम्मान करो, वरना फिर उनके प्रति हमारा यह सम्मान सिर्फ ढोंग ही है और यह बात सभी के लिए हैं चाहे वह किसी भी आस्था को मानने वाला हो।
यूनियनिस्ट राकेश सिंह सांगवान

Wednesday, 23 October 2024

#जाट_के_खिलाफ_पैंतीस_बनाम_एक_क्यों___एक_विश्लेषण...

जिस जाति का आर्थिक प्रभुत्व नहीं होता, उसके खिलाफ कभी भी लामबंदी नहीं होती, चाहे उसकी संख्या कितनी भी क्यूं न हो। एक जाट ही नहीं राजपूतों के खिलाफ भी ध्रुवीकरण होता है, आप बाड़मेर, जैसलमेर, शिव ऐसी अनेक जगह देखेंगे जहां राजपूतों के खिलाफ ध्रुवीकरण होता है, हरियाणा में अटेली विधानसभा क्षेत्र देखिए, वहां यादवों के खिलाफ तगड़ा ध्रुवीकरण हुआ, हरियाणा के नांगल चौधरी में यादवों के खिलाफ तगड़ा ध्रुवीकरण हुआ और यह तो यदि कांग्रेस बादशाहपुर में किसी ब्राह्मण व रेवाड़ी में किसी बणिए को टिकट दे दे तो वहां भी तगड़ा ध्रुवीकरण हो जाए... तो जो भी जाति जिसके पास संसाधन होंगे, उसके खिलाफ ध्रुवीकरण होगा ही, यह अकेले जाटों की समस्या नहीं...


अगर हम मीणों की बात करें, तो उनके खिलाफ मीणा बहुल इलाकों में भी वैसा ध्रुवीकरण देखने को नहीं मिलता जैसा जाट इलाकों में जाटों के खिलाफ... क्यों? इसका कारण है, मीणा आपको नौकरियों में तो दिखेंगे, लेकिन अभी इनका बाजारों, दुकानों पर वैसा कब्जा नहीं है, जैसा जाटों का है। दौसा, सिकंदरा जैसे इलाकों में भी मीणाओं की कोई तगड़ी दुकानें नहीं मिलेंगी आपको, बिजनेस में कोई खास भागीदारी नहीं मिलेगी आपको मीणा लोगों की, यहां तक कि ये प्रोपर्टी डीलर भी नहीं हैं, प्रोपर्टी भी ये खरीद जरूर लेते हैं इनके अफसर, कर्मचारी वगैरह ऑनलाइन कहीं किसी कॉलोनी में कोई प्लॉट वगैरह, वो एक अलग बात है... लेकिन ये जाटों की तरह कोई कॉलोनाइजर हैं या इनका रियल एस्टेट का कोई बिजनेस है, ऐसा कोई लफड़ा नहीं है... जबकि जाट कॉलोनाइजर आपको हर छोटे-बड़े शहर में नजर आ जाएंगे, डीएलएफ, इंडिया बुल्स जैसी जाटों की रियल एस्टेट कंपनियां शेयर बाजार तक में लिस्टेड हैं... या कि दौसा से चलने वाली एसी कोच मीणा लोग चलाते हैं, ऐसा भी कुछ नहीं है जबकि इससे इतर जाट लोग ट्रांसपोर्ट के मामले में भी खासी दखल रखते हैं... एजुकेशनल इंस्टीट्यूट्स की बात करें तो आपको नीट-आईआईटी में बणियों के प्रभुत्व वाली एलन कोचिंग के पैरलल जाटों का आकाश एजुकेशनल इंस्टीट्यूट हर शहर में दिखेगा..., सीएलसी, गुरूकृपा जैसे छोटे-मोटे तो कई कोचिंग बन गए जाटों के... तो मीणा लोगों के खिलाफ ध्रुवीकरण इसलिए नहीं होता कि इनका सारा फोकस नौकरियों पर है... 


अब जाटों के साथ समस्या क्या है कि वो फर्नीचर की दुकान भी खोल लेगा, नाई का सैलून भी खोल लेगा, माली वाला काम भी कर लेगा (नर्सरी या सब्जी की दुकान), मिठाई की दुकान भी खोल लेगा,... तो मूल कारण यह है जाटों के विरोध का, जो भी जाति सामाजिक तौर पर, आर्थिक तौर पर वर्चस्वशाली होगी, उसका विरोध होगा ही... अब इससे इतर राजपूत आपको कहीं नहीं मिलेगा जो मिठाई की दुकान खोल लेगा या सब्जी की दुकान खोल लेगा तो राजपुरोहित से या माली से राजपूत का टकराव क्यों होगा? तो ये जो जाटों की समस्याएं हैं, वे आर्थिक वर्चस्व की समस्याएं हैं और ये रहेंगी ही, इस विरोध का अब कोई उपाय नहीं है, इसको आपको अब झेलना ही पड़ेगा, स्वीकार करना ही पड़ेगा...


मतलब बात आ गई दूसरों के अङने वाली, जैसे बणिए हैं, बाजार में हैं, अपना व्यापार कर रहे हैं, उनकी पुरानी दुकानें हैं... दूसरों के अङना कब होता है? जब आप उनके क्षेत्र में जाकर उनकी संपत्ति खरीदो... अब बणिए हैं तो वो अपनी जगह हैं, ऐसे थोड़े ही कर रहे हैं कि वो गांवों में आ गए, वहां जाटों की जमीनें खरीदने लग गये, ट्यूबवेल लगा लिए, ऐसा तो नहीं हुआ न, मतलब जो परंपरागत सामाजिक व्यवस्था है, आर्थिक व्यवस्था है, उसमें असंतुलन जाट पैदा कर रहे हैं, विरोध का मूल कारण यह है... और मुझे नहीं लगता कि इसका कोई इलाज भविष्य में निकलेगा...


इस विरोध से बचने का उपाय तो सिर्फ एक ही है कि या तो जाट भी 5-5 बच्चे पैदा करें, कोई पुचके बेच रहा, कोई बसों में खलासी बन रहा, इस तरह की जेनरेशन पैदा करो ‌या फिर वस्तुस्थिति स्वीकार कर लो...


बाकी जाट बोलने में अक्खड़ है, उस वजह से विरोध है, ऐसा कुछ नहीं है, वो चीजें तो बहुत पीछे छूट चुकी...

तब तक आप इस पुराणे इतिहास को महशुस करी - घेर

ग्रामीण भारत की घर घेर प्रणाली एक मजबूत सामाजिक व्यवस्था का आधार।

हरियाणा के भीतरी इलाकों में घुमने के बाद एक पुरातन व्यवस्था की ओर ध्यान गया जो इस इलाके से लेकर राजस्थान व उत्तरप्रदेश तक प्रचलित है।

रहने के लिए सब जगह जैसे घर होता है यहां घर के अलावा एक घेर भी होता है।

घर पर महिलाओं का अधिपत्य होता है जबकि घेर में पुरुष सत्ता का अधिपत्य होता है।

घेर में उठने बैठने बातें करने और स्वतंत्र रूप से आने जाने की समाजिक सुविधा होती है।


घेर और घर के बीच में एक लॉजिस्टिक सप्लाई लाइन होती है जिसे अक्सर युवा मैनेज करते हैं। चाय खाना जैसे जिसकी जरूरत होती है युवा दौड़ लगाते रहते हैं।

जिन जातियों समाजों ने घर घेर की व्यवस्था बनाई हुई है वो समाजिक रूप से ज्यादा समृद्ध है। उनकी सामाजिक बॉन्डिंग बाजारवाद के इस युग में भी बची हुई है कायम है और मजबूत है।

घर में आने जाने से बाहरी लोग हमेशा परहेज ही करते हैं क्योंकि हमारी संस्कृति ही ऐसी है इसीलिए सब लोग निर्बाध रूप से आ जा सके तो घर के एक्सटेंडेड वर्जन घेर का आविष्कार किया गया था।

कुछ दिन पहले मे जीद जिले म एक मित्र के घेर में रुके था जहां उनके पिता जी और चाचा जी व उसके  मित्रों  से भी मुलाकात हुई थी।

चाय के दौर चलते रहे और हंसी मजाक ठठा भी खूब हुआ।

घेर में आम तौर पर पशु भी होते हैं जहां उनका बेहतर ध्यान रखा जाता है।

मित्र के पिता जी ने आज के मॉडर्न दौर में घेर की प्रासंगिकता पर बात हुई तो उन्होंने बताया कि फ्लैट सिस्टम या एकल घर प्रणाली में जहां घेर नहीं होता है वहां महिलाओं और पुरुषों को एक ही छत के नीचे सारा दिन रहना पड़ता है तो वे ज्यादा खटपट और खिंचाव को महसूस करते हैं।

हम सारा दिन घेर में रहते हैं वहीं से अपने सारे प्रोफेशनल और सोशल अफेयर्स मैनेज करते हैं जिससे घर पर अनावश्यक साईकोलॉजिकल दबाव नहीं बनता है और भाईचारा भी बेहतर मजबूत होता है।

घेर का कंट्रोल सीनियर बुजुर्गों के हाथ में रहता है छोटे बालकों की वहां ट्रेनिंग चलती रहती है। घेर के सभी काम बालकों को सीनियर्स की देख रेख में करने होते हैं


घेर के बिना घर मुझे अधूरे जैसा लगने लगा है।

आज से अगले 10 दिन तक छत्तीसगढ मे कुछ भाइयो से उनके फार्म व घेर पर मुलाकात करने की कोशिश करुगा 

सब भाइयो को नमस्कार राम राम  🙏 सतीश दलाल 🙏

Tuesday, 22 October 2024

हमारे घर में चार धुंए की फैक्टरियां थी!

जब हम छोटे थे तो हमारे घर में चार धुंए की फैक्टरियां थी। उनमें से एक तो पार्ट टाइम थी। यानी चूल्हे पर सुबह- शाम खाना और रोटियां बनती थी। दूसरी फैक्ट्री होती थी, जिसमें गर्म होने के लिए दूध रखते थे, वह लगभग 8 घण्टे धुंआ छोड़ती थी। तीसरी फैक्ट्री थी, जिस पर पशुओं के लिए बिनोले पकते थे। और चौथी फैक्ट्री थी, जिसमें सभी के लिए पानी गर्म होता था। इसके इलावा सर्दियों में गर्मी के लिए खूब भूसा जलाया जाता था। इसके इलावा पशुओं के मच्छरों से बचाव के लिए भी धुआं करते थे। इसके इलावा धान की पैराली भी जलती थी। इसके इलावा, खास कर आज से पंद्रह दिन पहले, कोल्हू भी चलने लगते थे, और वहाँ दिन रात गुड़ पकता था। औऱ ऐसी फैक्टरियाँ घर- घर होती थी। यानी एक गांव में हजारों फैक्टरियाँ ,और अकेले हरियाणा में लगभग 6600 गांव और शायद 9000 के करीब पंजाब में।

लेकिन किसी ने गांव, देहात, किसान को प्रदूषण के लिए आरोपित नही किया। अब लगभग देहात के सभी धुंआ उद्योग बन्द हो चुके हैं। केवल एक पराली जलाते हैं लेकिन इन हराम खोरों ने किसान को बदनाम कर के रख दिया। उल्टा चोर कोतवाल को डांटे।सारा प्रदूषण केवल और केवल इंडस्ट्री/उद्योग/ फैक्ट्री से होता और बदनाम गरीब किसान को करते हैं। और ऐसे ही ये कर्णधार हैं, जिनको हम ही चुन कर भेजते हैं। और ज्यादातर हैं भी गांव देहात से, लेकीन चु भी नही करते।
Dr Mahipal Gill

लेवा पटेल, कड़वा पटेल!

गुजरात के कड़वा पटेल और लेवा पटेलो से सम्बंधित Pratap Fauzdar जी की एक पोस्ट पढ़ी। फ़ौजदार जी की पोस्ट से मुझे राजकोट के विठलभाई जी हिरपरा जी की मुलाक़ात याद आ गई। विठलभाई हिरपरा जी लेवा पटेल हैं और गुजरात शिक्षा विभाग से बीओ या डीओ की पोस्ट से रिटायर हुए हैं।


2011-12 की बात है, मैं गुड़गाँव के सेक्टर 56 में केंद्रीय विहार हाउसिंग सॉसायटी के सामने की गली में रहता था। उन दिनों विठलभाई पटेल जी अपने बेटे Ketan Hirpara से मिलने गुड़गाँव आए हुए थे। केतनभाई केंद्रीय विहार में रहते थे। केंद्रीय विहार सॉसायटी के मुख्य गेट के सामने एक मिश्रा चाय वाला था। विठल जी उन मिश्रा चायवाले के पास चाय पीने गए और मिश्रा से पूछा कि सुना है हरयाणा में जाट बहुत हैं, मुझे किसी जाट से मिलवाओ। मिश्रा ने कहा, आप गुजरात के पटेल हैं, आपको जाट से मिलकर क्या करना है। विठल जी ने कहा, हम भी जाट ही हैं। इन दोनों की ये वार्तालाप चल ही रही थी कि वहाँ समर कादियान भाई चाय पीने पहुँच गया। मिश्रा ने दोनों की मुलाक़ात करवाई। समर भाई विठल जी को मेरे पास ले आए, बताया कि विठल जी गुजरात से हैं और कह रहें हैं कि ये भी जाट हैं, जाटों से मुलाक़ात की इच्छा है। तब विठल जी से लेवा पटेलों के गोत्रों, रीति-रिवाजों के बारे में विस्तार से बात हुई। लाहौर से आए थे तो नाम लेवा पड़ा। तब मुझे पहली बार पता चला था कि गुजरात में पटेल दो बड़े धड़े हैं, कड़वा पटेल और लेवा पटेल, कड़वा पटेल ख़ुद को गुर्जर शाखा का मानते हैं तो लेवा पटेल जाट। विठल जी के ससुर सांसद थे और वो चौधरी चरण सिंह और चौधरी देवी लाल के काफ़ी क़रीबी थे। विठल जी ने बताया कि जब चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री बने तब चौधरी साहब ने कहा कि हम एक हैं, और इसी बात पर गुजरात के पटेल सांसदों ने श्री मोररजीभाई देसाई के साथ की बजाए चौधरी चरण सिंह का साथ दिया था। उसके बाद जब चौधरी देवी लाल केंद्र में गए तब चौधरी देवी लाल का साथ दिया।

फोटो 1990 की है। फोटो में विठलभाई पटेल जी के छोटे भाई Rameshbhai Bachubhai Hirpara चौधरी देवी लाल जी को फूलों की माला पहना रहें हैं।

ख़ैर, इतना पक्का है कि कड़वा पटेल और लेवा पटेल दोनों किसान क़ौमें हैं और इनका सम्बंध जाट व गुर्जरों से जरूर हैं। वक़्त के साथ धीरे धीरे अलग होते गए।

By Rakesh Sangwan



Monday, 21 October 2024

आज जो प्लेन जमीन आपको दिखाई देती हैं।

जो काफी लोगों को तकलीफ़ भी देती हैं।

आज से #500 .,700 साल पहले ये ऐसी नहीं थी। ऊंचे नीचे टीले थे, जिसे हमारे #पूर्वजों ने #बैलों_से_जोत के समतल किया है।
ये जमीन किसी #नवाब_राजा ने जागीर में नहीं दी है, ये कमाई गई है।और जमीनें तो सभी के पास थी, अगर आज आपके पास नहीं बची है तो अपने #पूर्वजों से पता कीजिए की क्या किया उन्होनें अपनी जमीन का।
आज तो #ट्रैक्टर_और_साधनों का ज़माना है, सोच के देखिए क्या संघर्ष किया होगा उन पीढ़ियों ने जिन्होंने #बैलों_से_खेती की है। किसान खुद भी #बैल_की_तरह अपने आप को जोत में जोड़ देता था,#कंधे_पर_हड्डी 4 इंच उभर आती थी, कमर कुबड़ी हो जाती थी, #कुएं_से_पानी निकालने के लिए पूरे #परिवार_को_ऊंट की तरह काम करना होता था, #नहरों_रजवाहों का पानी चलाने के लिए हफ्तों घर जाना नसीब नहीं होता था।
यहां आकर 200 rs के नेट पैक के माध्यम से कुछ भी बकवास करना तो काफी सरल है।
Andy maan

Sunday, 20 October 2024

Jat and Festival Economy!

 जब हम भाई बहन टीवी में किसी व्रत या त्योहार का सेलिब्रेशन देख उत्साहित होते तो हमारी माँ डाँट लगाते हुए कहतीं, “ये सब बाहमन बनिया के काम हैं.”

जवान हुआ और यूनिवर्सिटी में चार अक्षर सीख आया तो मैंने माँ को जातिवादी डिक्लेअर करते हुए कहा, “आप हर बात में दूसरी जातियों को गालियाँ क्यों निकाल फेंकती हैं. त्योहार तो त्योहार होता है. क्या बनिये का क्या बाहमन का क्या जाट का.”
वह कुछ देर चुप रहीं. फिर बड़ी सहजता से बोलीं, “हम वे त्योहार नहीं मनाते जो फसल कटने के बाद आते हैं. वे हाथ आयी पूँजी को खर्च करवाने वाले रिवाजों के साथ आते हैं. हम वे त्योहार मनाते हैं जो फसल जुताई और पकाई के समय आते हैं. ताकि हम फसलों के उगने और फिर पकने का उत्सव मना सकें. बाहमन बनिये का तो मैं इसलिए कह देती हूँ क्योंकि इनके पास खर्च करने के लिए पैसे होते हैं. दान-पुन करने के भी. नये लत्ते कपड़े ख़रीदने के भी. किसी से लिया देयी (उपहार देने लेने) करने के भी. ग़रीब का एक ही त्योहार होता है, जो कमाया है वो बच जाए. ताकि अड़ी-भीड़ में उधार न लेना पड़े.”
मैंने उन्हें जात पर कमेंट करने पर टोका तो वह आर्थिकता पर आ गयीं. देसी हिसाब से कमाई बचाने का गणित समझाने लगीं. बाज़ार की चालाकी समझाने लगीं. फिर कहने लगीं, “ग़रीब की के (क्या) जात. ग़रीब तो बाहमन भी दुखी अर जाट भी.”
माँ अब दुनिया में नहीं है, लेकिन अब भी वे त्योहार नहीं मना पाता जिनमें दस पाँच हज़ार खर्च होते हों, जबकि इतना खर्च कर सकता हूँ. इतने तो माँ भी खर्च कर सकती थीं, लेकिन उनकी सास यानी मेरी दादी की ग़रीबी ने उन्हें खूब ही कंजूस बना दिया था. किसी त्योहार पर उन्हें पैसे खर्च करते नहीं देखा. चूरमे या खीर में ही बेवकूफ बना लेती थीं हमें.

Journalist Mandeep Punia

Other side of Karwa Chauth

 ऐतिहासिक तौर पर जिन समाजों में विधवा औरत को पुनर्विवाह की इजादत नहीं रही है, जिनमें विधवा औरत को मनहूस बता के काल-कोठरों में रखने की रीत रही है व् जिन समाजों में विधवा औरत को अपशकुनी मान ब्याह-शादी जैसे पारिवारिक मौकों से घरों में दूर रखा जाता है; जहाँ सती-प्रथा व् जोहर-प्रथा रही हैं; उन समाजों का त्यौहार रहा है "करवा-चौथ"| उन समाजों की औरतें उनके यहाँ की विधवा औरतों के दयनीय हालात देख के, उनके वहां की विधवा वाली जिंदगी ना जीनी पड़ जाए; इसलिए डर के मारे यह त्यौहार मनाती हैं| खाप-खेड़े-खेतों की उदारवादी जमींदारी मानने वाले समाजों में तो औरत पर यह सब जुल्म व् भेदभाव रहे ही नहीं कभी| इनके यहाँ तो ऐसे सिस्टम रहे कि जिनके चलते कहवाते रही कि, "जाटणी कभी विधवा नहीं होती"; जिनका ब्याह के वक्त ही यह सीटनें बोल के भय 'विधवा-की-उपविदित-दर्दनाक-जिंदगी-जीने' का भय निकाल के विदा किया जाता रहा है कि, "लाडो हे ले ले फेरे, यू मर गया तो और भतेरे"| 


हमें दिक्क़त नहीं, कि कौन समाज इस त्यौहार को मनाते हैं, हो सकता है उनके पास इसको अच्छा बताने के बेहतर कारण भी मिल जाएं; परन्तु अगर अपनी कल्चर-किनशिप की इन थ्योरियों को समझे बिना इन त्योहारों मनाओगे तो 35 बनाम 1 में भी फंसोगे व् कंधे से ऊपर कमजोर भी कहे जाओगे| क्योंकि कॉपीराइटेड त्यौहार तो तुम्हारा यह है नहीं, इम्पोर्टेड त्यौहार है व् इम्पोर्टेड त्यौहार बनाम कॉपीराइटेड त्यौहार कौन समाज कितने मनाता है यह भी एक पैमाना है, भारतीय समाज में आपकी कंधे से ऊपर की मजबूती मापने का| 


और ऊपर से हास्यास्पद यह भी कि "आज जिस चाँद में पति ढूंढेंगी, कल उसी में बच्चों को चंदा-मामा भी दिखाएंगी"| फिर ही जो जहाँ खुश हो, वह रहे! परन्तु हमारे लिए यह औरत के अंदर भय संचालित करने, उसको और ज्यादा नाजुक बनाने का तंत्र ज्यादा है; उसको मर्दवाद में धकेलने का मोहब्ब्ती लहजा है|


Friday, 18 October 2024

धुर्र फिटे मुंह तेरा, यह दुःख कम क्यों नहीं होता रे - ये जाट तो यहाँ भी हाथ मार रहे हैं

"धुर्र फिटे मुंह तेरा, यह दुःख कम क्यों नहीं होता रे - ये जाट तो यहाँ भी हाथ मार रहे हैं" - तथाकथित 35 बनाम 1 के पटे पे चढ़ के बीजेपी को वोट देने वाले एक चिंटू का दर्द!


निसंदेह 2014 के बाद कल कोई रेगुलर भर्ती की बीजेपी ने हरयाणा में, C व् D ग्रुप में 25000 लोगों की| और इसमें भी 5435 जाट लग गए 21.7% लगभग हरयाणा में इनकी जनसंख्या के अनुपात के नजदीक ही मानिये जो कि 24-25% बताया जाता है, यादव भाई भी लगे 1242 (लगभग 5%, यादव भाईयों की हरयाणा में जनसंख्या है 8% के लगभग)| 


ये बीजेपी वाले 35 बनाम 1 की नफरत पे सवार हो इनको वोट देने वालों का सरकार बनते ही पहले ही दिन से मजाक लग गए बनाने? इतने जाट लगाने पे इनको तो कोई जाटराज, जाटों की सरकार कह के भी नहीं कोस सकता; जो कि अगर इतने जाट, कांग्रेस या इनेलो सरकार में लगे होते तो हर 35 बनाम 1 की बीमारी से ग्रस्त चिंटू "जाटराज-जाटराज" चिल्ला रहा होता!


परन्तु इस सब के बीच एक गंभीर समस्या बीजेपी दे रही है हरयाणा को; जिस पर इस हर 35 बनाम 1 की नफरत में सुलग रहे चिंटू को सोचनी होगी; और वह यह कि 129 जजों की भर्ती में 80% से भी ज्यादा बाहर के लगाए बता जा रहे हैं और उधर एक और दूसरी भर्ती में BDPO की 8 पोस्ट, 7 भर्ती किए, जिसमें 4 बाहर के, 3 हरयाणा के। तुम हरयाणवी ऐसे ही बीजेपी के दिए इस 35 बनाम 1 के नफरती शिगूफे में टूल-टूल इनकी सरकार बनवाते रहना; और इस तरह यह एक दिन तुम्हें अंग्रेजों के जमाने में ले जाएंगे, जहाँ A व् B ग्रेड जॉब पे अंग्रेज होते थे व् बाकी पे भारतीय; ऐसे तुम हरयाणवी होने वाले हो, A व् B ग्रेड जॉब पे गैर-हरयाणवी व् तुम हरयाणवी सिर्फ C व् D ग्रेड पे|

Sunday, 13 October 2024

मां बता रही हैं कि दादी के जमाने में रिश्ता करने से पहले!

लड़की वाले लड़के वालों के खेत देखकर आते और खेत में चिंटियों के बिल देखते इससे अनुमान लगाते घर खाता पिता है।घर पर आकर बटोड़ा(पशुओं के गोबर के गोसे से बना) देखकर यह अनुमान लगाते कि गृहिणी चतर व मेहनती है।यानि इस घर में सब कुछ मिलेगा।अपनी बेटी को उस घर में ब्याह देते।

उस समय की जरूरत के हिसाब से यह लोजिकल लगा
लेकिन आजकल पढ लिख बच्चों की शादी के लिए कुंडली मिलान ,मुहूर्त और दिखावे पर खूब अनावश्यक खर्च फिर परिणाम????

Suman Krishnia