Thursday, July 16, 2015

राष्ट्रवादियों के बहकावे में आ हरयाणा में जाट से छिंटके ओ.बी.सी. भाई जरा बिहार के चुनावी नज़ारे पर पैनी नजर रखें!

बीजेपी को पश्चिमी यूपी में मुसलमान को रस्ते से हटाना था तो 'हिन्दू एकता और बराबरी' का नारा देते हुए जाट का सहारा लिया। हरयाणा में आते ही 'हिन्दू-हिंदुत्व' स्वाहा करके उसी जाट के खिलाफ जाट बनाम नॉन-जाट खड़ा कर दिया।

अब बारी बिहार की, हरयाणा में बीजेपी और राष्ट्रवादियों के हुल्ले-हुलारों में झूलने वाले ओ.बी.सी. भाई जरा ध्यान से देखें कि हरयाणा में आपको गले लगाने वाले, कैसे अब बिहार में लालू-नितीश-शरद की ओबीसी तिगड़ी को ही ले के बिहार को कैसे ओबीसी बनाम नॉन-ओबीसी का अखाड़ा बनाने वाले हैं। इसकी मिशाल अभी हाल ही में निबटे बिहार परिषद चुनावों में इस ओबीसी तिगड़ी की उम्मीद से कम परफॉरमेंस से आप लगा लीजिये।

देखते-दिखाते जीतनराम मांझी को बीजेपी नितीश-लालू-शरद के दल से निकाल ले गई। कभी एक ज़माने में मोदी के कॉम्पिटिटर बताये जाने वाले नितीश से यह उम्मीद नहीं थी कि वो जीतनराम मांझी से बेवजह उलझ के बीजेपी को दलितों और महा-दलितों की सहानुभूति हाईजैक करने का अवसर देते। खैर दलित व्यक्तिगत स्तर पर बहुत स्याना है, वो इन सारी चालाकियों को समझता है और इसीलिए बीजेपी अभी और बहुत से पासे फेंकेगी।

अब बिहार में तो बसपा भी नहीं है कि इनसे रूष्ट दलित, महादलित मायावती के पाले आ जाते, कांग्रेस का तो अभी पुनर्स्थापन-काल ही चल रहा है। ऐसे में दलित और महादलित को विकल्प क्या बचता है। हाँ अगर यूपी में कांग्रेस मायावती से और बिहार में मायावती कांग्रेस से समझौता करके लड़ें तो बेशक इन वोटों को खींच पाएं, वर्ना नितीश कुमार तो मांझी से सींग उलझा अपने पैरों कुल्हाड़ी मार ही चुके हैं। और इस नुकसान की भरपाई कर जावें तो चमत्कारी नेता ही कहलाये जायेंगे,जिसकी कि फ़िलहाल तो कोई गुंजाईश नजर नहीं आती।

खैर मेरा सम्बोधन हमारे हरयाणा के ओबीसी भाईयों से था कि कैसे बीजेपी वालों का हिंदुत्व भी झूठा, इसमें एकता और बराबरी के जुमले भी झूठे और राष्ट्रवादिता-देशभक्ति तो इनकी गुलामक़ाल से ही संदेहास्पद रही है। इसलिए इनके चक्कर में इनको अपने हरयाणा के सामाजिक तानेबाने और समीकरणों पे और मत बैठने दीजिये।

फिर भी अभी नहीं बात कैच हो रही हो तो 2017 में बिहार का आने वाला ओबीसी बनाम नॉन-ओबीसी दंगल देख लीजियेगा। देखिएगा कि हरयाणा में नई सरकार के शुरुवाती महीनों (अब नहीं सिर्फ शुरुवाती में, अब तो खुद ओबीसी की भी नौकरियाँ खतरे में पड़ी हुई हैं) में ओबीसी को हनीमून का प्रतीकात्मक सुखद अनुभव देने वाली बीजेपी बिहार में कैसे ओबीसी को ही खूनीमून दिखाती है। बाकी प्रधानमंत्री ओबीसी नहीं हैं, यह झूठ तो आपको पता लग ही गया होगा।

जय यौद्धेय! - फूल मलिक

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