Saturday, 15 June 2024

शमशाद बेगम जी मान गोत की जाट थी!

हमारे समाज में सिर्फ़ जाति आधार पर ही भेदभाव नहीं है, यह भेदभाव क्षेत्र आधार पर भी है, यह भेदभाव धर्म के आधार पर भी है। यह भेदभाव वाली व्यवस्था सिर्फ़ दूसरी जातियों से ही नहीं ख़ुद की जाति से भी है। एक ही जाति, एक ही गोत, पर अगर धर्म अलग-अलग हैं तो दोनों एक दूसरे से पूरी धार्मिक छुआछूत बरतते हैं। इस धार्मिक छुआछूत का उदाहरण महान गायक मोहमद रफ़ी, शमशाद बेगम आदि हैं। बॉलीवुड का ज़िक़्र आता है तो हमारी सोच सिर्फ़ पहलवान दारा सिंह जी और धर्मेंद्र जी तक सीमित रह जाती है। जबकि इन्हीं लोगों के समकालीन बॉलीवुड में गायकी में कई दशकों तक जिनकी बादशाहत रही उनके बारे में हमारे लोगों को या तो पता नहीं, पता है तो ज़ुबान सिल जाती है क्योंकि वो मुस्लिम जाट हैं? मोहमद रफ़ी साहब का बेटा इंटर्व्यू में ख़ुद कहता है कि वो लोग पंजाब के जाट हैं। पर नहीं, हम तो इन्हें मिरासी या हज्जाम मानेंगे? जबकि उनकी ऑटोबायोग्राफ़ी में उनका गाँव गोत सब लिखा है, उनका बेटा ख़ुद को गर्व से जाट बता रहा है।

रफ़ी साहब की तरह ही एक वक़्त में बॉलीवुड में महान गायिका शमशाद बेगम जी का पूरा सिक्का चलता था। पर मैंने हमारे किसी भाई को कहते नहीं सुना कि वो जाट थी। जबकि इनकी ऑटोबायोग्राफ़ी में इनका गोत और जाति बड़ी स्पष्ट लिखी हुई है। शमशाद बेगम जी का जन्म लाहौर में मान गोत के मुस्लिम जाट परिवार में हुआ था। 1940 से 1970 तक शमशाद बेगम जी का बॉलीवुड में पूरा सिक्का चला। मंगेशकर बहनों (लता जी व आशा जी) ने अपना कैरीअर शमशाद बेगम जी की सहगायिका के तौर पर शुरू किया था। दोनों बहनें शमशाद जी के कोरस में गाया करती। शमशाद बेगम जी एक महँगी गायिका थी, जो प्रडूसर्ज़ के लिए अफ़ॉर्ड करना आसान नहीं था तो जब मंगेशकर बहनों का कैरीअर आगे बढ़ना शुरू हुआ तो प्रडूसर इनसे माँग करते कि आप लोग शमशाद बेगम के अन्दाज़ में गाओ। सन 2009 में भारत सरकार द्वारा कला के क्षेत्र में शमशाद बेगम जी को पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। 23 अप्रैल 2013 को मुंबई में शमशाद बेगम की का निधन हो गया था।

By: Rakesh Sangwan

Friday, 14 June 2024

इस महाशय को अब अकेले जाट ही क्यों याद आएं हैं?:

जब जंतर-मंत्र पर पहलवान बेटियां घसीटी जा रही थी; तब नहीं बोला यह महाशय कि यह बेटियां जाट हैं व् जाट देश की शान होते हैं; उनकी आवाज को इस तरीके से क्यों दबाया जा रहा है? 13 महीने चले किसान आंदोलन में नहीं चुस्का यह महाशय कि यह जो किसान आंदोलन लिए चले आएं हैं दिल्ली तक, इनमें 80% तक किसान जाट-जट्ट बिरादरी से हैं, तो इनको आवाज सुनो व् बिना तकलीफ दिए इनको न्याय दो| जब अग्निवीर ला के सेना का अभिमान कुचल रहा था मोदी, तब नहीं चुस्का यह महाशय कि उस सेना को ऐसे मत खत्म करो, क्योंकि उसमें हर तीसरा सैनिक इसी जाट समाज से आता है, जिसको यह आज देश की शान बता रहा है? 


अब चुस्का है क्योंकि पूरी खापलैंड व् मिसललैंड पे फंडियों को, फ़िलहाल हुए लोकसभा चुनावों में जब जाट-दलित-सिख-मुस्लिम व् 50% ओबीसी समाज ने मिल के रसातल में चिपका दिया तो इन महाशय को सिर्फ जाट याद आ रहे हैं (बाकी दलित व् ओबीसी कोई याद नहीं आया)| इसका तथाकथित हिन्दू राष्ट्र की आड़ में "मनुवाद राष्ट्र" बनाने का भूत उतरा नहीं है सर से अभी भी| यह कवायद अब आगामी हरयाणा विधानसभा चुनावों बारे लगती है; व् इनको इसकी ड्यूटी दी गई हो जैसे| और देखें जरा कितनी arrogance व् बदतमीजी से कह रहा है; जैसे जाट कौम इसकी बंधुआ हो| 


यह वही भाषा व् एप्रोच है, जैसी 'जाट जी जैसी सारी दुनिया हो जाए तो पंडे-पुजारी भूखे मर जाएं' वाली स्तुति सत्यार्थ प्रकाश के ग्यारहवें सम्मुल्लास में लिखी है; वह व्यक्ति कम-से-कम ईमानदारी से सादर तो लिख रहा था; इसका तो लहजा ही "जाट समाज को बंधुआ" समझने वाला है| भला, कौन तो जाट किसी को भूखा मारने वाला; व् जाट ने किसी के हाथ जूड़ रखे हैं या उनको कमाने-खाने से रोकता है; जो वह भूखे मर जाएंगे; और कौन जाट, जो इसको "मनुवाद राष्ट्र" बना के देगा| बना ले अपने तथाकथित ज्ञान व् शक्तियों से खुद ही; जिसके जाल में फंसा के इतनी जनता अपने पीछे लगाए फिरता है; इसके बाद भी जाट की जरूरत की कसर ही रह गई; हद है| 


दूर रखें खुद को व् अपने बच्चों को ऐसे फलहरियों से; होते म्हारे दादों-पड़दादों वाले जमाने तो लठ लगते इसकी पिण्डियों पे| 


Bageshwar Dhaam baba about Jats in below video!



राजा vs खाप

राजा का बेटा राजा बनेगा! राजा उसे पहले ही राजकुमार घोषित कर देगा और समय पर उसका राजतिलक कर देगा! प्रजा जय जयकार करेगी और शासन बडे राजा से पुत्र राजा के पास चला जाएगा! उसका शब्द ही कानून होता है और उसका आचरण ही नैतिकता की सीमाएं तय करता है! दशरथ ने समय रहते राम के राज्याभिषेक की तैयारी कर दी थी परंतु जंगल जाना पडा लेकिन जंगल से भी राज चलाते रहे जैसे अब कुछ राजा जेल चले जाते हैं और उनकी जगह भरत गद्दी पर उनकी खडाऊँ रख कर उनके नाम से राज करते हैं!

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ये राजा पता नही कहाँ होते थे हमारे यहाँ तो खाप होती थी जो सामूहिकता से फैसले लेती थी और उनका प्रधान हर बार अलग चुना जाता था! खापलैंड में ये सब सामंतवाद नही होता था और राजकुमार की तो छोडिए राजा ही नही था! खाप ही सामाजिक राजनीतिक और सभी प्रकार का मंच होती थी और वहीं सब फैसले करती थी!
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लोकतंत्र आया और लोग चुने जाने लगे लेकिन उनके चुनने का तरीका थोडा खाप से अलग होता रहा! खाप में चुनाव जहां हाथ उठा कर सामने सहमति से होता था वहीं ये चुनाव पर्दे की आड में होता था! लोगों में एक दूसरे के प्रति अविश्वास बढता चला गया कि उसने नही दी होगी वोट या इसने नही दी होगी! इस तरह चुनाव से लोग विधायक सांसद चुने जाने लगे और मन्त्री मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री बनने लगे! अगर पुराने समय के अनुसार बोलूं तो राजा बनने लगे! जब राजा बनने लगे तो राजकुमार भी बनने लगे! बेशक लोकतंत्र था लेकिन एक ही व्यक्ति को आप बार बार चुना जाता रहा तो वो खुद को राजा ही समझने लगे और समझें भी क्यों नही जब जनता ही उनको राजा बनाने पर आमादा थी और आंख बंद करके उन्हीं को बना देती रही! जब उनको ये गुमान हो गया कि वे राजा हैं तो उनके बेटे भी राजकुमार ही होगें! अब जब जनता ही राजा बनाने पर तुली है तो राजकुमार भी जनता ही बनाती है! लोकतंत्र राजशाही में बदल गया! कई कई राजाओं के तो राजकुमार भी आ गये और उनके राजकुमार भी आ गये!
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हरियाणा में लगभग चालीस विधायक पूर्व विधायक अपने बेटों के लिए टिकट मांग रहे हैं! ये उनका हक है क्योंकि ये वहीं लोग हैं जिन्होंने काफी काफी सालों से अपने अपने क्षेत्र में राजा का कद प्राप्त कर रखा है! कोई पैंतीस साल से चुना जा रहा है कोई चालीस साल से चुना जा रहा है! जनता भूल चूकी है कि कोई और भी चुना जा सकता है! अब इनको गुमान हो गया है कि उनके बेटों का राजतिलक होना चाहिए! अब उनकी जगह उनके बेटे राज संभालेगें और वो अब आराम करेगें! ये सब काम वो अपने जीते जी ही करना चाहते हैं! ये खाप की धरती पर हो रहा है उस धरती पर हो रहा है जहां गणतंत्र था जहां कोई राजा वजीर नही होता था! कुछ राजकुमारों का राज्याभिषेक हो चुका है लेकिन अगला चुनाव इनका ही होगा! जनता जोरदार तालियां पीटे जनता इनकी जय जयकार करे! उसके पास बस केवल यहीं है एक दिन पोलिंग बूथ पर जाए और बटन दबा आए और राजकुमार का राजतिलक कर आए!!
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अब जो राजकुमार हैं वो राजा बनेगें और फिर अपने बेटों को राजकुमार घोषित कर देगें फिर समय पर राजा बना देगें! प्रजा अपने बेटों के लिए डी ग्रुप की नौकरी के लिए उनके दरवाजे पर माथा टेकती रहे! हजूर माई बाप आप मेरे लडके को लगवा दें तो रोटी पेट की चिंता कम हो! चिरौरी करनी होती हैं और मिन्नतें करनी होती हैं! लोकतंत्र फिर अहसास कराता है जनता को कि तुम मालिक हो इस देश के और वो फूल कर कुप्पा हो जाती है! टेढी टेढी चलना शुरु कर देती है और चुनाव वाले दिन उसके सामने दो विकल्प दे दिए जाते हैं दो राजकुमार! आप इस राजकुमार को चुनो या उस राजकुमार को चुनो! आप वोट ना भी दोगे तो राजकुमार का राजतिलक नही होगा इस खुशफहमी में मत रहना!
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राजकुमार तैयार हैं राजा तैयार हैं राजतिलक का समय तैयार है और जनता जय जयकार करने के लिए तैयार है! चंवर डुलाए जाएगें जयकारें लगाए जाएगें राजा बनाए जाएगें तुम्हारा क्या बे! काटडे की मां के धूण दूध पर काटडे का क्या? जनता देखती रहे सुनती रहे और राजतिलक पर थोडी बहुत मिठाई खाती रहे! क्या ये खापलैंड की जनता इस पर ध्यान देगी? क्या ये समानता का समाज अपने में से किसी को राजा बनाएगा या राजा पुत्रों को ही राजकुमार बनाएगा!

By: Sukhwant Singh Dangi

बागडी जाट और देशवाली जाट!

बागडी जाट और देशवाली जाट के पहले रिश्ते नही होते थे! भूपेंद्र सिंह हुड्डा के दादा चौधरी मातूराम ने पहली बार देशवाली और बागडी जाट के बीच रिश्ते करवाने की मुहिम शुरु की और अपने परिवार से ही बहुत रिश्ते बागडी जाटों में किए! ये मुहिम जोर पकडती गई और धीरे धीरे सब सामान्य होता चला गया! जाटों में ब्याह रिश्ते का बडा ख्याल रखा जाता था और लगातार विकास की कोशिश जारी रहती थी! गोत्र छोड कर शादी करना भी इसी का हिस्सा था जो बाद में सांइटिफिक निकला!

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बागडी जाट उसे कहते हैं जो अपने मूल स्थान को छोड कर दूसरी जगह जाकर बस गया! पहले अकाल पडते थे लंबा सूखा आम था तो लोग जब एक जगह पर गुजारा नही हो पाता था तो दूसरी जगह चले जाते थे और बस जाते थे! एक तो मजबूरी और भूखे मरने की नौबत और दूसरे के यहां जाकर शरण लेना इससे उनके आत्मविश्वास और मनोबल पर फर्क पडता था तो वो कम बोल्ड हो जाता था! दूसरों के ईलाके में शरण लेने से उसके व्यवहार आचार और विचार पर बहुत फर्क पडता था और वो एक अलग ही तरह का व्यवहार करता था! उस ईलाके के मूलनिवासी उन पर हावी रहते थे और वो जैसे तैसे उनमें एडजस्ट होने और आगे बढने की कोशिश करता था! बागडी जाट दूसरों की बजाए ज्यादा व्यापारिक सोच का होता था और एक प्रकार का सामंतवाद उनके ईलाकों में देखने को मिलता था! 1890 के आसपास राजस्थान से भारी संख्या में जाटों का आगमन हरयाणा में हुआ और क्योंकि ज्यादा उपजाऊ जमींन पर और लोग बैठे थे तो वो हरयाणा के कम उपजाऊ और रेतीले ईलाकों में एडजस्ट हुआ और चौधरी देवीलाल का परिवार भी उसी समय राजस्थान से हरयाणा आया था!
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देशवाली जाट वो जो यहां का पहले से निवासी था! देशवाली का मतलब होता है जिसके देश के देश बसते हों! एक व्यक्ति जो अपने भाईयों के बीच रहता हो वो खुद को ज्यादा सुरक्षित महसूस करता है और उसका मनोबल और आत्मविश्वास ज्यादा होता है! उसे कोई भय नही होता और जब भय नही होता तो मानसिक रुप से व्यक्ति बहुत मजबूत होता है और बोल्ड होता है! उसकी एक अजीब तरह की साइकोलॉजी होती है और वो बात बात पर विरोध करता है! कुछ गांव ऐसे हैं जो अपने ईलाके में एक ही गोत के गांव हैं पर देशवाली हैं क्योंकि पूरा गांव अपने भाईयों के साथ रहता है! पहले जाटों का माइग्रेशन नही होता था और केवल राजस्थान से ही जाट हरयाणा आया था! हिंदू उतराधिकार अधिनियम के बाद जमींन में लडकी का हिस्सा होने के बाद जाटों का माइग्रेशन हुआ और वो दूसरे की देहल पर जाने लगे!
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चौधरी देवीलाल के परिवार ने एक अलग ही थ्योरी लोगों के दिमाग में घुसेड दी और उसने बागडी जाट को जिलों के आधार पर कहना शुरु कर दिया! अब जाटों की बसासत ऐसे तो बसी नही कि आगे चल कर जिले बनेगें तो जिले की सीमा से इधर बागडी और उधर देशवाली! इस थ्योरी को पेश करने में उस परिवार की अपनी सोच थी! वे ज्यादा से ज्यादा जाटों को अपने जैसा बनाना चाहते थे ताकि उनकी संख्या बढे और वोट के समय उनमें अपनापन आए और उनकी ताकत बढे और दूसरा सबसे अहम वजह ये थी कि उनका ये ना पता चले कि वो बाहर से आए हैं! लोगों ने उनकी इस थ्योरी पर ध्यान नही दिया और उनके समर्थकों ने बडे पैमाने पर ये बात फैलाई कि ये बागडी हैं और उन्होंने मोटा मोटी रोहतक सोनीपत झज्जर को छोड कर भिवानी चरखी दादरी तक वो बागडी में ले गये! किसी ने ये सोचा ही नही! जब चौधरी देवीलाल का परिवार सिरसा आया तो ऐसा तो था नही कि वहां कोई जाट बसता ही ना हो! वहां जो जाट बसते थे उनसे इस परिवार का लंबा संघर्ष चला भी है तो जो वहां पहले रहते थे वे देशवाली जाट थे और इनसे दबते नही थे! औमप्रकाश हिटलर उसी परिवार से थे जो देशवाली जाट थे! इस थ्योरी से उन्होंने भूपेंद्र हुड्डा के मुख्यमंत्री बनने के बाद खूब प्रचार किया जिससे वो चरखी दादरी को भी अपना ईलाका मानते थे जबकि चरखी दादरी देशवाली ईलाका है! अजय सिंह ने चुनाव ही इसलिए लडा था कि इस ईलाके को अपने साथ जोडा जाए! औमप्रकाश चौटाला इस बात को जानते थे कि जाटों के अगर नेता बनना है तो देशवाली जाट को अपनी तरफ करना होगा! महम कांड लंबा संघर्ष इस पर फिर कभी! चौधरी देवीलाल के परिवार ने कभी भी किसी देशवाली जाट को उभरने नही दिया! पूरे हरियाणा में एक भी बता दो! हर जगह से टिकट उस जाट को दी जो गोत से अकेला था और किसी ना किसी वक्त कहीं से माइग्रेट होकर आया था!
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सिरसा हिसार देशवाली जाटों के ईलाके हैं! चुरु झुंझुनूं नागौर देशवाली जाटों के ईलाके हैं! जमींन से कोई बागडी या देशवाली नही होता है! ये थ्योरी ही गलत है और चौटाला फैमिली द्वारा फैलाई गई है! पहले आर्य समाज और उसके बाद संघ बागडी जाटों में घुसा! मैं ये भी बताता चलूं कि रोहतक में भी बागडी जाट हैं और बागपत बिजनौर में भी बागडी जाट हैं! पश्चिमी और दक्षिणी हरयाणा थार का मरुस्थल है! रोहतक भी इसी में आता है! जहां जहां धूल भरी आंधी इस मौसम में चलती है तो वो थार के मरुस्थल पर बसा हुआ ईलाका है! रोहतक में नहरें पहले आ गई तो जमींन समतल होती चली गई इसका मतलब ये बिल्कुल नही है कि वो अलग ईलाका है!
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इस सब्जैक्ट पर पूरा पढने के बाद भी मुझे ये समझ नही आया कि चौधरी मातूराम ने ऐसा क्यों किया? बागडी जाट से उसके लगाव की वजह क्या रही! कोई अगर किसी को उसका हक दिलवाता है तो उससे कोई ना कोई लगाव की वजह होती है! बागडी जाट डी एन ए में बराबर होता है परन्तु जैसे कुछ दिन पहले उस जाट को कमजोर माना जाता था जिसके घर में भैंस नही होती थी और उसके बारे में ये कहते थे कि यो कैसा जाट है इसके तो डोली में दूध आता है! जब कोई जाट किसी रिश्तेदारी में जाता था तो सबसे पहले ये पूछते थे कि धीणा के है! भैंस कितने दिन में ब्यायेगी? जाट जमींन को छोड कर नही जाता था और बागडी जाट को जमींन छोड कर आनी पडती थी तो उसे डोली में दूध लाने वाले जाट की तरह ही कमजोर माना जाता था और रिश्ते नही होते थे! चौधरी मातूराम ने इसकी शुरुआत की और बाद में ये सब नार्मल हो गया! चौधरी मातूराम आर्य समाज के भी बडे और आरंभिक नेताओं में थे! उनके भाई ने आदमपुर में एक गांव भी बसाया जिसका नाम लुदास है!
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एक अंग्रेज अधिकारी की किताब के आधार पर और कुछ मेरी अपनी परिकल्पना के आधार पर लिखा है! आप कमेंट करें और खुल कर करें हो सकता है आप स्वीकार ना कर पाओ क्योंकि आपके दिमाग में पहले से कुछ और भरा है! चौधरी देवीलाल और चौधरी चरण सिंह दोनों बागडी जाट थे इसीलिए चौधरी चरण सिंह ने देवीलाल को मुख्यमंत्री बनाने के लिए वीटो की!

By: Sukhwant Singh Dangi

Thursday, 9 May 2024

407 सीट क्यों चाहिए!

 ★ एक मैसेज फॉरवर्ड हो रहा है जिसमें बताया गया है कि बीजेपी को 407 सीट क्यों चाहिए..चलिए ज़रा देखते हैं कि हक़ीक़त क्या है?

1. "वक़्फ़ बोर्ड" हटाने के लिए चाहिए : वक़्फ़ बोर्ड पूरे तौर पर सरकारी है..सरकार जब चाहे "वक़्फ़ बोर्ड" को हटा सकती है..10 साल तक मोदी ने क्यों नहीं हटाया?

2. CAA/NRC ला कर 10 करोड़ बांग्लादेशियों को निकालने के लिए : CAA लागू हो चुका है..असम में NRC भी हुई..तो CAA-NRC के लिए 407 सीट की ज़रूरत नहीं है..

बांग्लादेश की जनसंख्या ही लगभग 10 करोड़ है..तो 10 करोड़ बांग्लादेशी भारत मे कैसे आए? मोदी तो बांग्लादेश को मित्र देश बताते हैं..

3. "माइनॉरिटी कमीशन" हटाने के लिए : माइनॉरिटी में मुसलमान के 'अलावा सिख, जैन, बौद्ध, पारसी, 'ईसाई भी हैं..सरकार जब चाहे कमीशन को हटा सकती है..

4. "प्लेसेस ऑफ वरशिप एक्ट" हटाने के लिए : इसके लिए भी 407 सीट की ज़रूरत नहीं है..272 सीट काफ़ी है..मोदी ने क्यों नहीं हटाया?

5. "यूनिफॉर्म एडुकेशन एक्ट" ला कर मदरसा बंद करने के लिए : भारत में अलग अलग राज्यों की अलग अलग एडुकेशन पॉलिसी है..यूनिफॉर्म एडुकेशन एक्ट मुमकिन ही नहीं..

संविधान में माइनॉरिटी को अपने शिक्षा संस्थान चलाने का हक़ है..फिर तो सारे माइनॉरिटी शिक्षा संस्थान बंद करने होंगे..

6. "अल्पसंख्यक मंत्रालय" बंद करने के लिए : अल्पसंख्यक मंत्रालय रखना ही होगा ऐसा कोई क़ानून नहीं है..मोदी/योगी ने अल्पसंख्यक मंत्रालय रखा ही क्यों है? तो ये बात भी फ़र्ज़ी है..

7. "सिर्फ़ 2 बच्चों का क़ानून" लाने के लिए : अगर 303 सीट से धारा 370 हटाई जा सकती है तो 2 बच्चों का क़ानून भी लाया जा सकता है..407 सीट की कोई ज़रूरत नहीं है..

8. "यूनिफॉर्म सिविल कोड" लाने के लिए : 303 सीट काफ़ी है..तीन तलाक़ का बिल 303 सीट पर ही पास हुआ..

9. "दंगा विरोधी क़ानून" बनाने के लिए : क़ानून बनाने के लिए 272 सीट काफ़ी है..वैसे भी बग़ैर क़ानून के बुलडोज़र चल ही रहा है..

10. भारत को दुनिया की तीसरी अर्थव्यवस्था बनाने के लिए : यह पॉइंट बताता है कि मोदी का दिमाग़ हिल चुका है..ये जो तथाकथित पांचवी अर्थव्यवस्था बनी है उसके लिए कौन सा क़ानून बना था?


तो इन बातों-तर्कों का मतलब साफ़ है कि 407 सीटें सविंधान बदलने व् आरक्षण खत्म करने के लिए चाहिएं हैं| 


#कृष्णनअय्यर

हरयाणा में तीन MLA द्वारा कांग्रेस को समर्थन दिए जाने के बिंदु को low-profile रखा जाना बेहद जरूरी है!

इस मसले पर JJP व् INLD अगर कांग्रेस से चिपकने की कोशिश करती है तो इनसे सवाल-जवाब के आदान-प्रदान से बचना होगा; क्योंकि:


यह एक ऐसी स्क्रिप्ट की भी तैयारी हो सकती है जिसको मोदी हरयाणा में आते ही ऐसे उछालेगा कि बहुत सारा वोट फिर से एक झटके में उसके पाले जा बैठेगा| क्या कहेगा, कि देखो मैंने तुम्हें एक ओबीसी मुख्यमंत्री दिया, परन्तु तथाकथित पारवारिक पार्टियों, उनमें भी एक जाति वाले कैसे उस बेचारे शरीफ ओबीसी की सरकार गिराने को उतारू हैं| अभी से इनकी धक्काशाही देख लो, क्या तुम चाहोगे कि इनको सत्ता मिले वापिस? और लोग कहेंगे ना| 


ना कोई मुद्दा होगा, ना कोई मसला और एक झटके में सब बनी-बनाई हवा साहमार ले जाएगा; इंडिया गठबंधन की हरयाणा में| क्योंकि इन्होनें दिनरात लगा के विभिन्न समाजों को इतना ह्यपरसेंसिटिव कर रखा है, कि ऐसा करने की कोशिश होवे ही होवे| वरना और क्या मसला ले के आएगा मोदी जब हरयाणा आएगा? 


बीजेपी-आरएसएस ने दिन-रात कान-फुंकाई कर-कर के लोग इतने ह्यपरसेंसिटिव कर रखे हैं कि मोदी ने यह बात कही और अधिकतर इनके पाले| इसलिए इंडिया गठबंधन वालों को हरयाणा में मोदी की एंट्री से पहले ही इस बात की काट निकाल के फैलानी शुरू कर लेनी चाहिए कि सरकार की लड़ाईयों का किसी की जाति से क्या लेना, सैनी जी की जगह खुद खटटर सीएम होता तो भी हमारा ऐसा मौका लगता तो हम यही करते, आदि-आदि| 


फूल मलिक

Friday, 26 April 2024

के के खत्म होग्या।

चुड़ी पहरावण खातर घर घर, आया करती मणियारी।

चिमटा पलटा बेचया करती, ना रही गाडिया लुहारी।।


बीण बजाकर सांपों को जो, गाळ मं नचाया करते।

वो सपेले लुप्त हुए, संग खत्म हुई सांप की पिटारी।।


कांगी सुई डोरा तागड़ी आली, गुवारणी इब ना आती।

पोडर सुर्खी लाली के संग, बेचया करती चोटी कारी।।


भजनी आया करदे गाम मं, दमड़ दमड़ बजै था ढोल।

रागिनी की जब टेक चढै थी, लाग्या करती किलकारी।।


बजा डूगडूगी बांसूरी पै, नई नई धून सुणाया करता।

खेल दिखावणिया जादू का, इब ना आता कोये मदारी।।


रस्सी पै चालणिये नट बी, इब कोय दिखाई ना देता।

हल की फाली ऊपर बच्चा, पड़ जाता था जान पै भारी।।


लोक संपर्क विभाग से भी, नाटककार आया करते।

खूब हंसाया करदे सबनै, लगा चुटकुलों की तरकारी।।


कबिसर बी जब आया करते, गा गाकर करते बड़ाई।

पिछले घर से जो बी मिला, दोनों गाते थे बारी बारी।।


कुलड़ी, झाकरा और मटका, जब आहवे से उतर जाते।

भरके टोकरे में सबको, घर घर बांटया करती कुम्हारी।।


सुनील जाखड़ इब टेम बदल गया, आधुनिक सब हो गये।

के के चीज खत्म हुई गाम तैं, मनै खोल बता दी सारी।


सुनील जाखड़ पूर्व सरपंच लडायन की लेखनी से


Thursday, 25 April 2024

'तुम में जहर नहीं है, इसलिए तुम कमजोर हो!' सांप ने चूहे से कहा।

'जिसके अंदर जहर होता है दुनिया उसकी इज्जत करती है...उनका सिक्का चलता है।'


'आज तुम्हारा जहर ही तुम्हारे लिए अमृत है!'


चूहा ध्यान से सब सुनता रहा।


'जब तुम्हारे पास जहर होगा, तभी लोग तुमसे डरेंगे!' सांप शांत स्वर में बोला।


चूहे को बात समझ में आयी।


'फिर मुझे क्या करना चाहिए!' चूहे ने पूछा।


'सीधी-सी बात है...तुम्हें अपने अंदर जहर पैदा करना चाहिए!'


'वह सब तो ठीक है, मगर अपने अंदर जहर कैसे पैदा करूँ!'


स्पष्ट था कि चूहा हर हाल में समाधान चाहता था।


'तुम चाहो तो मैं तुम्हारी मदद कर सकता हूँ!' सांप ने मदद की पेशकश की।


'कैसे!'


'चाहो तो मुझसे जहर ले लो!'


ताकत की चाह में चूहे ने फौरन हामी भर दी। सांप मुस्कुराया।


फिर क्या था,मौका मिलते ही सांप ने अपना जहर चूहे में उतार दिया। रगों में लहू के साथ जहर मिलते ही चूहे का बदन नीला पड़ गया। चूहा हमेशा के लिए शांत हो गया। 


चूहे की डेड बॉडी लेकर सांप अपनों की सभा में पहुँचा। जहाँ उसका अभूतपूर्व स्वागत हुआ।


चूहे की डेड बॉडी देखकर सभी सांप उत्साह से भर उठे। वे जोर-जोर से फुफकारते हुए नारे लगाने लगे।


सभा शुरू हुई।


'दोस्तो! मेरे प्यारे दोस्तो!' सांप बोला।


साथी सांप गौर से उसे सुनने लगे। वहाँ शांति छा गई।


'दोस्तो! जैसा कि मैंने आप से कहा था, वह मैंने कर दिखाया है। रिजल्ट आप सबके सामने है।' चूहे की डेड बॉडी को दिखाते हुए वह बोला।


सभी सांपों ने हिश! हिश! करके उसका समर्थन किया।


वह आगे बोला,'हम पहले से ही बहुत बदनाम हैं अब हमें और बदनाम नहीं होना है! अब देखिए साथियो! मैंने यह काम लोकतांत्रिक ढंग से किया। अब हम पर कोई हिंसा का इल्जाम नहीं लगा सकता। इस चूहे ने मुझसे खुद जहर मांगा...' यह कहते हुए सांप का फन तन गया।


सभी सांपों ने हिश! हिश! कर काफी देर तक अपनी खुशी जाहिर की ।


'साथियो! आप पहले दिलों में जहर भरिए! वह जेहन में  खुद ब खुद आ जायेगा और सब्जेक्ट अपने रगों में उतारने के लिए बेचैन हो जाएगा!' 'सब्जेक्ट' शब्द सुनकर सांपों के बदन में सुरसुरी-सी दौड़ गई।


वह धारा प्रवाह बोलता रहा,'बस हमें सपने और भय दोनों साथ-साथ दिखाने होंगे! अच्छे-अच्छे शब्दों के चयन पर ध्यान केंद्रित करना होगा!' उसने चूहे की डेड बॉडी पर एक नजर मारी। फिर बोला,'देखिए! कैसे हमारे रंग में यह रंगने के लिए तैयार हो गया!'

सभी सांप चूहे के नीले बदन को देखने लगे। वे अजब रोमांच से भरे उठे।


वह आगे बोला,'जहर भरिए,खूब भरिए,मगर उपदेश की शक्ल में ...आप देखेंगे कि उपदेश स्वतः उन्माद में बदलता जाएगा... बस फैलकर हर जगह हमें अपना काम लगातार करते रहना है। क्या समझे!'


एक बूढ़ा सांप जोश में बोला,' समझ गए!हमें लोकतंत्र को लोकतांत्रिक ढंग से खत्म करना है...'


'बिल्कुल सही!' सांप गर्व से बोला।


'ये चूहा तो फंस गया,मगर क्या गारंटी है कि सभी फंसेंगे!'  दुविधा से भरे एक युवा सांप ने सवाल किया।


'वेरी गुड क्वेश्चन!' सांप यह बोलकर थोड़ी देर के लिये चुप हो गया। फिर फुफकारता हुआ बोला,'जब तक लोगों में वर्चस्व की भावना प्रबल रहेगी,तब तक मुझे कोई दिक्कत नहीं दीखती...' यह सुनते ही सभी सांपों में हर्ष की लहर दौड़ गई।


'बस वर्चस्व को उत्कर्ष की शक्ल में बेचो!'

उसने बुलन्द आवाज में यह बात कही।


पल भर में सभा जोशीले नारों से गूंज उठी और सांपों की सभा ने एकमत से उसे अपना नेता चुन लिया।


नये नवेले नेता ने बहुत प्यार से कहा,'आइए!अब हम प्रार्थना शुरू करते हैं!' 


सभी सांप समवेत स्वर में प्रार्थना करने लगे।


'लोकतंत्र खुद को डसवाकर हमको दूध पिलाता है

जो जितना जहरीला है, वह उतना पूजा जाता है


चूहे की डेड बॉडी पड़ी हुई थी। अभी न जाने और कितनी बॉडी वहाँ आने वाली थीं...

Saturday, 20 April 2024

प्रण लो कि किसी भी ऐसी बात में शामिल नही होगे जो अंधविश्वास फैलाती हो!

 चरखी दादरी के पास एक गांव है नौसवा! जिले की सीमा पर है! खेती किसानी करने वाले सम्पन्न और अच्छे लोगों का गांव है! लगभग सौ साल पहले इस गांव में एक परिवार में एक जवान मौत हो गई! मरने वाले का भाई और मां बच गए! मां के सामने जब एक जवान बेटा जाता है तो आप समझ सकते हो! मां भयभीत हो गई कि कहीं दूसरे बेटे को कुछ हो गया तो और दिल कांप गया! मरने वाले बेटे को शांति कैसे मिले! एक मां ये चाहती है कि उसके बेटे को मरने के बाद भी तकलीफ ना हो तो किसी ने बताया कि उसकी आत्मा को शांति तब मिलेगी जब देशी घी से बना चूरमा फलां व्यक्ति को झूलते हुए खिलाया जाए तो शांति मिलेगी और ये चूरमा उसके बेटे तक पंहुच जाएगा! मां का दिल अपना खून भी बेटे को पिलाना चाहती है बस बेटे का भला हो जाए ये तो चूरमा था! ये शर्त थी कि चूरमा दूसरा भाई खिलाएगा! वो दुखी भाई के मरने से और मां की बातों से और दुखी! अंत में वो तैयार हो गया मां की सन्तुष्टि के लिए और नीयत समय पर ऐसा किया गया! एक खाट को पेड से लटकाया गया और उस पर उस व्यक्ति को बिठाया गया जिसने चूरमा खाना था और झुलाया गया! जब वो उसकी तरफ आया तो उसने उसको चूरमा खिलाने की कोशिश की लेकिन उसने मुंह फेर लिया! दोबारा फिर कोशिश की तो फिर मुंह फेर लिया! एक तो भाई की मौत मां की मानसिक स्थिति और उसके मुंह फेरने से वो बेहद दुखी था! उसने सोचा नाश तो हो ही लिया उसने उस व्यक्ति को नीचे गिराया और लात घूंसों से उसका स्वागत किया! पहले से ही दुखी था बोला मेरी तो देखी जाएगी पर तुझे नही छोडूंगा!

 ये करने के बाद उसने अपने चाचा ताऊ के भाईयों को इकट्ठा किया और कहा कि अगर मेरा साथ देना चाहते हो तो प्रण लो कि किसी भी ऐसी बात में शामिल नही होगे जो अंधविश्वास फैलाती हो! अपना काम ईमानदारी से करो वफादारी से करो लेकिन किसी भी इस प्रकार के काम में शामिल नही होओगे! उन्होंने उसको वचन दिया और सीधा सीधा काम करने लगे! आज उसकी तीसरी चौथी पीढी चल रही है और उनकी प्रोग्रेस गांव में सबसे अलग अलग है! हर पीढी में जमीन खरीदते हैं और अपना काम करते हैं! किसी भी अतार्किक और अंधविश्वास में भाग नही लेते हैं! जो अंधविश्वास में पडे रहे उनकी जमीने बिक रही और वे खरीद रहे हैं!

(नौसवा के एक भाई द्वारा बताई गई के आधार पर)

1 मण लगै बीज का, 5 मण का फूकैगा डीजल और औजार!

 1मण लगै बीज का, 5 मण का फूकैगा डीजल और औजार !

5 मण लगै DAP यूरिया, 2 मण दवाई कीड़ेमार !!
माह पौ का जाड़ा तू लावे पानी, यो सोवै सै संसार !
5 मण यो डाक्टर लेज्यागा जै पड़ज्या तू बीमार!!
5 मण कि आवै किस्त KCC की, 5 मण छोड़ै कोनी साहूकार !
1मण पै गिद्ध नजर बीमा कम्पनी की, 1मण पै पटवारी और तसीलदार !!
ईब 2 मण लेज्या यो ताऊ खट्टर, 5 मण तेरे लगै कटाई !
1 मण डूम मिरासी भाई नै चाहिए, 5 मण लागैगी कढ़ाई !!
1मण लेज्यां साधु फ़क़ीर, 2 मण खाज्यां ये आढ़ती !
1मण गऊशाला मैं खावे गऊ माता, 1 मण खावेंगे जिन्दोर !!
तैनै समझाऊ सूं, भड़क कै नै मत करिये किसे तै तकरार !
नहीं तो 2 मण बचे सै उसनै लेज्यागा थानेदार !!
ना ज्यादा राजी हो मेरे पिया , तेरे पल्ले के घंटा पड़न देंगे !
खामखां मारै सै मँड़ासा, तन्ने के ये सहजे जी लेण देंगे!!

By: Karm Dhull

Thursday, 18 April 2024

एक रयात के ब्यछड़ण तैं, दो पक्षी क्यैल हो लिए - अंजणा का मुँह देखें मंत्री, बारहा साल हो लिए!

वही 12 साल हो लिए आज निडाना हाइट्स की वेबसाइट को बने हुए, इस लिंक से विजिट करें साइट पर - www.nidanaheights.com

 

सूर्यकवि दादा फौजी जाट मैहर सिंह जी की यह रागणी याद आई, जब पीछे मुड़ के देखा कि निडाना हाइट्स की वेबसाइट को बने तो आज 19 अप्रैल 2024 को पूरे बारहा साल हो लिए| वेबसाइट का लिंक व् उस साल मुख्य मीडिया अखबारों व् पत्रिकाओं द्वारा कवर की गई इस वेबसाइट की न्यूज़-स्टोरीज सलंगित कर रहा हूँ| मई-जुलाई 2012 में इसको सबसे पहले मीडिया कवरेज देने वाले, भाई रवि हसीजा (दैनिक जागरण के प्रथम पृष्ठ पर), भाई नरेंद्र कुंडू आज समाज के हरयाणा पेज पर व् मैडम मोनिका गोयल, Samvad Magazine, Department of Public Relations, Govt. of Haryana में स्टोरी पब्लिश करने पर, इनके प्रति gratitude आज भी कायम है; तीनों की कॉपी सलंगित हैं| 


19 अप्रैल 2012 से ले 2020 तक वेबसाइट को निरंतर अपडेट करते रहे, परन्तु फिर यूनियनिस्ट मिशन (2015) को खड़ा करने से होते हुए, निडाना में हमारी लाइब्रेरी टीम बनने से लाइब्रेरी (2018) स्थापित करते हुए, उज़मा बैठक (2020) आ गई और सिलसिला शुरू हुआ, पहले से रिसर्च व् पुरख-दर्शन से अर्जित ज्ञान के आधार पर 1600 पन्नों जितनी लिखित सामग्री (PDF टाइप के डाक्यूमेंट्स अलग) लिए निडाना हाइट्स वेबसाइट के तथ्यों को साथ-साथ review व् rectify करने का| हालाँकि review व् rectify का काम एक पुस्तक के रूप में लगभग पूरा भी हुआ पड़ा है, इसके PDF के हिंदी-इंग्लिश वर्जन जारी भी हो चुके हैं परन्तु व्यक्तिगत व् प्रोफेशनल व्यस्तताओं के चलते, इस पुस्तक को पब्लिश करने व् निडाना हाइट्स को इसके हिसाब से अपडेट करने का 2020 के बाद से अवसर ही नहीं लग सका| 


पिछले 4 साल से बिना किसी अपडेट के चलते हुए भी वेबसाइट अब एक ऐसी ब्रांड बन चुकी है कि विगत सवा दो सालों में 4 लाख 52 हजार बार गूगल सर्च में लोगों के सामने आई है व् औसतन पहले 10 पेजों में रैंक करती रही है (आंकड़ों का स्क्रीनशॉट सलंगित है)| इन विगत सवा दो सालों में "दादा नगर खेड़ा" "हरयाणवी कल्चर", "haryanvi language words", "100 sentences in haryanvi", "haryanvi words", "dhanana", "malik caste in haryana", "haryanvi language sentences", "dada kheda ka itihas", "haryanvi slangs", "dujana caste", "haryanvi sentences", "खाप" आदि ऐसे कीवर्ड्स हैं जिनपे टॉप सर्च में रहती है, इन कीवर्ड्स का चार्ट भी सलंगित है| 


यह वेबसाइट, 12 सालों से आज तक मात्र एक ऐसी वेबसाइट का गौरव लिए चल रही है जो हिंदी, अंग्रेजी के साथ-साथ हरयाणवी वर्जन की बनी वेबसाइट है| आशा है कि जल्द वक्त आएगा जब इसको नए शोध से निकल के आये ज्यादा दुरुस्त तथ्यों के साथ अपडेट किया जाएगा| 


जय यौधेय! - फूल मलिक








मुस्लिम युनिवर्सिटी से फ्री की कोचिंग ले के 8 हिन्दू IAS बन गए!

मुस्लिम युनिवर्सिटी से फ्री की कोचिंग ले के 8 हिन्दू IAS बन गए, कोई ऐसी ही खबर किसी हिन्दू शिक्षा संस्थान की दिखाओ भाई; स्टेटस पे लगानी थी:


इस लिस्ट को देखिए, यह Jamia Millia Islamia University की Free IAE/IPS Residential Coaching Academy Center for Coaching and Career Planning के UPSC-2024 के नतीजों की है| कोई फीस नहीं लेते, बिल्कुल फ्री कोचिंग करवाते हैं व् 31 IAS सेलेक्ट हुए हैं इस बार इनके यहाँ से| ख़ास बात यह है कि इन 31 में 8 हिन्दू हैं| 


जरा तुलना कीजिए, ऐसे ही आपके धर्म के नाम पे चलने वाली तमाम यूनिवर्सिटियों की, शायद कहीं कोई मिल जाए इस तरीके से देश का भविष्य तैयार करती हुई| और नहीं तो धर्म के नाम पे सबसे बड़ी जानी जाने वाली बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी में ही देख लीजिए क्या हो रहा है? 


यह फर्क होता है, शिक्षा स्थलों को शिक्षा स्थल रहने देने व् उनको नश्लीय-धार्मिक नफरत-हेय-घृणा के अड्डे बनने देने में| और जैसा माहौल इन्होनें धर्म के नाम पे आज बना दिया है, कोई कल्पना भी कर सकता है किसी हिन्दू यूनिवर्सिटी में इस तरह की कोचिंग से 8 मुस्लिम IAS यूँ-फ्री-फंड में बनने दिए जाने की? खैर, इस तरह सफल बनाने के लिए मुस्लिम तक बात तो छोड़ो, यह हिन्दू लड़के-लड़कियों को क्या बना रहे हैं, इतना ही झाँक के देख लिया जाए; तो 80% माँ-बाप इस तरह की तमाम युनिवेर्सिटी-कॉलेज-स्कूलों में अपने बच्चे पढ़ाना भी पसंद नहीं करेंगे| 


कभी ऐसा दौर हरयाणा-यूपी-दिल्ली-पंजाब-उत्तरी राजस्थान में हिन्दू-मुस्लिम-सिख फौजियों-उदारवादी जमींदारों के चंदों से चलने वाले तमाम "जाट शिक्षण संस्थानों" का भी होता था; आज कहाँ खड़े हैं सिंहावलोकन का विषय है| व् क्यों इस दुर्गत में आन फंसे हैं वह भी देखने की बात है| यह अपने माँ-बाप के पैसों व् मेहनत से यानि व्यक्तिगत प्रयासों की सफलता हासिल करने वाले बच्चों की लिस्ट को समाज की सफलता के नाम पे दिखा के खुश होने वाले, जरा समझें इस मर्म को; क्या थे पुरखों के सामूहिक जतन के सिस्टम-तंत्र थारे व् थमने उनको कहाँ से कहाँ पहुंचा दिया?


जय यौधेय! - फूल मलिक




Wednesday, 17 April 2024

ऐन चुनावों के वक्त "अमर सिंह चमकीला" फिल्म की आड़ ले कर जातिवाद की खाई को चौड़ी कर वोटों में भुनाने का षड़यंत्र हर पंजाबी-हरयाणवी को समझना चाहिए!

पंजाबी-हरयाणवी इसलिए क्योंकि सबसे ज्यादा असर इस फिल्म का इसी एरिया में होना है| तो आखिर क्या ऐसा नैरेटिव खड़ा करना कि "चमकीला की हत्या इसलिए हुई कि वह दलित थे" मात्र संयोग है? नहीं एक भरापूरा प्रयोग है, इन इलाकों में नासमझ व् कोरी भावनाओं पर चलने वाले लोगों को बाँट के उनके वोट खाने का; अन्यथा जिसमें अक्ल होगी वह इन नीचे दिए तथ्यों पर जरूर विचरेगा:  


चमकीला की हत्या 8 मार्च 1988 को हुई - वह दलित थे।

लेकिन उसी साल ..... 

23 मार्च 1988 को पंजाबी के प्रमुख क्रांतिकारी कवि अवतार सिंह पाश की हत्या हुई - वे जट्ट थे। 

6 दिसंबर 1988 को पंजाबी फिल्मों के मशहूर एक्टर-निर्माता-निर्देशक वरिंदर (धर्मेंद्र के भाई) की हत्या हुई थी - वे भी जाति से जट्ट थे।

 

तो अगर चमकीला की हत्या दलित होने के कारण की गई थी तो अवतार सिंह पाश और वरिंदर क्यों गोलियों के शिकार बनाए गए थे?


चमकीला बेशक दलित थे पर मकबूल सबसे ज्यादा जट्टों-जाटों में थे। उनके तकरीबन तकरीबन सारे अखाड़ों के आयोजक जट्ट-जाट बिरादरी के लोग होते थे।

एक और बात.. पंजाबियों में बहुत ज्यादा आदर और सम्मान पाने वाले पुराने दौर के सबसे बड़े गायक माननीय लाल चंद यमला जट्ट जी भी दलित जाति के थे - चमार वर्ग से थे। राज गायक की उपाधि से नवाजे गए पंजाब के महान गायक हंसराज हंस  भी दलित हैँ। हनी सिंह, दलेर मेहँदी व् मीका भी दलित हैं। कौन सुनता है इनको सबसे ज्यादा जाट व् जट्ट ही ना? 


तो कब जाएगी तुम्हारी यह कुढ़ाळी ब्याण, कुत्ते दुम तुम कभी सीधे मत होना! 


जय यौधेय! - फूल मलिक