नीचे जो लिख रहा हूँ इसमें बस एक कसर रहती है कि जिन खाप-खेड़ा-खेतों से यह
विचार सबसे गहन समानता में मिलते हैं, वह रेफरेन्सेस इसमें शामिल हो जाएँ
तो "सोने पे सुहागा" हो जाए| जानिये क्या हैं वो बातें|
आर्य-समाज
की गीता कही जाने वाली पुस्तक "सत्यार्थ प्रकाश" के ग्यारहवें समुल्लास
अनुसार निम्नलिखित बिंदुओं पर ध्यान दीजिये (संबंधित पन्नों की कटिंग
सलंगित हैं):
1) तीन सलंगित कटिंग में से एक के अनुसार: मूर्ती-पूजा
जैनियों की देन है यानि महर्षि दयानन्द के कथनानुसार सिर्फ हिन्दू धर्म का
आर्य-समाजी पंथ ही नहीं अपितु सनातनी पंथ भी भूतकाल में मूर्तिपूजा नहीं
करने वाला माना जाए, क्योंकि सनातनियों से भी पहले तो मूर्तिपूजा जैनी करते
थे| तो फिर सनातनियों ने यह मूर्तिपूजा कब व् क्यों पकड़ी जैनियों से? इसका
दूसरा आशय यह भी हुआ कि मूर्तिपूजा नहीं करने वाला आर्यसमाजी ही असली व्
पुराना हिन्दू है, सनातनी तो मूर्तिपूजा नहीं करने वालों में से निकली हुई
एक शाखा हुई इस मायने से; या नहीं?
मेरी विवेचना: और यही मूर्तिपूजा
रहित आध्यात्म तो उदारवादी जमींदारी की आध्यात्म की थ्योरी यानि "दादा नगर
खेड़ों / दादा भैयों / बाबा भूमियाओं / गाम खेड़ों" के माध्यम से अनंतकालीन
है?
2) तीन सलंगित कटिंग में से एक के अनुसार: मंदिर में जाने से
दरिद्रता बढ़ती है| मंदिर में जाने से स्त्री-पुरुषों में व्यभिचार,
लड़ाई-झगड़ा बढ़ता है| मंदिर में जाने को ही पुरुषार्थ मान के इंसान मनुष्य
जन्म व्यर्थ गंवाता है| पुजारी लोग एकमत को तोड़कर विरुद्धमत में पड़कर देश
का नाश करते हैं| महर्षि दयानन्द के अनुसार पुजारी लोग दुष्ट होते हैं|
बाकी इस पेज पर पूरी पढ़ लीजिये|
मेरी विवेचना: इतनी अति तो मैं नहीं
करता किसी के विरोध की जितनी यहाँ महर्षि दयानन्द कर गए, परन्तु हाँ इतना
मानता हूँ कि धर्म-धोक में मर्द का आधिपत्य नहीं होना चाहिए| और इस नहीं
होने की सबसे सुंदर बानगी हैं हमारे मूर्ती-पूजा रहित, मर्द-पुजारी रहित,
100% औरत की धोक-ज्योत की लीडरशिप वाले प्रकृति-परमात्मा से ले तमाम पुरखों
को एक धाम में नीहीत मानने के कांसेप्ट पर बने "दादा नगर खेड़े/ दादा भैये /
बाबा भूमिये / गाम खेड़े"| हमें महर्षि दयानन्द के मतानुसार मर्दों को अपने
धोक-ज्योत की चाबी/लीडरशिप देने से ना सिर्फ परहेज करना चाहिए अपितु यह
दुरुस्त करना चाहिए कि यह चाबी/लीडरशिप हमारी औरत के ही हाथ में रहे| गर्व
है मुझे मेरे पुरखों के इस आध्यात्म पर, जिसको महर्षि दयानन्द ने भी माना,
भले इसकी रिफरेन्स सही जगह नहीं जोड़ी; जो कि हमें जोड़ने की जरूरत है|
3) तीन सलंगित कटिंग में से एक के अनुसार: आर्यसमाज में मूर्तिस्वरूप कोई
है तो वह हैं जीते-जागते 1 - माता-पिता, 2 - शिक्षक, 3 -
विद्वान्-सभ्य-अहानिकारक अतिथि, 4 - पति के लिए पत्नी व् 5 - पत्नी के लिए
पति|
मेरी विवेचना: यानि पत्थर वाली मूर्तिपूजा नहीं करनी चाहिए|
मूर्ती के रूप में पूजना है तो उपरलिखित 5 प्रकार के मनुष्यों को पूजें| यह
है वो सबसे उत्तम बात जो "उदारवादी जमींदारी" में होती है| अपनी
दादी-काकी-ताई में देखो, कितनियों के गले में विवाहिता के पट्टे स्वरूप
मंगलसूत्र-सिंदूर आदि होते हैं; यह आज-कल वाली तथाकथित मॉडर्न जरा ध्यान
देवें इस बात पर| और इस पर भी कि यह मर्दों को खामखा झाड़ पे टांगने के
"करवाचौथ" तुम्हारी सास-पीतस-दादस कितनी करती थी या करती हैं? खामखा
द्वेष-जलन की मॉडर्न व् एडवांस दिखने वाली देखा-देखी की पर्तिस्पर्धा में
दे रही मर्दवाद को बढ़ावा व् खुद बनती जा रही शॉपीस|
लौटो अपनी इन
जड़ों पर| यह विश्लेषण सिद्ध करता है कि आर्य-समाजी विचारधारा सनातनी
विचारधारा से भी पुरानी है| 1875 में यह "आर्य-समाज" के रूप में लिखित
अवस्था में आई और उससे पहले यह "दादा नगर खेड़ों" के रूप में युगों-युगों से
अलिखित अवस्था में मौजूद रही|
विशेष: हमें नवीनता हेतु आर्य-समाज
में इस बात पर मंथन करना चाहिए कि आर्य-समाज की मूल थ्योरी का आधार
खाप-खेड़े-खेत इसमें जोड़ा जाए ताकि इसकी जड़ें 1875 से पहले व् अनंतकाल तक
स्थापित की जा सकें|
लेख संदर्भ: 1882 व् 2000 के "सत्यार्थ-प्रकाश"
के संस्करण| कटिंग्स 2000 वाले वर्जन की हैं जो मेरे पास है| यह मेरे बड़े
भाई-भाभी को उनके फेरों के वक्त भाभी जी के आर्यसमाजी आचार्य सगे दादा जी,
जिन्होनें दोनों के फेरे करवाए थे उन्होंने दी थी| यहाँ यह भी मिथ्या तोड़ें
अपनी कि ब्याह-फेरे कोई जाति विशेष वाला ही करवा सकता है| 35-40 साल से
ऊपर वाले आर्य-समाजियों में झांक के देखो, 50% से अधिकतर के फेरे ऐसे ही
उनकी ही जाति-परिवार वाले के करे मिलेंगे जैसे मेरे बड़े भाई-भाभी के हुए
थे| भाई-भाभी के पास 4 साल तो न्यूतम रही यह पुस्तक, उन्होंने कितनी पढ़ी
पता नहीं परन्तु फ्रांस आते वक्त मैं इसको साथ उठा लाया था| 1882 का वजर्न
यौद्धेय भाई विकास पंवार से चीजों को क्रॉसचेक करने हेतु चर्चित किया गया
कि 1882 और 2000 के संस्करणों में क्या-कितना अंतर् व् समानता है|
आगे है: "आर्य-समाज क्यों महान है, देखिये उसकी बानगी - भाग 2" में ला रहा
हूँ कि कैसे महर्षि दयानन्द ने "अवतारवाद" का खंडन किया है| यानि उनके
अनुसार जितने भी अवतारी भगवान-देवता हुए हैं यह सब मिथ्या हैं|
जय यौद्धेय! - फूल मलिक