Thursday, 28 August 2025

#बंदा सिंह #बैरागी #ढ़िल्लों जाट्ट और ज़मीन का मुद्दा

 #बंदा सिंह #बैरागी #ढ़िल्लों जाट्ट - 1

1. बंदा सिंह बहादुर और ज़मीन का मुद्दा
यह सच है कि बंदा सिंह बहादुर (1710 ई.) ने सरकार-ए-नौ (Mughal jagirdari system) को तोड़कर जमींदारों और किसानों को हक़ दिलवाया।
पर इसका मतलब यह नहीं है कि उससे पहले जाटों के पास ज़मीन नहीं थी।
जाट तो मुग़लों से भी पहले से खेती-बाड़ी और ज़मींदारी वर्ग के मालिक थे।
अबुल फज़ल की "आइने अकबरी" (1595 ई.) में जाट किसानों और उनके गाँवों की ताकत साफ़ लिखी है।
फरिश्ता और निज़ामुद्दीन अहमद जैसे मुस्लिम इतिहासकार लिखते हैं कि जाट “मुल्क के असल मालिक और ज़मींदार” हैं।
बंदा बहादुर का काम सिर्फ़ यह था कि उसने मुग़ल अमीरों, राजपूतों और ब्राह्मणों की ज़मींदारी छीनकर गाँवों के असली किसानों को लौटा दी। और पंजाब में उस समय किसानों की बहुलता जाटों की थी, इसलिए फ़ायदा जाटों को ज्यादा दिखा।
2. अगर ज़मीन बंदा बहादुर ने दी, तो हिंदू और मुस्लिम जाटों के पास कैसे आई?
बहुत सही सवाल। अगर यह लॉजिक मानें कि बंदा बहादुर ने ज़मीन दी थी, तो फिर—
पंजाब के #हिंदू जाट (जो सिख नहीं बने) भी #ज़मींदार क्यों हैं?
#पाकिस्तान और #हरियाणा-#यूपी-#राजस्थान के मुस्लिम जाट भी ज़मींदार क्यों हैं?
इसका सीधा मतलब है कि जाट पहले से ज़मींदार और भू-स्वामी थे, यह बंदा बहादुर या किसी धर्मगुरु की "दान" नहीं थी।
3. हजारों साल पुराना जाट राज और ज़मींदारी
क्या बिना ज़मीन के जाट राजा हो सकते थे?
राजा पोरस (पुरु जाट) सिकंदर से लड़ा — क्या बिना #ज़मींदारी के संभव था?
#तोमर जाट, #भाटी जाट, #सोलंकी जाट, #पंवार जाट — सबके राज्य मध्यकाल से पहले से मौजूद थे।
#दिल्ली, #कश्मीर, #सिंध, #पंजाब, #मालवा, #ग्वालियर — हर जगह जाट शासक ज़मीन और सत्ता पर बैठे थे।
17वीं–18वीं सदी में जब बंदा बहादुर आया, तब तक #जाट पहले से ही ग्वालियर (#सिंधिया),#भरतपुर (#सूरजमल), पंजाब (दल्ला भट्टी, सिधू-बरणसिंह) जैसे साम्राज्य खड़े कर चुके थे।
4. हरियाणा-यूपी-राजस्थान का झूठ
कुछ लोग कहते हैं कि छोटूराम, चरण सिंह, कुंभाराम आर्य ने जाटों को ज़मीन दी।
असलियत:
इन नेताओं ने क़ानूनी और राजनीतिक लड़ाई लड़ी ताकि ब्रिटिश राज और बनियों-महाजनों के क़ब्ज़े से जाटों की ज़मीन बच सके।
लेकिन ज़मीन पहले से जाटों की थी।
अगर ये सच होता कि इन्हीं लोगों ने ज़मीन दी थी, तो सवाल उठता—
तो 16वीं-17वीं सदी के भरतपुर, बल्लभगढ़, ग्वालियर और पंजाब के जाट राजा किस ज़मीन पर राज कर रहे थे?
5. नैरेटिव क्यों फैलाया गया?
यह झूठ इसलिए फैलाया गया ताकि—
जाटों को लगे कि उनकी सारी ताक़त दूसरों की देन है।
असली हक़ और इतिहास से ध्यान हटे और वे मालिक से "भिखारी" बना दिए जाएँ।
जबकि हकीकत यह है कि जाट हमेशा से इस धरती के असली किसान, ज़मींदार और शासक रहे हैं।
सीधा जवाब
जाटों को ज़मीन बंदा बहादुर या छोटूराम ने नहीं दी, बल्कि जाट हजारों साल से ज़मीन के मालिक थे। बंदा बहादुर ने सिर्फ़ मुग़ल-राजपूत-भ्रष्ट अमीरों से छिनी हुई ज़मीन वापिस दिलवाई। छोटूराम-चरण सिंह ने महाजनी क़ब्ज़े से बचाई। पर ज़मीन जाट की हमेशा से उसके खून-पसीने और राजाओं की ताक़त से रही है।



आभीर (ग्वाला/अहीर) वर्ग से संस्कृत धर्म ग्रंथों के लेखकों को इतनी नफ़रत क्यों है?

1. मनुस्मृति चैप्टर 10, श्लोक 15 में आभीर को ब्राह्मण से वैश्या में उत्पन्न कन्या के पुत्र यानी वर्णसंकर बताया गया है ज़बकी उसी मनुस्मृति में वर्णसंकर संतानों को अत्यंत नीच कहा गया है।

2. इसी चैप्टर 10 के 92 श्लोक में दूध बेचने वाला 3 दिन में शूद्र हो जाता है कहकर दुध के व्यापार को नीचा दिखाया गया है शूद्र को तो ये मूर्ख और नीच कहते ही आये है।

3. नीचा दिखाने की होड़ में वाल्मीकि रामायण कैसे पीछे रहे वो भी युद्धकांड के 22 वे सर्ग में समुन्द्र को ब्राह्मण बना तथाकथित क्षत्रिय राम के हाथो आभीरो को मरवा डालता है यह कहते हुए की वो सबसे ज़्यादा पापी और लुटेरे होते है उनके जल छूने मात्र से समुन्द्र अपवित्र हो जाता है।
4. व्यासमृति में अन्य जातियो के साथ साथ ग्वाला को भी अंतयज़ यानी शूद्र से नीच बताया गया है।
5. तुलसी डूबे कैसे पीछे रहता उसने भी रामचरित मानस में आभीर भाईयो को नहीं बख़्शा।

अब अगर किसी को आभीर शब्द पर कन्फ़्यूशन हो तो संस्कृत की टॉप डिक्शनरी संस्कृत हिन्दी शब्दकोश by वामन शिवराय आप्टे का रिफरेन्स के साथ शेयर कर रहा हूँ आप ख़ुद पढ़िए। और अन्य धर्मग्रंथों में जहाँ कही आपको लगता है की नीचा दिखाया गया है उसे भी शेयर करे।

जातिवाद हटाना है तो जातिवाद की जड़े पहचानना ज़रूरी है।













Sunday, 24 August 2025

कुम्हारों का चाक लगान, जुलाहों का बुनकर लगान, नाइयों का करतन लगान; किसने हटवाए?

 कुम्हारों पर लगता था चाक लगान

जुलाहों पर लगता था बुनकर लगान

नाइयों पर लगता था करतन लगान


सवाल: किसने हटवाए? 

जवाब: दीनबंधु चौधरी छोटूराम ने


हमारा दोष है कि हम उतनी बडी दृष्टि ही नहीं रख पाते हैं जितने महापुरुष रखते हैं। आजकल तो मूर्खों में फैशन हो गया है कि महापुरुषों पर अंगुली उठाकर सस्ती लोकप्रियता हासिल करने का लेकिन सच ये है कि बडे लोगों के दिल भी बडे होते हैं और वो जाति धर्म संप्रदाय के आधार पर किसी से भेद नहीं करते बल्कि खुले दिल से सबकी मदद करते हैं और चौधरी छोटूराम भी ऐसे ही महापुरुष थे। अब आइए उनके उन कामों पर चर्चा करते हैं जो वक्त की धूल में भुला दिए गए। 


चाक लगान समाप्ति 


राजपूताना के राजाओं तथा ठिकानेदारों के द्वारा कुम्हारों के घड़े और मिट्टी के बर्तन बनाकर बेचने पर 5 रुपये वार्षिक 'चाक लगान' लगा रखा था। राजाओं का कहना था कि जिस मिट्टी से कुम्हार घड़े और बर्तन बनाते हैं, वह मिट्टी राजाओं की जमीन की है। अतः यह लगान देना ही पड़ेगा।


चौधरी छोटूराम ने 5 जुलाई, 1941 को बीकानेर में कुम्हारों को एकत्र किया और महाराजा गंगा सिंह से बातचीत करके इस 'चाक लगान' को हटवाया। इससे खुश होकर कुम्हारों ने सर छोटूराम को एक सुंदर सुराही भेंट करके सम्मानित किया। यह ऐसी सुराही थी, जिसमें पानी बेहद ठंडा रहता था। इस सुराही को चौधरी साहब ने मृत्यु पर्यन्त अपने पास रखा।


बुनकर लगान से दिलाई मुक्ति 


राजस्थान के शेखावाटी और मारवाड़ क्षेत्र में तथा विशेष तौर पर जयपुर, पाली और बालोतरा में मेघवाल समाज के जुलाहे, रजाई, खेस, चादर और मोटा सूती कपड़ा बुनकर बेचते थे। इसके लिए गृहणियां सूत कातकर दे देती थीं।


ठिकानेदारों ने इन जुलाहों पर बुनकर लगान लागू कर रखा था। सर छोटूराम ने सन् 1937 से 1941 तक लगातार इस लगान का अपनी अगुवायी में विरोध करके इस लगान से मुक्ति दिलवाई।


9 जुलाई, 1941 को बालोतरा में ठिकानेदारों ने जुलाहों के घरों को लगान न देने के कारण आग लगा दी, जिससे काफी नुकसान हुआ। सर छोटूराम वहां गए और 8 दिन तक भूख हड़ताल की। तब जोधपुर के राजा का संदेश आया कि यह लगान समाप्त कर दी गई है।


सर छोटूराम 28 जुलाहा परिवारों को आग से हुए नुकसान के लिए 1500 रुपये प्रत्येक परिवार को राजा से दिलवाने के लिए अड़ गए। अतः तीन दिन बाद राजा ने हर परिवार को 1500 रुपए देने की घोषणा की। दलितों और पिछड़ों की भलाई के लिए किए गए ऐसे संघर्षों को देखकर दीनबंधु छोटूराम आज भी प्रासंगिक हैं और रहेंगे।


कतरन लगान हटवाना 


नायक, बाबरिया आदि जातियां भेड़-बकरियों के बालों से ऊन बनाकर बेचती थी। ठिकानेदारों ने ऊन बनाने और बाल काटने पर 'कतरन लगान' लगा रखा था। इसी प्रकार से, नाइयों के द्वारा बाल काटने का धंधा करने पर 'कतरन लगान' का भुगतान करना पड़ता था।


इस 'कतरन कर' से मुक्ति दिलवाने के लिए सर छोटूराम लाहौर से मारवाड़ के गांव पहाड़सर और रतनकुड़िया में जाकर 26 जुलाई, 1941 को वहां के भेड़-बकरी पालकों और उस क्षेत्र के नाइयों को एकत्र करके 'कतरन लगान' के खिलाफ जोरदार आन्दोलन किया और इस 'कतरन लगान' को हटवाकर दम लिया।


जागीरदारी प्रथा का उन्मूलन 


रियासती काल में लगान वसूल करने और बेगार लेने के ठिकाने जागीरदारों के अधीन थे। जागीरदार की मर्जी ही कानून था। ये जागीदार बड़े ही निरंकुश और मनमानी करने वाले थे। यदि किसान से लगान वसूली नहीं होती, तो किसान को पकड़कर ठिकाने के गढ़ या हवेली में लाया जाता था और उसके साथ बर्बरता की जाती थी, जैसे-भूखा रखना, काठ में डाल देना आदि।


इन सजाओं की कोई सीमा नहीं थी, कोई कानून नहीं था, कोई व्यवस्था नहीं थी। अभद्र गाली देना, खड़ी फसल कटवा लेना, पशु खुलवा लेना, वर्तन कपड़े आदि उठवा लेना, किसान की मुश्कें कसवा देना, जमीन से बेदखल कर देना, पंखा खिंचवाना आदि साधारण बात थी। चौधरी छोटूराम ने इस क्रूर प्रथा के खिलाफ आवाज उठाकर इसे समाप्त करवाया।


चौधरी साहब ने कहा कि किसान की कोई जाति नहीं, उसकी जाति जमींदार पार्टी है। किसान चाहे दलित हो, सवर्ण हो या पिछड़ा हो, वह 'जमींदार' कहा जाएगा। धर्म का भी इसमें कोई बंधन नहीं है, कोई भेदभाव नहीं होगा। जमींदार पार्टी सदस्य वो है जो अपने पसीने से अपनी रोटी कमाता है। 


साभार: दीनबंधु छोटूराम की जीवनी, लेखक: पदमश्री डॉ संतराम देशवाल