Friday, 7 February 2025

सातवीं सदी से तो हम देखते-पढ़ते-सुनते आ रहे हैं कि अंतत: "इंडिया में पाई जाने वाली फंडी पॉलिटिक्स" का हश्र यही होता है जैसा "ट्रम्प ने मोदी व् बीजेपी पॉलिटिक्स" के साथ किया है!

Chronological आर्डर में समझिए:

1) चच-दाहिर ने धोखे से एक किसानी कौम से आने वाले राजा को सत्ता से हटाकर सत्ता हथियाई; तो मुहम्मद बिन कासिम चढ़ आया व् उस राजा को इतनी बुरी तरह से हराया कि उसकी बेटी तक को बंधी बना के ले गया| सुनते हैं कि मुस्लिम इतिहासकारों ने उस वक्त में किसी ने उनके इस हमले या कृत्य का विरोध कर मुस्लिम सेना के सिंध के मैदानों में 5 हजार सैनिक मारे तो वह खापों वाले जाट बताए जाते हैं| फंडी ही कहते हैं कि श्राप नाम की कोई बला होती है, लग जाए तो मलियामेट कर देती है, किसानी कौम को सताने का श्राप झेला; क्योंकि उस वक्त के इतिहासकार यह भी लिखते हैं कि चच व् दाहिर जाटों से इतने डरते थे कि उन्होंने जाटों का हथियार ले के चलना व् घोड़ों पर चलना दोनों बंद कर रखे थे|


2) सन 1025 में गज़नी गुजरातियों का सोमनाथ लूट के ले गया व् सभी फंडियों को ठीक ऐसे ही संताप लग गया था, जैसे अभी मोदी व् बीजेपी को ट्रम्प के कृत्यों से लगा हुआ है; काटो तो खून नहीं| जबकि जब तक हमला ना हुआ था तो घस्से इतने बड़े कि सेना सोमनाथ में घुसते ही अंधी हो जाएगी| इतिहासकार बताते हैं कि उस ग़ज़नी को सिंध-पंजाब के जाटों ने ही लूटा था; सर जयप्रकाश घुसकानी की लिखी "कौन कह था जाट लुटेरे" वाली रागणी में इस बात का जिक्र भी है| यानि फंडी सत्ता फिर चित्त हुई| 


3) 1193 में आया मोहम्मद घोरी, फंडियों की व् उनकी सत्ता की क्या हालत करके गया; सभी को मालूम है| यहाँ भी खापों-जाटों के दादा रायसाल खोखर ने ही उसको मारा बताते हैं| कोई फंडियों को ऐसे ही संताप लगा हुआ था, जैसे आज ट्रम्प के आगे मोदी-बीजेपी को लगा हुआ है| 


4) 1398 में तैमूर लंग चढ़ा आया था, बहुतेरे फंडी मोहम्मद बिन तुगलक के दरबारी बन उनके आगे अपनी कूटनीतियों की शेखियां बघार-बघार धन बटोरते थे; परन्तु जब असली तूफ़ान सर चढ़ा आया तो रोका उसको भी फिर से जाट राजा देवराज जी की बुलाई खाप पंचायत से गठित हुई सेना ने; जिससे कि उसके सेनापति दादा योगराज गुज्जर व् तैमूर को भाला मार घायल कर भागने को मजबूर करने वाले दादा हरवीर सिंह गुलिया जी जाने जाते हैं| 


5) बीच में ऐसे ही पांच-दस और छोटे-बड़े किस्सों से आगे बढ़ते हुए अब आते हैं सीधा पानीपत के तीसरे युद्ध पर| दम्भ व् वर्णवादी अहंकार में चूर पेशवे चढ़ आए पानीपत में अहमद शाह अब्दाली को ललकारने| जाट महाराजा सूरजमल को जीतने पे 'दिल्ली देनी मंजूर नहीं थी इनको' अपितु उनका उपहास व् अट्टाहस उड़ा के पानीपत जीतने चढ़े थे; 8 घंटों में पेशवा सदाशिव राव भाऊ (इसी के अपभृंश से हरयाणवी औरतों ने हाऊ शब्द बनाया था) पानीपत में घुटनों बैठ रोया था; रोया था उस पल को जिस पल को जब जाट का अट्ठास किया था| इनकी यह सत्ता यहाँ दम तोड़ी| पछतावा कुछ यूँ उतारा था कि जाट सेना के सैनिक जो पेशवा सेना छोड़ने गए थे, उनसे अपनी बेटियां ब्याह उनको वहीँ बसाया व् इसी युद्ध से दो कहावते चली कि "जाट को सताया को ब्राह्मण भी पछताया" व् "बिन जाटों किसने पानीपत जीते"| 


6) फिर से छोड़ दो बीच के कई फ़साने (ज्यादा लम्बा हो जाएगा लेख), सीधे आ जाओ किसान आंदोलन 2020-21 पर व् पहलवान आंदोलन 2023 पर| यहाँ भी इन्होनें उदारवादी किसानों की हर बेइज्जती व् तिरस्कार की हदें पार कर रखी हैं हुई हैं| क्योंकि इस किसान आंदोलन की सबसे बड़ी कौम जाट-जट्ट ही सेना में सबसे ज्यादा जाते हैं तो उसी चच-दाहिर की लाइन पे चलते हुए जनाब ने किसान आंदोलन का बदला "अग्निवीर" ला के लिया, कि इनको कम भर्ती करोगे तो सही रहेगा| अब ऐसे में ट्रम्प द्वारा इनके जबाड़े में हाथ फेर के देखना; सातवीं सदी से चली आ रही इनकी तथाकथित साम-दाम-दंड-भेद की दुर्गति ना तो और क्या है? श्राप-संताप तो नहीं लग रहा इनको अब फिर से?


कुछ नहीं बदला; वही पुनर्वृत हो रहा है, उदारवादी किसानी को दुर्गत कर, दम्भ में चढ़ते हैं व् होनी इनको फिर लपेटे लगा देती है| फंडी ही अक्सर श्राप-संताप आदि को मानते हैं तो यह कुत्ते की दुम की भांति और कितनी सदियां लगाएंगे खुद को सीधा करने में? कब समझेंगे कि तुम्हारी तथाकथित कूटनीति, राजनीति में जो यह manipulation व् polarisation का टेक्निकल लोचा है; इसको ठीक कर लो; वर्ण खुद को बर्बाद व् बदनाम रहोगे ही; साथ ही हम जैसों को भी लबेड़े रखोगे| 


चले हैं अंग्रेजों से राजनीति के दांव-पेंच लड़ाने; तुम सर छोटूराम थोड़े ही हो कि अंग्रेजों से गेहूं के दाम 6 रुपए से दस रुपए भी करवा ले व् 25 साल तक निष्कंटक यूनाइटेड पंजाब पे राज भी कर जाए| 


जय यौधेय! - फूल मलिक


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