Saturday, 3 January 2026

वीर गोकुला का वास्तविक ग्राम: ब्रज क्षेत्र का तिलपत (तिल्हू) या हरियाणा का तिलपत?

 वीर गोकुला का वास्तविक ग्राम: ब्रज क्षेत्र का तिलपत (तिल्हू) या हरियाणा का तिलपत?

वीर गोकुला के जन्म-स्थान को लेकर इतिहास में दो मत मिलते हैं, किंतु जब ऐतिहासिक घटनाओं, भौगोलिक निरंतरता, गोत्रीय उपस्थिति और जीवित जनस्मृतियों को एक साथ देखा जाता है, तो एक अधिक तर्कसंगत निष्कर्ष स्पष्ट रूप से उभरता है।
हरियाणा का तिलपत प्राचीन और महत्त्वपूर्ण स्थल रहा है। महाभारत काल में पांडवों द्वारा माँगे गए पाँच ग्रामों में इसका उल्लेख मिलता है और पलवल क्षेत्र के वीर कान्हा रावत जी का मुग़लों से संघर्ष भी इसी क्षेत्र से जुड़ा है। किंतु आज वहाँ न तो वीर गोकुला के गोत्र या समाज की उपस्थिति है और न ही उनसे संबंधित कोई जीवित परंपरा, जिससे उसे गोकुला का जन्म-ग्राम मानने का आधार कमजोर पड़ता है।
इसके विपरीत, मथुरा–गोकुल क्षेत्र के समीप स्थित तिलपत (वर्तमान तिल्हू गाँव, बिसावर तहसील–सादाबाद क्षेत्र) में आज भी उसी समाज और गोत्र के जाट बड़ी संख्या में निवास करते हैं। यहाँ के लोगों की रिश्तेदारी गोकुला के पिता के गाँव सिनसिनी से आज भी जुड़ी हुई है और स्थानीय जनमानस स्वयं को वीर गोकुला का वंशज मानता है। यह जीवित जनस्मृति ऐतिहासिक निरंतरता का सशक्त प्रमाण है।
10 मई 1668 को ग्राम सिहोरा में अब्दुल नबी का वध, सिहोरा का आज भी अस्तित्व में होना और वहाँ सभी गोत्रों के जाटों की उपस्थिति, यमुना किनारे लक्ष्मीनगर क्षेत्र में अब्दुल नबीपुर मौजा, दुर्बासा ऋषि मार्ग पर तैयापुर गाँव (जहाँ तैयब अली का वध हुआ), बाग का नगला (जहाँ रक्षा-बंधन के दिन 26 बहनों का बलिदान हुआ)—ये सभी स्थल आज भी विद्यमान हैं और गोकुला के संघर्ष क्षेत्र की पुष्टि करते हैं।
महावन और सादाबाद की गढ़ियों का दहन, उनके बीच स्थित हगा पाल, तथा महावन के राजा कुलीचंद हगा द्वारा निर्मित 84-खंभा राजमहल (आज का तथाकथित नंदमहल)—ये सभी प्रमाण गोकुला की गतिविधियों को ब्रज क्षेत्र से जोड़ते हैं।
इन सभी ऐतिहासिक घटनाओं, भौगोलिक स्थलों, गोत्रीय निरंतरता और वर्तमान प्रमाणों के आधार पर यह निष्कर्ष अधिक तथ्यपूर्ण और तर्कसंगत प्रतीत होता है कि ब्रज क्षेत्र का तिलपत/तिल्हू गाँव ही वीर गोकुला का वास्तविक जन्म-ग्राम था, जहाँ से उसने मुग़ल अत्याचार के विरुद्ध जनआंदोलन का नेतृत्व किया और इतिहास में अमर हुआ।
देव फ़ौज़दार

Thursday, 1 January 2026

फ्रांस में स्नान की डुबकी व् इंडिया की डुबकी - जरा फर्क जानो:

 *फ्रांस में स्नान की डुबकी व् इंडिया की डुबकी - जरा फर्क जानो:*


ऐसा मत मानो कि कुम्भ जैसे स्नान की डुबकियां तुम्हारे यहाँ ही होती हैं; सलंगित फोटोज देखो 👆👆👆व् फर्क समझो! यह फोटो हर नए साल के दिन फ्रांस के सुदूर उत्तरी शहर (फ्रांस-इंग्लैंड वाली यूरो टनल के नजदीक) डंकर्क शहर के अटलांटिक महासागर के तट (बीच) पर डुबकी लगाने वाले फ्रेंच लोगों की हैं; जो कड़ाके की माइनस डिग्री वाली ठंड में यहाँ इस दिन इकठ्ठा होते हैं, पहले नाचते-गाते हैं, फिर महासागर में डुबकी लगाते हैं| इस डुबकी को Le Bain des Givrés कहते हैं| है ना बिल्कुल किसी कुम्भ के मेले या गंगा में डुबकी लगाने वाला जैसा ही सिस्टम? तो फिर फर्क क्या है, जो मैं यह फोटो साझे कर रहा हूँ? 


फर्क यह है: इनको जूम करके देखें, कहीं कोई कूड़ा-कर्कट दिख रहा है; जैसे हमारे यहाँ कुम्भ-स्नान या गंगा-डुबकी के किनारों पे दिखाई दे जाता है; लोग अपना अधिकार मान के छोड़-डाल के गंदा करके जाते हैं? या हवा में दिल्ली की तरह कोई प्रदूषण या कण? कितना AQI होता है आजकल अपने यहाँ; वो आप बेहतर जानों; यहाँ तो AQI सुई 10 का मार्क छू जाए तो अलर्ट जारी हो जाता है| 


उत्तरी भारत के परिवेश में यह सेलेब्रेशन के साथ अपने वातावरण व् गली-गाम की सफाई रखने का कल्चर सिखों या कल तक खापों के नगर खेड़ों में पाया जाता रहा है| याद करो, वो जो आज 40 साल से ऊपर हैं; तुम्हारे बचपन के दिन? जब सांझी मनती थी तो कूड़ा मैनेजमेंट कैसे होता था तुम्हारे पुरखों का? कैसे वो कचरे के टाइप के हिसाब से कुरड़ियाँ तक अलग-अलग रखते थे? कैसे वापिस आएगा या मैंटेन रहेगा यह सिस्टम; सिर्फ तब जब अपने कल्चर-किनशिप को वैल्यू दोगे; 5000 साल पहले के अला-फलां काल्पनिक वंशों के साथ अपनी वंशावली जोड़ने से पहले 50-500 साल पहले तुम्हारे पुरखे क्या करते थे, क्या उनका कल्चर-कस्टम-सिस्टम था, जब उसकी सुध लोगे| 


जय यौधेय! - फूल मलिक