Wednesday, July 22, 2015

आर्थिक आधार पर आरक्षण में तो सुदामा ही नौकरी पायेगा, एकलव्य नहीं!


आर्थिक आधार पर आरक्षण का कोई लाभ नहीं, क्योंकि ऐसा होता है तो फिर सिर्फ सुदामा ही नौकरी लगा करेंगे, एकलव्य नहीं। फिर भी आर्थिक आधार ही आधार होना चाहिए तो पहले भारत से वर्णीय व् जातिय व्यवस्था खत्म करनी होगी जो कि वर्तमान में तो किसी भी सूरत में सम्भव नहीं लगती।

ऐसे में आर्थिक आधार का एक प्रारूप समझ आता है कि जिस धर्म व् जाति की राष्ट्रीय व् राजकीय स्तर पर जितनी संख्या है पहले उसको उसका संख्यानुसार प्रतिशत दे के फिर उस प्रतिशत में आर्थिक-आधार की लाइन डाल दी जावे। और यह सरकारी और प्राइवेट दोनों नौकरियों में होवे।

और उस फॉर्मेट के लिए वर्तमान का ओबीसी आरक्षण का फॉर्मेट फिट बैठता है। जरूरत है तो इसको अब हर जाति-धर्म की संख्या के अनुपात में बना देने की।

उदाहरण के तौर पर अगर हरयाणा में खत्री-अरोड़ा समुदाय की जनसंख्या 4% है तो खत्री-अरोड़ा समुदाय को हरयाणा में चारों ग्रेडों (A,B,C,D Grade Job) की नौकरियों में 4% आरक्षण दे के उसके अंदर आर्थिक आधार की शर्त डाल दी जाए, जैसे कि अगर किसी खत्री-अरोड़ा परिवार की वार्षिक आमदनी 4 लाख रूपये से ज्यादा है तो वो इस लाइन से बाहर आ जायेगा अर्थात उसको आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा। ऐसे ही अगर हरयाणा में ब्राह्मण 6%, बनिया 5% हिन्दू जाट 27%, सिख जाट 4%, मुस्लिम जाट 4%, चमार 6%, धानक 7%, राजपूत 2% है तो इसी आधार पर सबको इनकी संख्या के अनुपात से हरयाणा राज्य की सरकारी व् प्राइवेट दोनों सेक्ट्रों की नौकरियों में आरक्षण हो।

जब केंद्र सरकार में आरक्षण की बात आवे तो उसमें भी ऐसे ही किया जावे। राष्ट्रीय स्तर पर जिस जाति की जितनी संख्या उसको उतना % आरक्षण। उदाहरण के तौर पर हरयाणा में तीनों धर्मों का जाट 34-35% है, वो केंद्र में आते ही 7 या 8% % रह जाता है, तो जाट को केंद्र की नौकरियों में इतना ही आरक्षण हो और ऐसे ही बाकी सबका। प्राइवेट नौकरियों की जब बात आवे तो वो आरक्षण राज्य की संख्या के अनुपात में होवे, राष्ट्रीय अनुपात में नहीं।

इस फार्मूला का एक लाभ यह भी होगा कि रोजगार के चक्कर में एक राज्य से दूसरे राज्य में पलायन करने वालों की संख्या में कमी आएगी और उनको अपने राज्य में ही रोजगार मिलेगा। यह फार्मूला 1947 की जनसांख्यिकी परिस्थिति के अनुसार लागू हो। यानी अगर कोई रोजगार या आतंकवाद के चलते भारत के किसी दूसरे राज्य में चला गया है तो उसका राज्य लेवल का आरक्षण उसके राज्य में हो और राष्ट्रीय स्तर का तो फिर चाहे जहां भी हो।

हाँ अगर किसी नौकरी में किसी जाति-विशेष से उसी वक्त के दौरान बांटे आई संख्या में तय उम्मीदवार नहीं मिलते हैं तो फिर उस खाली स्लॉट को भरने के लिए, 6 महीने के भीतर एक परीक्षा और हो और उस परीक्षा के बाद भी खाली स्लॉट रह जाए तो फिर उसको मेरिट के आधार पर सबके लिए खुला कर देना चाहिए। 

इस फार्मूला से जाट बनाम नॉन-जाट की खाई को पाटने का भी जाट को रास्ता रहेगा, क्योंकि फिर राजकुमार सैनी जैसी जितनी भी सोच आज हरयाणा में पनप रही हैं, उनको भी इस लाइन पे चलने को मजबूर होना पड़ेगा, वो खुद नहीं होंगे तो उनका समाज करेगा। आखिर इस फार्मूला को सिवाय मंडी-फंडी को छोड़ के कौनसी जाति नहीं चाहेगी?

बिना इस फार्मूला के अगर आर्थिक आधार आरक्षण की परिणति बनता है तो फिर सुदामा ही नौकरी लगेंगे, एकलव्य का नंबर तो उनके बाद ही आएगा या फिर हो सकता है कि मुंह ही ताकते रह जाएँ।

और वैसे भी आर्थिक आधार के आरक्षण की गुहार तो क्या दलित, क्या ओबीसी और क्या स्वर्ण सभी जातियां लगा रही हैं, तो ऐसे में यह फार्मूला भारत के वर्तमान जातिय समीकरणों में सेट बैठता है।

जय यौद्धेय! - फूल मलिक

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