Saturday, August 31, 2019

कहाँ था हरयाणवी कल्चर और कहाँ जा रहा है, जरा एक झलक देखिये!

जेंडर सेंसिटिविटी, जेंडर इक्वलिटी, औरत के सम्मान व् फेमिनिज्म तक की बातें करने वाले तो ख़ासा ध्यान देना!

"हो बाबा जी तेरी श्यान पै 'बेमाता' चाळा करगी,
कलम तोड़गी लिख दी पूँजी रात-दिवाळा करगी!"


बचपन से यह रागनी सुनके बड़ा हुआ हूँ, जिसको जब भी सुनता था तो हरयाणवी कल्चर में फीमेल का क्या ओहदा है स्वत: ही समझ आती थी| वह 'बेमाता' शब्द के जरिये इंसान को घड़ने वाली कही जाती थी, वह एक औरत बताई गई| परन्तु अब बदल रहा है कुछ, कैसे:

"बटुआ सा मुंह लेरी, पतली कमर,
आम जी नैं छोड़ी कोन्या किते रै कसर"

'आम', की जगह असल में क्या है इस गाने को सुनने वाले समझ ही गए होंगे| मैं इस जगह जो असल है उसका एक मैथोलॉजिकल अवतार के तौर पर बहुत सम्मान करता हूँ और यह दुर्भाग्य ही है कि इस मुद्दे पर ध्यान दिलवाने हेतु इस बात को इस तरीके से रख रहा हूँ| क्योंकि सीधा नाम ले के इनसे जुडी लोगों की भावना नहीं दुखाना चाहता परन्तु बात रखनी भी जरूरी थी तो राखी|

आदरणीय लेखकों और गायकों; अगर आप वाकई हरयाणवी कल्चर के पैरोकार हैं तो क्या बेमाता का ओहदा 'आम' को शिफ्ट करना, एक कल्चर में औरत के सम्मान का जो ओहदा है वह मर्द पर शिफ्ट कर देना नहीं है?
एक तो नेशनल से ले स्टेट मीडिया तक वैसे ही हरयाणवी कल्चर को घोर मर्दवादी बताने पर दिन-रात पिला रहता है तो ऐसे में किस से उम्मीद करूँ इसमें औरत के सम्मान की जो धारणाएं-मान-मान्यताएं हैं उनको बचाने की?

फ्रांस में रहता हूँ, औरत को सम्मान देने के मामले में इनसे बेहतर कल्चर आजतक नहीं देखा| भारतीय परिवेश में इस तरह का इसके नजदीक लगता कोई कल्चर है तो उसमें मैं सिखिज्म व् हरयाणवी को बहुत आगे काउंट करता हूँ| इतना आगे तो जरूर कि अगर कोई कम्पेरेटिव स्टडी खोल के बैठे तो उनको इतना तो जरूर साबित कर दूँ कि हरयाणवी कल्चर औरत को सम्मान देने में अन्य किसी भारतीय कल्चर से इतना ज्यादा तो जरूर है कि वह 19 की बजाये 21 साबित होवे|

अत: इन कलाकारों, लेखकों से इतना अनुरोध करूँगा कि एक ऐसे वक्त में जब सामाजिक संस्थाओं से ले समाज के जागरूक लोग तक इन चीजों की बजाये घोर राजनीति में ही उलझे पड़े हैं तो ऐसे में इन चीजों को मेन्टेन रखने की आपकी जिम्मेदारी सबसे बड़ी है| कृपया इसको सिद्द्त व् जिम्मेदारी से निभाएं| हो सके तो इस नए गाने के लेखकों गायकों तक जरूर यह बात पहुंचाएं और बताएं कि ठीक है धन कमाना भी जरूरी है परन्तु जहाँ कल्चर की कात्तर-कात्तर बिखरती दिखें उस राह जाना पड़े, आप इतने भी कम टैलेंट के साथ नहीं ज्वाजे हो बेमाता ने|

जय यौद्धेय! - फूल मलिक

कल्चर बनाम संस्कृति!

वेस्टर्न वर्ल्ड में "कल्चर" शब्द "कल्ट" यानि "खेती" से बना है और हमारे यहाँ यह शब्द एक भाषा संस्कृत पर बना है जिसको बोलते ही मुश्किल से 1% लोग हैं| तो व्यापक स्तर पर जनसंख्या "कल्चर" शब्द में कवर हुई या एक सिमित दायरे में बोले जाने वाली भाषा वाले शब्द से? यह सवाल उन ज्ञानियों से है जो यह कहते हैं कि हमारी शब्दवाली ज्यादा उत्तम व् व्यापक है? इसका एक अर्थ यह भी है कि एक भाषा से इस शब्द को बनाने वालों के लिए बस उस भाषा को बोलने वाले ही कल्चर्ड हैं बाकी सब नगण्य| यह है वेस्टर्न वर्ल्ड के शब्दों की व्यापकता जो मेजोरिटी को कवर करते हैं, मात्र 1-2% को नहीं, फिर चाहे वह मेजोरिटी खेती करने वालों की हो या इससे उतपन्न अन्न से पेट भरने वालों की यानि 100% वह भी 100% दिन ऑफ़ लाइफटाइम| वह कल्चर शब्द से उस कृषक को भी आभार व्यक्त करते हैं जो ना हो तो जीवन में अन्न खाने को ना मिले जो कि हर जीवन का आधार है यानि पूर्णतया कृतज्ञ लोग व् कृतज्ञ सोच वाला कल्चर| भाषा तो वेस्ट वाले भी बोलते हैं परन्तु उन्होंने "कल्चर" के लिए "खेती से जुड़ा शब्द क्यों चुना", इनकी भाषा से ही जुड़ा चुन लेते? दोनों ही शब्दों से कोई बैर या हेय नहीं है, बस सवाल उठा तो पूछा; जिस महाज्ञानी के पास जवाब हो तो जरूर देवे| अन्यथा सोचिये इस पर, क्योंकि आपकी मानसिक गुलामी यहीं पर बंधी प्रतीत होती है|

बचपन से सुनते आये थे और तथाकथित हरयाणवी-कल्चर को कम जानने वाले व् इसका उपहास उड़ाने वाले पत्रकार अक्सर जब ताऊ देवीलाल से यह पूछते थे कि, 'बाकी सब तो ठीक है, पर आपका कल्चर क्या है?" तो वो म्हारा बुड्ढा, म्हारा पुरख इनको सही इंटरनेशनल स्टैण्डर्ड का जवाब दिया करता था कि, "म्हारा कल्चर सै एग्रीकल्चर"| और जो कोई भी हरयाणवी, हरयाणे के ग्राउंड जीरो से बाहर देश-स्टेटों के शहरों या विदेशों में आन पहुंचा है वह सहज ही उस म्हारे पुरखे की इस बात को समझेगा, इसके मर्म को समझेगा|

ईबी खुद को खेती से जोड़ने से शर्म आती हो जिसने, उसको यह लेख पढ़वा दियो|

विशेष: संस्कृत तीन साल पढ़ी है, 95-97/100 नंबर से कभी कम ना आये, संस्कृति शब्द भी सुनहरा है, इसका मान-सम्मान-ओहदा सब कायम है मेरी नजरों में और रहेगा; परन्तु बात वह होनी चाहिए जो व्यापकता को समाहित करती हो, तभी तो असली "वसुधैव कुटुंभ्कम" चरितार्थ होवेगा|

जय यौद्धेय! - फूल मलिक

Saturday, August 17, 2019

ओहो तो "नरसी के भात" वाला किस्सा यह है!

जिसको अक्सर ऑडियो केसेट्स के जरिये बचपन से कृष्ण से जुड़ा हुआ बता के फैलवाया गया है? यह फंडी भी ना मेरे बटे कति तैयार बैठे रह सैं कि समाज में आर्गेनिक तरीके से कुछ फेमस हुआ नहीं और इन्होनें जुट जाना उसपे अपनी स्टाम्प लगा के गाना-बगाना|


ऐसे ही "बाला जी जट्ट" जिन्होनें महमूद ग़ज़नवी से सोमनाथ मंदिर का लुटा हुआ खजाना वापिस लूट लिया था, उनको उठा के हनुमान जी से जोड़ दिया और "बाला जी" टेम्पल्स सीरीज ही चला दी| तो भाई "बाला जी जट्ट" कह के पुजवाने में क्या ऐतराज था आपको, फिर कहोगे कि जाट खार क्यों खाता है| तुम तथ्यों को ज्यों-का-त्यों बना के प्रचारित क्यों नहीं रखते हो, क्या कोई दान-चढ़ावे के जरिये धन की कमी रखता है जाट तुम्हें सही-सही प्रचार करने हेतु?

जय यौद्धेय! - फूल मलिक

My challenge to you: मुझे मेरी 17 पीढ़ियों के नाम पता हैं, आपको कितनियों के पता हैं?


1) फूल मलिक पुत्र 2) (राममेहर मलिक + माँ दर्शना प्रेमकौर) पुत्र 3) (स्व. फतेह सिंह + दादी खुजानी धनकौर) पुत्र 4) स्व. लछमन सिंह पुत्र 5) स्व. शादी सिंह पुत्र 6) स्व. गुरुदयाल (गरध्याला) सिंह पुत्र 7) स्व. बख्श सिंह पुत्र 8) स्व. दशोधिया सिंह पुत्र 9) स्व. थाम्बु सिंह पुत्र 10) स्व. शमाकौर सिंह पुत्र 11) स्व. डोडा सिंह पुत्र 12) स्व. इंदराज सिंह पुत्र 13) स्व. राहताश सिंह पुत्र 14) स्व. सांजरण सिंह पुत्र 15) स्व. करारा सिंह पुत्र 16) स्व. रायचंद पुत्र 17) स्व. मंगोल सिंह

Note: तीसरी पीढ़ी के बाद की दादियों के नाम और पता लगाने हैं|

दादा चौधरी मंगोल जी महाराज ने अपने सीरी भाई दादा श्री मिल्ला कबीरपंथी के साथ सन 1600 में मोखरा, महम रोहतक से आकर अपना "दादा नगर खेड़ा बड़ा बीर, निडाना" बसाया था| दादा मंगोल जी के नाम पर ही निडाना के "मंगोल वाला जोहड़" का नाम है|

मोखरा से पहले गठवालों की लेन जाती है गढ़-ग़ज़नी से आ कासण्डा, गोहाना में "दादा नगर खेड़ा बड़ा बीर" स्थापित करने वाले दादा मोमराज जी महाराज से| क्योंकि वह गढ़ ग़ज़नी की बेगम से लव-मैरिज करके लाये थे इसलिए कटटर टाइप हिन्दू, गठवालों को एक मुस्लिम लड़की से ब्याह करने के कारण "महाहिंदु" भी बोलते हैं| और इसी के चलते मुग़लों ने कभी गठवाले जाटों की बारातों में धौंसा बजते नहीं रोका, ना उनकी बारात रोकी| हाँ, एक बार सन 1620 में गठवालों की छोरी का डीघल, 'रोहतक गाम में दिया कलानौर से गुजरता डोला रांघड़ों (हिन्दू राजपूत से कन्वर्टड मुस्लिम को रांघड़ बोलते थे) ने रोकने की कोशिश जरूर की थी जिसका अंजाम सर्वखाप के झंडे तले "कलानौर रियासत को मलियामेट' करने के स्वर्णिम इतिहास के रूप में दर्ज है|

इस हमले को लीड किया था सर्वखाप सेनापति स्व. दादा धोला सिंह सांगवान (age 19 years) ने| जिसकी कि कलानौर रियासत तोड़ने के बाद में गलतफमियों के चलते हत्या कर दी गई थी व् इस पर गठवालों ने अफ़सोस जताते हुए यह फैसला लिया था कि जिस जगह सर्वखाप ने कलानौर रियासत तोड़ने हेतु पड़ाव डाल लड़ाई के लिए "गढ़ियाँ" (मॉडर्न भाषा में फौजी बंकर बनाये थे, वहां "गढ़ी टेकना मुरादपुर" नाम (मुरादपुर इसलिए क्योंकि यहाँ कलानौर रियासत तोड़ने रुपी मुराद पूरी हुई थी, टेकना इसलिए क्योंकि सर्वखाप ने यहाँ अपना पड़ाव टेका था रखा था और गढ़ी क्यों वह आप समझ ही गए होंगे ऊपर पढ़ के) से गाम बसेगा और इस गाम में अन्य बिरादरियों के साथ सांगवान गौत के जाटों का खेड़ा होगा (पहले जबकि प्रस्ताव मलिक जाटों के खेड़े का हुआ था क्योंकि इस लड़ाई का आयोजन मलिक जाटों के आहवान पर ही हुआ था) और गठवाले यानि मलिक जाट इस गाम को अन्य मलिक गांव की तरह भाईचारे के तहत मानेंगे व् इसलिए इस गाम से रिश्ते नहीं बल्कि भाईचारे निभाएगे; जो वीरवर दादा स्व. धोला सिंह सांगवान जी को श्रद्धांजलि स्वरूप आज तलक भी कायम हैं| इसलिए इस आदर-सम्मान स्वरूप इस गाम में मलिक ना छोरी ब्याहते और ना छोरा, बल्कि भाईचारा चलता है| जबकि अन्य गाम के सांगवान जाटों के यहाँ मलिक जाटों के ब्याह-शादी के रिश्ते ज्यों-के-त्यों चलते हैं| यह बात ख़ास तीन दिन पहले ही मुझे पता लगी है, घर से|

गाम के बालक दो-तीन दिन से गाम के ओरिजिन बारे जानकारी चाह रहे थे तो सोचा यह जानकारी देने के साथ-साथ, बाकी साथियों को अपनी पीढ़ियों के नाम गिनवाने का चैलेंज भी दे दूँ| तो दोस्तों बताओ आप आपकी कितनी पीढ़ी गिना/गिन सकते हो?

जय यौद्धेय! - फूल मलिक

Friday, August 16, 2019

भारत में शिक्षा-स्वास्थ्य को लेकर ग्राउंड जीरो वाले भारतीय तो क्या 90% एनआरआई इंडियंस तक सेंसिटिव नहीं जबकि!


कोई गोरा ना पढ़ ले इसलिए हिंदी में लिख रहा हूँ| सोचा अमेरिका-यूरोप वाली शिक्षा-स्वास्थ्य की सुविधाएँ भी ग्राउंड जीरो पर पहुँचें इस बारे भी बतला लेना चाहिए| वरना पीढ़ियां पेट-भर ठहराएंगी तुमको-हमको|

यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि कभी शिक्षा-स्वास्थ्य पर वर्ल्ड इंडेक्स उठा के देखो तो ऐसे-ऐसे कंट्री हमसे ऊपर हैं कि देख के शर्म आ जाए, तुमको-हमको| नहीं यकीन हो तो WTO व् UNSC की रिपोर्ट्स निकाल के पढ़िए|

खैर, इस विषय पर लेख लिखने का मन इसलिए हुआ कि आजकल इंडिया में डॉक्टर्स की सिक्योरिटी पर एक कानून लाये जाने बारे चर्चा हो रही है जिसमें अगर डॉक्टर से मारपीट की तो 10 साल के लिए अंदर जाओगे|

सरकार कानून ला रही है कि डॉक्टर्स से मारपीट की तो 10 साल की सजा तो सरकार जी अगला कानून क्या होगा आपका कि बैंक-जनता के पैसे लूटने वाले मोदी-माल्या-चौकसियों को गाली भी दी तो 10 साल की सजा?

यार पूंजीवाद तो अमरीका-यूरोप में भी है परन्तु किसी को खुल्ला सांड छूटने जैसी आज़ादी देने वाले कानून तो यहाँ भी नहीं| मतलब एक ऐसे माहौल में जहाँ लगभग हर दूसरा इंसान डॉक्टर्स की फीस की मनमर्जी, इलाज में लापरवाही का भुक्तभोगी है वहाँ डॉक्टर्स को ऐसा कानून और बना देना यानि इनको खुल्ला सांड बना देना| यह तो कुछ-कुछ उस रूढ़िवादी वर्णवाद जैसा हो गया कि डॉक्टर की लापरवाही से कोई मरीज का केस बिगड़ गया या मर गया तो बस खामोश रहो, विरोध या आक्रोश अंदर-ही-अंदर पी जाओ| क्या हम कभी इस वर्णवादी, गोबर से भी सड़ी विश्व की सबसे अमानवीय व्यवस्था से उभर भी पाएंगे या कोशिश भी करेंगे?

अरे छोडो यार, ग्राउंड जीरो पर बैठे इंडियंस तो क्या ही कोशिश करेंगे यहाँ तो 90% एनआरआई जो अमेरिका-यूरोप में बैठे हैं यही इस गोबर साइकोलॉजी को नहीं छोड़ पाते| और वह भी वर्ल्ड की बेस्ट हेल्थ एंड एजुकेशन सिस्टम्स में रहते हुए| उदाहरण के तौर पर फ्रांस की बताता हूँ| यहीं का हेल्थ सिस्टम अमेरिका तक में कॉपी हुआ है|

यहाँ एजुकेशन का मतलब है इंसान का उतना ही ज्यादा ह्यूमन ग्राउंड्स पर सेंसिटिव होना, जिम्मेदार होना जितना ज्यादा वह एडुकेटेड है; खासकर अपने देश-कौम की जनता के प्रति या अपने देश में रहने-बसने वालों के प्रति कहिये| जबकि हमारे यहाँ का वर्णवाद इसका बिलकुल विपरीत है, हमारे यहाँ एडुकेटेड होना मतलब सोसाइटी का बटेऊ/जमाई कहलाने जैसा होना, सोसाइटी पर एडुकेटेड होने का अहसान धर हर चीज पर "बाप का राज" टाइप की मेंटालिटी रखना|

पूंजीवाद अमेरिका-यूरोप में भी है परन्तु यहाँ का सिस्टम फेसबुक वाले जुकरबर्ग तक को कोर्ट के कठघरे में खींच लाता है जब बात पब्लिक की प्राइवेसी व् असिमता (dignity) की आती है| ऐसे नहीं कि कितने ही मोदी-माल्या-चौकसी बैंक-जनता के पैसे पर हाथ फेर, जनता की असिमता को ठेंगा दिखाएं परन्तु सरकार-सिस्टम उनका कुछ ना बिगाड़ पाए|

खैर बात फ्रांस के हेल्थ सिस्टम की: 0 से 25 साल तक हर प्रकार का इलाज फ्री (स्कूल के बाद वाले बच्चों पर 200 यूरो सालाना हेल्थ बीमा चार्ज), 26 से 55 साल तक हर प्रकार के इलाज की न्यूनतम 70 से 100% कॉस्ट सरकार भरेगी (इलाज-इलाज पर निर्भर है कि 70% या 100%), बाकी 30% का आपको इंसोरेंस लेना होगा, 55 साल से ऊपर जाते ही फिर इलाज फ्री|

डॉक्टर्स की फीस फिक्स है यूरो 25 डॉक्टर से एक मीटिंग के; चाहे आप सिंपल बीमार पड़ने से ले कैंसर-किडनी-पथरी जिस चीज का इलाज करवाओ, हर डॉक्टर पर सरकार की नकेल है; कोई भी इस फिक्स अमाउंट से ज्यादा चार्ज नहीं कर सकता चाहे 2 साल के अनुभव वाला डॉक्टर हो या 20 साल के अनुभव वाला| मेडिकल स्टोर्स पर बिना डॉक्टर की रिसीप्ट के आप सिर्फ ओटीसी मेडिसिन्स ही ले सकते हो वह भी तब जब आपकी मेडिकल स्टोर वाले से जानकारी हो जाए, अनजान स्टोर वाला आपको ओटीसी भी बड़ी मशक्क्त यानि 70 तरह के सवाल-जवाब के बाद देगा या नहीं ही देगा| झाड़-फूंक-टूना-टोटका-गृह-नक्षत्र देख-बता कर इलाज करने वाले तो यहाँ नाम सुनने तक को भी नहीं मिलते|

यही सिस्टम एजुकेशन का है, एजुकेशन में तो सरकार ने मोबाइल फ़ोन्स का इस्तेमाल तक बंद कर रखा है; वही इस्तेमाल जिसको कभी इंडिया में कोई सामाजिक संस्थाएँ बंद कर देती हैं तो सब तालिबान-तालिबान चिल्लाने लगते हैं| अरे जिन इंडियंस के खुद के बच्चे फ्रांस के मोबाइल यूज़ बंद स्कूलों में पढ़ते हैं, वह तक तालिबानी फैसला कह कर कोसते देखे हैं| किसी में इतनी सेंसिटिविटी नहीं कि अगर उस सामाजिक संस्था का बच्चों के फोन बंद करने का सलीका गलत है तो उनको सही सलीका सुझा सके, क्योंकि फैसला तो सही है| जब फ्रांस में सही है तो इंडिया में कैसे गलत हो जायेगा? परन्तु नहीं, सामाजिक सौहार्द और मेलजोल के नाम पर बस इतने ही सेंसिटिव हैं लोग कि चिल्ला लेंगे परन्तु किसी को फ़ोन करके यह नहीं बोलेंगे कि इस फैसले का टेक्स्ट चेंज करवाना चाहिए|

अब लेख हिंदी में लिखा है तो किसी गोरे के पढ़ लेने का तो भय है नहीं सिवाए अगर कोई इसका ट्रांसलेट मार के पढ़ने तक की जेहमत उठाये तो| दरअसल पेटभर कल्चर है यह वर्णवादी व्यवस्था वाला, जब तक इसको तिलांजलि नहीं दी जाएगी, तब तक ग्राउंड जीरो वाला इंडियन तो क्या 90% एनआरआई इंडियन तक भी ह्यूमन सेंसिटिव नहीं हो सकता|

बिना डॉक्टर्स की फीस व् इलाज में लापरवाहियों बारे सख्त कानून यथास्थान होने के साथ-साथ उनकी इम्प्लीमेंटेशन के ऐसे कानून लाने का पुरजोर विरोध होना चाहिए| यह सीधा-सीधा घिसा-पिटा वर्णवाद, लोगों की छाती पर बिठाने का नया खोल है|

जय यौद्धेय! - फूल मलिक

Thursday, July 25, 2019

पाश्चात्य सभ्यता इतनी समृद्ध-संम्पन-खुशहाल-विकसित क्यों है?

क्योंकि यह उन बातों के प्रैक्टिकल करते हैं, जिन पर हमारे समाज या कहिये देश में सिर्फ थ्योरी चल रही हैं वह भी आज भी| हमारे वालों को यह कथावाचकों-जागरण आदि वालों के मुख से थ्योरी ही पसंद हैं, प्रैक्टिकल की बात करो तो औकात एक झटके में "सांप की केंचुली" की भांति धरा पर| क्या प्रक्टिकल्स हैं जो पाश्चात्य सभ्यता को इतना खुशहाल बनाते हैं, कुछेक इस तरह:

1) कोई काम छोटा-बड़ा नहीं होता, सब समान होते हैं - यहाँ पुजारी से ले व्यापारी, कर्मचारी से ले जमींदारी, मजदूरी से ले जमादारी; सबकी न्यूनतम आय वह भी बराबर अनुपात में ही फिक्स है| हम इंडिया में कितना देते हैं काम वाली बाई को? पूरे दिन का 5 से ले 10 हजार हद मार के? कोई 40-50 हजार भी कमाता हो तो काम वाली बाई आराम से अफ़्फोर्ड कर ले| लेकिन यहाँ, न्यूनतम शुरुवात ही 1500 यूरो यानि लगभग 1 लाख 10 हजार से शुरुवात होती है, यानि अगर आप 3000-4000 यूरो भी महीने के कमाते हो तो दस बार सोचना पड़ता है बाई रखने से पहले| इसको बोलते हैं वाकई में काम-छोटा बड़ा नहीं होना| प्लम्बर हो या कोई एमबीए किया हुआ प्रोफेशनल, शुरुवाती स्टार्ट सबका लगभग एक अनुपात का, यह नहीं कि प्लम्बर करियर शुरू कर रहा है 4000-5000 से और एमबीए वाला 60-70 हजार या लाखों से| वैसे इंडिया में आज के दिन सबसे कम कमाने वाला किसान है, मजदूर जितनी दिहाड़ी बराबर बचत नहीं उसको, खासकर अगर 2-4 एकड़ की जोत वाला है तो| नए जमाने के दलित तैयार हो रहे इंडिया में जिनका नाम है "किसान"| पता नहीं यह लोग बने किस मिटटी के हैं कि इतने घाटे सह के भी खेत जोतते ही जाते हैं| बड़ी जोत ना हो तो खेती करना सबसे बड़ा अभिशाप आज के दिन इंडिया में| परन्तु इसकी सरकारी व् किसान की खुद की भी, दोनों तरह की वजहें हैं, उस बारे फिर कभी|

2) पुलिस-एडमिनिस्ट्रेशन की है सर्विस की जॉब एंट्री लेवल यानि कांस्टेबल लेवल से शुरू होती है| कोई भी डायरेक्ट एसपी/डीसी नहीं बन सकता यहाँ| चौक-चौहारों पर कांस्टेबल वाला डंडा सबको लहराना पड़ता है पहले|

3) पादरी की पोस्ट्स पर कोई जातीय-वर्णीय बैरियर प्रैक्टिकल में ही नहीं है| असल तो यहाँ वर्ण सिस्टम ही नहीं तो वर्णवाद आना ही कहाँ से था| यह है प्रैक्टिकल बराबरी|

4) जेंडर सेंसिटिविटी में तो फ्रांस जैसे देश को पूरे विश्व की सभ्यता की माँ बोला जाता है| सबसे ज्यादा जीती हैं यहाँ की औरतें| सबसे ज्यादा हक व् खुलापन है औरत को यहाँ| इसके कहीं आधे-पद्धे भी मैंने ऐसा प्रैक्टिकल में देखा है तो इंडिया की "उदारवादी जमींदारी" जातियों के यहाँ देखा है, अन्यथा पूरे इंडिया में औरतों को यहाँ की अपेक्षा 10% भी आज़ादी नहीं 99% औरतों को|

अब कम-से-कम वह लोग यहाँ के प्यार के इजहार में इस्तेमाल होने वाले खुलेपन पर ही सारी तोहमत चेप कर पल्ला ना झाड़ लेना कि तुम ही इनसे श्रेष्ठ हो| ऐसे-ऐसे चिकलाते चिघनान काटते हमने ओटडे कूद, उन्हीं रिश्ते-मर्यादाओं में मुंह मारते देखे जिनको समाज के आधार-स्तम्भ बताया| और यहाँ वालों में आपस   में इतना संयम व् डिसिप्लिन है कि कोई जोड़ा किस कर रहा हो तो सबको अपने काम से काम है, कोई ध्यान भी नहीं देता कि कौन जोड़ा गले मिला या किसने किस किया|
 
कमाल की बात तो यह देखी कि एनआरआईयों को सुविधाएँ को यूरोप की ही चाहियें, परन्तु दिमाग में वर्णवाद का कचरा वही रखना जो हमारे समाज का सबसे बड़ा कलंक है|

जय यौद्धेय! - फूल मलिक 

Tuesday, June 4, 2019

सीएम खटटर खुद को जाट बोल/बुलवा रहे हैं तो आप क्यों बौरा रहे हैं?

ऐसी कुछ रिएक्शंस आई हैं मेरे पर्सनल बॉक्स में मेरी कल वाली इस विषय पर लिखी पोस्ट को लेकर, जिसमें मैंने कही है कि अगर सीएम वाकई जाट हैं और वह राजनीति से परे सच्ची नियत रखते हुए खुद को लोकल जाट जाति में शामिल करना चाहते हैं तो इस पर जाट को भी विचार करके, बड़ी पंचायत कर लेनी चाहिए|

जैसा कि मैंने उस पोस्ट में कही यह दूसरी बार है जब सीएम जैसा यह प्रयास हो रहा है| पहला प्रयास जब 1947 में आये थे तब भी हुआ था| इस पर सीएम की बात को आगे रखते हुए, एक बार बैठ कर ऑफिसियल स्तर पर विचार कर लेना चाहिए| अगर सिर्फ पोलिटिकल स्टंट होगा तो वह भी पता चल जायेगा और अगर वाकई में वह जाट हैं वह भी सामने आ जायेगा| और ऐसे ही यह तमाम जातियां डिकोड होकर अपनी-अपनी स्थानीय जातियों में मर्ज हो जाती हैं तो इसके फायदे बहुत हैं:

1) 35 बनाम 1 का मुद्दा अपनी मौत खुद मर जायेगा|
2) इस 35 बनाम 1 के चलते आज हरयाणा, पंजाब के 1984 जैसे हालातों से गुजर रहा है और एक ऐसी भट्टी पर धधक रहा है कि एक छोटी सी करेली (छड़ी से दबी आग को उभारना) भी पूरी स्टेट को लपेटे में ले सकती है और अगर ऐसा हुआ तो सब ओर अव्यवस्था व् अराजकता फ़ैल जाएगी| और कहीं ना कहीं सीएम को इस बात का भान है शायद इसलिए वह ऐसा प्रयास करते होते हो सकते हैं; वही बात जो बार-बार दोहरा रहा हूँ कि क्या पता उनकी मंशा सच्ची हो| कम-से-कम इस पर एक पंचायत बुलाने में क्या हर्ज है? वरना कल को प्रदेश 1984 वाले आतंकवाद वाली मारकाट में उलझ गया तो कौन जिम्मेदार होगा?
3) कई कह रहे हैं कि फिर सर छोटूराम ने जिन सूदखोरों व् ढोंगी-पाखंडी फंडियों के खिलाफ किसान-मजदूरों-व्यापारियों के हकों बाबत आंदोलन किया था उनका क्या? उनसे इसी शैली में सवाल है कि जिन किसान-मजदूरों-व्यापारियों के लिए आंदोलन किया था क्या वह उधर वाले पंजाब में नहीं थे? थे ना, तो किधर हैं वो आज? कुछ मुठ्ठीभर की वजह से अलगाव रख के रहना कहाँ तक जायज है? वही सर छोटूराम वाली बात, उनको पहचानों और उनसे बचो; बाकियों को क्यों एक ही लपेटे में ले रहे हो? और ऐसे लोग क्या तब के इधर वाले पंजाब में नहीं थे या आज नहीं हैं?

मेरा तो अनुरोध रहेगा अगर कोई सामाजिक-पंचायती आदमी इस पोस्ट को पढ़ रहा हो तो बेशक इस लेख को किसी भी आम या खास पंचायत को पहुंचवा दीजिये और कहिये कि सीएम की इस एप्रोच पर एक बार बैठकर विचार जरूर करें| इससे दोनों ही बातें हो जाएँगी, अगर यह मिथ्या प्रचार होगा तो यहीं के यहीं थम जायेगा अन्यथा वही बात हरयाणा में नए सामाजिक समीकरण उभरेंगे जो 35 बनाम 1 के मुद्दे को तो बैठे-बिठाये निगल जायेंगे| और वैसे भी यह प्रयास सीएम की तरफ से है वह भी दूसरा ऐसा प्रयास; तो एक बार बैठ के बतलाने में क्या हर्ज?

मैं तो पूरा सहयोग करने को तैयार हूँ इस मुद्दे पर| जो शोध या स्ट्रेटेजी बनानी हो इस पहलु की सत्यता हेतु उस पर विचार को भी तैयार व् योगदान को भी| बाकी जिनको नाज के बहल की मारणी है, वह मारते रहें|

जय यौद्धेय! - फूल मलिक

अगर जैसा फैलाया जा रहा है वैसे मनोहरलाल खट्टर वाकई में जाट हैं तो!

बात थोड़ी मेरे बचपन से: हमारे गाम में एक दुकान को "पाकिस्तानी की दुकान" बोला जाता था| मेरी दादी जी जब भी मेरे से कुछ सामान मंगवाती तो कहती कि "पाकिस्तानी वाली दुकान" से लाना, ताकि उसकी कुछ आमदन हो जाए और उसका घर ठीक से चलता रहे| इसको दादी जी की मानवता ही कहूंगा| जात-बिरादरी समझने की जब तक अक्ल ना आई तो यही समझता रहा कि जाट-बाह्मण-कुम्हार आदि की तरह पाकिस्तानी भी कोई जाति ही होगी| परन्तु जब जानने लगा कि पाकिस्तान एक देश है तो एक दिन दादी से ही पूछा कि ऐसा है तो फिर उस दुकान वाले पाकिस्तानी ताऊ की बिरादरी क्या है?

तो दादी ने बताया कि जातियां तो इनकी भी हमारी तरह ही हैं, अन्यथा कौनसा पाकिस्तान बॉर्डर के उधर जातियाँ नहीं थी; परन्तु क्योंकि जब यह आये-आये थे तब इनके प्रयासों के बावजूद यहाँ लोगों ने इनको अपनी-अपनी बिरादरियों में जाति बताने के बाद भी स्वीकार नहीं किया तो यही इनकी पहचान बन गई|
दादी से पूछा कैसे प्रयास?

तो दादी बोली कि जब यह लोग वहां से आये थे तो यहाँ अपनी-अपनी जातियों के लोकल लोगों के साथ रिश्ते चाहते थे और अपनी-अपनी जाति में मिक्स होना चाहते थे| परन्तु स्थानीय लोगों ने उस वक्त के अविश्वसनीय माहौल को देखते हुए, इनको मिक्स करने में झिझक दिखाई| अन्यथा हिन्दू समाज के वर्णों के अनुसार चार वर्ण व् एक अवर्ण इनमें भी हैं| मैंने कहा चार वर्ण तो हुए बाह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व् शूद्र, यह अवर्ण कौन हैं? दादी बोली कि जाट अवर्ण हैं यानि हम, हमारे पुरखे इस चतुर्वर्णीय व्यवस्था को नहीं मानने वाले रहे हैं| और इसी वजह से ऋषि दयानन्द जैसे समझदार बाहमण हमें "जाट जी" व् "जाट देवता" कहते-लिखते-बोलते आये हैं|

खैर, यह तो है इस पहलु का वह इतिहास जो मेरी दादी जी से सुना-जाना| अब बात, फ़िलहाल चल रही सोशल मीडिया पर इस बात कि "हरयाणा के मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर खुद को जाट प्रचारित करवा रहे हैं" की|
इसके दो हवाले खुद सीएम के मुख से सुनने को आये हैं|

एक अभी निबटे लोकसभा चुनाव-प्रचार के दौरान उन्होनें रोहतक के निंदाना गाम की सभा में वहां के जाटों को यह कहा है कि, "हूँ तो मैं भी जाट ही, परन्तु पाकिस्तान से आया होने की वजह से आप लोग नहीं मानते वह अलग बात है"|

दूसरा वाकया रोहतक के ही मदीना गाम के सरपंच के साथ उनके सामाजिक संबंधों से निकल कर आता है, जहाँ इनके दूर के मामा भी रहते हैं जो कि ढिल्लो गौती जाट हैं|

खैर, मेरे लिए यह अचरज की बात नहीं क्योंकि चौधरी भजनलाल भी गैर-जाट की राजनीति करते-करते अंत में जाट ही निकले जो कि वह हैं भी| बस जाति छुपाकर गैर-जाट राजनीति करते रहे|

अब ऐसे मौके पर जबकि चार महीने बाद हरयाणा में विधानसभा चुनाव सामने खड़े हैं, उस वक्त पर सीएम खट्टर का यह जाट-प्रेम किन मंशाओं के चलते है बारीकी से समझने की बात है|

अगर यह सिर्फ जाट वोट लेने के चक्कर में है तो फिर जाट बनाम नॉन-जाट व् 35 बनाम 1 क्यों होने दिया हरयाणा में? होने दिया सो होने दिया, इसको अब खत्म करवाने हेतु क्या प्रयास रहेंगे सीएम के? और क्या यह सिर्फ आगामी विधानसभा में वांछित बहुमत के लिए जाट वोट कितना अहम् है यह भान के हो रहा है, प्रचारित करवाया जा रहा है?

राजनीति के परे अगर यह वाकई में सामाजिक स्तर पर मिक्स होने की दूसरी कोशिश (पहली कैसे हुई थी उस बारे ऊपर बताया) है तो सीएम को इसके लिए बाकायदा एक समिति बना के इस पर पूरी शोध करवानी चाहिए व् उन परिवारों से इसकी सत्यापना करवानी चाहिए जो आज के इंडिया-पाक बॉर्डर के दोनों तरफ के 100-50 किलोमीटर के दायरे में रहते थे व् आपस में वैवाहिक रिश्ते थे| यही वह परिवार हैं जो इस बात को सही से हल करवा सकते हैं| उस वक्त वाले प्रयास सिरे ना चढ़े हों परन्तु क्या पता अब वाले चढ़ जाएँ अगर वाकई में इसको लेकर सीएम की सोच व् नियत सूची है तो|

परन्तु कहीं यह इलेक्शन के वक्त का सीएम का जाट प्रेम इनकी पार्टी की पॉलिटिक्स तो नहीं ले डूबेगा? पता लगा जाट बनने के चक्कर में जाट बनाम नॉन-जाट हुआ पड़ा सारा माहौल ही पलटी मार गया और सब बीजेपी को छोड़ अन्यत्र चले गए? कितने जाट फेस सीएम नहीं चाहने वाले लोगों को झटके लगेंगे यह जानने पर कि भजनलाल की तरह यह भी जाट निकले?

अगर यह प्रचार कोरी राजनीति से प्रेरित है तो नहीं ही हो तो बेहतर अन्यथा अगर सीएम इसको सामाजिक बँटवारा पाटने हेतु कर रहे हैं तो यह विचारणीय कदम है|

जय यौद्धेय! - फूल मलिक

Monday, June 3, 2019

यह "भाऊ को भी हाऊ" कहने वाला कल्चर है, इसको ना जान्ने वाले बुरा ना मानें!

बड़े चौटाला साहब द्वारा हरयाणा सीएम को खटटर कहने के प्रकरण पर यह मेरी दूसरी व् अंतिम पोस्ट है|
इसमें है हरयाणा लाइव टीवी वाली महिला एंकर को मेरा जवाब, जो हरयाणवियों को मानवता-सभ्यता का पाठ पढ़ा रही थी|

मीडिया व् राजनीति में बैठे जितने भी लोग चौटाला साहब के बयान को बेवजह का तूल दे रहे हैं उनको बता दूँ कि यहाँ व्यक्तियों-क्षेत्रों-बोलियों के अपभृंश व् उपहास करने का विश्व का सबसे श्रेष्ट कल्चर है, इसलिए बुरा ना मानें|

यहाँ तो पानीपत की तीसरी लड़ाई जीतने को अपनी औरतों समेत आये सदाशिवराव भाऊ के जुल्म-क्रूरता-निर्दयिता को देख हमारी औरतों ने "हाऊ" शब्द घड़ लिया था| आज भी औरतें छोटे बच्चों को देर-सवेर बाहर निकलने या रात को सोते वक्त, वक्त से नहीं सोने पर यह कह के सुला देती हैं कि, "सो जा नहीं तो हाऊ खा ज्यांगे"| और उनके पास इसकी सबसे बड़ी वजह थी बिना युद्ध जीते, अपनी औरतें साथ ला, उनपे दुश्मन के जुल्म ढलवाने व् उनके कत्ले-आम व् बलात्कार होने की वजह बनना| यह तो जाट थे यहाँ सो मरहम पट्टी करके इनको बचा लिया वरना अब्दाली ने तो एक-एक तो मार देना था| और क्योंकि यह विश्व की सबसे बड़ी मूर्खता थी कि युद्ध जीते नहीं और अति-आत्मविश्वास की अति करते हुए औरतों-बच्चों को भी हाँक लाये| इसलिए हरयाणवी औरतों के मुख से "भाऊ" की जगह "हाऊ" कहलाये|

तो इस कल्चर ने तो ऐसे-ऐसे खब्बी-खां मजाक के पात्र बनाने से नहीं बख्शे तो आप क्यों मुंह सुजा रहे हो? आप क्यों इसको सभ्यता-मानवता-शालीनता का मुद्दा बनाते हो? और गजब की बात तो यह है कि इसको मुद्दा मीडिया में बैठी उस वर्ग की औरतें ज्यादा बना रही हैं जो यदाकदा जाटों के यहाँ औरतों की स्थिति को भी ऐसी दयनीय बता के दर्शाने से बाज नहीं आती हैं कि जैसे जाट तो औरत के मामले में सबसे क्रूर लोग हैं विश्व के|

जबकि इनके खुद के समाजों में इनकी इतनी भी औकात नहीं कि अपने मर्दों से मंदिरों में 50% पुजारी की पोस्टों पर पुजारनों का हक मांग सकें| 100 में असल तो 100 नहीं तो 99% पुजारी पोस्टों पर मर्द कब्जे किये बैठे हैं परन्तु इनको फिर भी औरतों के हक-हलूल दूसरों के यहाँ सही नहीं हैं वही दीखते हैं| चिंता ना करो अपने मर्दों से अपने यह हक तक नहीं मांग सकने तक की गुलामों, जाटों ने तो अपने "दादा नगर खेड़ों" में पूरा 100% पूजा-धोक का हक दे ही अपनी औरतों को रखा है| मर्दवाद को तो हम पूजा-पाठ के मामले में घुसने भी नहीं देते|
हाँ, यह टीवी सेरिअल्स, फ़िल्में और जगराते-भंडारे-चौंकियों की बहकावे में पड़ बहुत सी जाटणियां अपने कल्चर की इस ख़ूबसूरती से उल्टी हटी हुई सी दिखती हैं| क्योंकि शायद इनको मेरे जैसे ऐसे मानवीय पहलु दिखाने वाले जाट समाज में ही बहुत कम हैं तो कमी हमारी ही है| वरना जिस दिन हमने अपनी जाटणियों को अपना कल्चर उतनी सीरियसनेस से बताना शुरू कर दिया जितनी से तुम्हारे वाले तुम्हें बता के भी तुम्हारा 50% पुजारन का हक नहीं देते, उस दिन हमारे वाली तो थारे तोते उड़ा देंगी|

खैर, लब्बो-लवाब यही है कि "अधजल गगरी छलकत जाए" वाले ढकोसले कम-से-कम हमारे सामने तो करो मत| तुम में, तुम्हारे समाजों-वर्णों में मानवता-सभ्यता का क्या अर्श है और क्या फर्श है भलीभांति जानते हैं| वही बात जाओ पहले अपने हक ले लो अपने मर्दों से, फिर चाहे तुम "गोल बिंदी गैंग वाली हो" या मेरी दादी की भाषा में "चुंडे पाटी हुई हो" या लटूरों वाली हो| हमें पता है हम क्या हैं, यूँ ही नहीं सारा भारत तुम्हारी मीडिया वाली ही भाषा में कही जाने वाली "जाटलैंड" पर मजदूरी-दिहाड़ी-रोजगार-व्यापार करने चला आता है| यहाँ तक कि मुंबई में बाल ठाकरों व् राज ठाकरों से पिटे-छीते हुए व् गुजरात से भर-भर ट्रेनें उत्तर-पूर्व को भगाये हुओं को भी यही मीडिया की भाषा वाली "जाटलैंड" अंतिम आसरा दिखती है|

हरयाणवियों, यह लेख उस हरयाणा लाइव वाली एंकर को भेज देना जिसका बोलने का लहजा भी उत्तर-पूर्व भारत का है| और वहां अपनी स्टेट सुधारने हेतु वहीँ रह के कुछ करने के बजाये, चली है यहाँ आ के हरयाणवियों को शालीनता-सभ्यता सिखाने| अपने टूक खा लो टिक कें, हरयाणा से यू आड़े भाऊ का हाऊ बनाते आये, थमनें क्यों मुंह सुजाये?

"कह दो इन भांड-भंडेले-बेसुरों को कि तुम्हारी कहबत में ना हम अपने हास्यरस व् हास्यरंग का गला घोटेंगे, यूँ ही ठहाके म्हारे पुरखों ने ठोकें और यूँ ही हम ठोकेंगे"! वरना थारी कहबैत में तो हम अपनी बहु-बेटियों को साउथ इंडिया की भांति देवदासी बना के मंदिरों में पंडों के लिए परोस तक दे तो सभ्य व् शालीन ना कहलाएं|

जय यौद्धेय! - फूल मलिक

"हमें दिमाग की ताकत के साथ शरीर की ताकत भी चाहिए होगी" - बंच ऑफ़ थॉट्स पुस्तक में आरएसएस संस्थापक गोलवलकर के विचार|

इन्हीं को फॉलो करके, कितना भी बड़े दिमाग वाला हो वह भी आरएसएस की दी लाठी काँधे पर रख मार्च पास्ट करता देखा गया है| परन्तु सलंगित अख़बार को देखिये, यह शारीरिक बल का मजाक उड़ा कर सीएम साहब क्या गोलवलकर की बात का उलंघन व् अनादर नहीं कर रहे हैं? और दिमाग की ताकत पर इनको भी भरोसा नहीं तभी रोज आरएसएस में लाठियां भांजते हैं, वही शारीरिक ताकत हासिल करने को जिसका यह खबर मजाक उड़ा रही है? यानि एक हिसाब से स्वीकार रहे हैं कि हममें शारीरिक बल तो है ही नहीं, दिमाग की ताकत भी उतनी नहीं कि लाठी का सहारा ना लेवें? यानि घूम फिर के दिमाग की सारी तिगड़म लगा के भी आखिरकार आरएसएस की शाखाओं में पकड़ते तो वही लाठी हैं, जिसका फूफा लठ हर हरयाणवी के घर में बाई-डिफ़ॉल्ट रखा होता है?

तो बताओ अक्ल बड़ी या लाठी? गोलवलकर के अनुसार तो दोनों ही जरूरी| तो जब दोनों ही जरूरी तो यह चिढ़ कैसी? इस हिसाब से तो बल्कि हरयाणवी दोनों का बेजोड़ मेल हुआ? वरना क्या बिना अक्ल ही हरयाणा देश की सबसे अमीर स्टेट कहलाती, देश के सबसे ज्यादा करोड़पति ग्रामीणों की स्टेट कहलाती? अक्ल होगी तभी तो जोड़ा होगा? और लठ तो बाई-डिफ़ॉल्ट ट्रेडमार्क है ही हरयाणा का|

हाँ, हरयाणवी लोकतान्त्रिक होते हैं, बाँट के खाना-खिलाना जानते हैं, मुसीबत में पड़े को अपने रिसोर्सेज दे बसाना जानते हैं तो इसका मतलब यह थोड़े हुआ कि वह कंधे से ऊपर कमजोर हो गए; यह तो मानवता हुई ना?
सो टेंशन नहीं लेने का, सीएम साहब, आपके गुरु का जो नियम आरएसएस की शाखाएं भी ज्वाइन करके लोग हासिल नहीं कर पाते यानि बुद्धि व् लाठी दोनों की ताकत, एक हरयाणवी वह बाई-डिफ़ॉल्ट ले के पैदा होता है प्लस में वह तीसरी ताकत लोकतान्त्रिक मानवता भी लिए होता है| जिसके चलते मुंबई-गुजरात से पिट-छित के आये उत्तरी-पूर्वी भारतीय भी हमारे हरयाणा में ही सबसे ज्यादा सेफ रोजगार पाते हैं|

अत: जिस लेवल की अक्ल व् कंधे से ऊपर की मजबूती का शायद आप इशारा (चार-सौ-बीसी, दगाबाजी, टैक्सचोरी, 99 का फेर आदि-आदि) कर रहे हैं वह हमें चाहिए भी नहीं| वैसे भी हमें अपने लठ की ताकत से खुद ही डर लगता है इसलिए इसको आप भी मत जगाएं| यह सोई हुई ही अच्छी है, अन्यथा जब-जब जागी है तो शिवजी उर्फ़ दादा ओडिन-जी-वांडरर की भांति धरती के सारे जहर को साफ़ कर-कर गई है|

और ऐसे विचार रखकर भी आप "हरयाणा एक, हरयाणवी एक" जैसे नारे कैसे दे लेते हैं? इस खबर से साबित होता है कि हरयाणा में पैदा होकर भी हरयाणवी नहीं बन पाए आप तो| ऐसी धूर्तता अगर आपके अनुसार दिमागी ताकत है तो यह आपको ही मुबारक| वह चूहे-बिल्ली वाली बात| बिल्ली ने मारा झप्पटा चूहा जा घुसा बिल में, बिल्ली को उसकी पूँछ ही हाथ लग पाई| बिल्ली ने चूहे को बिल के अंदर आवाज लगाई कि, "आ जा रे चूहे तेरी पूंछ जोड़ दूँ"| चूहा बोला, "ना री मौसी रहने दे, हम तो यूँ लांडे ही खा कमाएंगे"| तो इतनी हद से ज्यादा अक्ल का भी क्या करना सीएम साहब जो समाज में तानाशाही/वर्णवादिता की परिचायक बन जाए|

वो जैसे कहते हैं ना कि साइंस तभी तक भली जब तक उसका पॉजिटिव प्रयोग हो, नेगटिव प्रयोग होव तो विश्व का विनाश कर दे साइंस| ऐसा ही मसला दिमाग की ताकत का है, पॉजिटिव व् मानवीय दिशा में इस्तेमाल करें तो सार्थक नहीं तो सब निरर्थक|

जय यौद्धेय! - फूल मलिक


Sunday, June 2, 2019

ना मरया रे बेटा सींक-पाथरी, ना मरया रे आहुलाणे-मदीनें; अर जा मरया रे बेटा गैभाँ के निडाणे!

लेख का कनेक्शन हरयाणा सीएम को चौधरी ओमप्रकाश चौटाला जी द्वारा "खट्टर" कहने से है| वास्तविक हरयाणवी कल्चर क्या है, यह भी आपको इस लेख में बारीकी से जानने को मिलेगा, अत: पूरा पढियेगा|

यह ऊपर शीर्षक वाला क्रंदन आज से पांच-छह पीढ़ी पहले जागसी गाम में हुए नामी धाड़ी दादा निहाल सिंह की मेरे गाम निडाना में मौत होने पर उनकी माँ ने उनकी लाश देखकर चीत्कार किया था| हरयाणा में बदमासी के नाम से सबसे मशहूर गामों में नाम है गोहाना वाली जागसी का| "गैभाँ" शब्द का शुद्ध हरयाणवी भाषा में अर्थ होता है, "शुरू-शुरू में लड़ाई से डरने वाले, कन्नी काटने वाले, एक जगह कमा के मानवता को सर्वोपरि रख के बसने वाले परन्तु सर पे आई पे उठा-उठा पटकने वाले"| और ऐसा हुआ भी है, इसी निडाना में| दादा चौधरी सहिया सिंह मलिक (सांजरण पान्ने की उदमी क्लैन में हुए हैं) जैसे 100-100 घोड़ों से सजी गाम लूटने चढ़ने वाली धाड़ को अकेले वापस मोड़ने वाले अमर यौद्धेय निडाना के खेड़े में हुए हैं और धाड़ों से आमने-सामने की टक्कर में 18-18 को अकेले मौत के घाट उतारने वाले दादा चौधरी गुलाब सिंह मलिक (भंता पान्ने से, अक्सर पूछा करता हूँ कि इस भंते शब्द का बुद्ध धर्म वाले भंते से कोई कनेक्शन लगता है) भी हुए हैं| इस गाम के लोग वह हैं जिनसे प्रेरणा पा यहाँ के बाह्मणों तक ने अपनी विधवा बेटियों के पुनर्विवाह शुरू किये| आज से लगभग सौ साल पहले दादा जी गूगन बाह्मण ने उनकी विधवा बेटी (म्हारी बुआ, 36 बिरादरी की बेटी-बुआ, म्हारी बेटी-बुआ, यह सगी बुआ-बेटी के पैरलेल होती हैं) का पुनर्विवाह किया तो उनको गाम के बाह्मणों ने पंचायत कर जात-बिरादरी से गिरा गाम निकाला दिया तो गाम के जाटों ने गाम में मलवे ठोले की तरफ अपनी जमीनों पर बसाया व् खेती-बाड़ी को जमीनें दी| परन्तु गाम नहीं छोड़ने दिया क्योंकि दादा गूगन ने मानवता का वह काम किया था जिसके लिए जाट समाज पूरे विश्व में जाना जाता है|

यह रेपुटेशन रही है हरयाणा में जिला जिंद के निडाना नामी गणतंत्र, निडाना नगर खेड़े की| इस नगर शब्द को वह लोग अच्छे से समझ लें जो खामखा अपने को ग्रामीण कहते हैं, यह नगर शब्द हमारे गाम-खेड़ों के साथ तब से है जब जींद हो, रोहतक हो, सोनीपत हो, दिल्ली हो या 1947 में बसा कुरुक्षेत्र (इससे पहले कुरुक्षेत्र नाम के शहर का कोई रिकॉर्ड नहीं इंडिया में, किसी को बहम हो तो दूर कर लेना) हो, यह या तो बसे नहीं थे या गाम यानि हमारे नगर खेड़ों जैसे ही थे| जिसको इन बातों पर बहस करनी हो खुला स्वागत है| हरयाणवी कल्चर ना ग्रामीण कभी था ना आज है, आगे आपने धक्के से इसपे ग्रामीण का ठप्पा लगवाना हो तो नादानियों से लगवाते रहो| और ऐसी ही कहावतें-सामाजिक रुतबे व् आंकलन की बातें/कहावतें/लोकोक्तियाँ यहाँ हर गाम-नगर खेड़े रुपी गणतंत्र की हैं| जब तक आप हरयाणा के इस गणतंत्र रुपी कांसेप्ट को नहीं समझेंगे यहाँ के कल्चर के हास्यरंग व् हास्यरस आपको समझ नहीं आएंगे| अगर आप "गैभ" हैं तो यह कल्चर आपको गैभ ही कहेगा यही इसका बेबाकपना व् स्वछंदता है|

हरयाणवी भाषा की आठ मुख्य बोलियाँ हैं व् दस इसके जियोग्राफिक घेरे हैं जो यह हैं बाँगरू (बांगर), बागड़ी (बागड़), देशवाली/खादर, खड़ी बोली (नया शब्द कौरवी), रांगड़ी, ब्रजभाषा, मेवाती, अहिरावती| मेरा गाम पड़ता है बांगर व् खादर के बॉर्डर पर, ठेठ बांगर वाले हमें खादरी बोलते हैं और ठेठ खादर वाले बांगरू|

तो यह तो है यहाँ की कल्चरल सरंचना की कुछ बेसिक सी बातें| अब आते हैं विवादों में चल रहे "खट्टर" शब्द पर:

खट्टर हरयाणवी कल्चर में गौत भी है जो अरोड़ा/खत्री, जाट व् राजपूत तीनों में तो पक्के से पाया जाता है और आवारा पशु व् नालायक इंसान को भी यहाँ "खट्टर" ही कहते हैं व् कंडम हो चुकी बस-गाड़ी को "खटारा" कहते हैं|

सर छोटूराम की यूनाइटेड पंजाब सरकार में यूनियनिस्ट गवर्नमेंट के 2 दफा प्रीमियर रहे जनाब सर सिकंदर हयात खान, "खट्टर" गौती मुस्लिम जाट थे|

हरयाणा के सीएम मनोहर लाल खट्टर भी खुद को बार-बार जाट बता रहे हैं| ताजा मामला अभी लोकसभा चुनाव प्रचार में रोहतक के गाम निंदाना व् मदीना में उनकी जुबानी ही सुनने को मिला है| जिसमें निंदाना में उन्होंने चुनावी सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि पाकिस्तान से आया हूँ इसलिए आप नहीं मान रहे परन्तु मैं हूँ जाट ही| मदीना में तो सीएम के मामा हैं जो ढिल्लो गौती हैं, दूर के मामा हैं शायद|

अब बात उनकी जो "खट्टर" शब्द पर चौटाला साहब की टिप्पणी को व्यर्थ का मुद्दा बना रहे हैं|

एक तो यह वही लोग हैं जिन्होनें जब 2005 में चौटाला साहब की जगह हुड्डा साहब सीएम आये थे तो कहा था की "टांग-टांग बदली, बाकि तो वही है" यानि लंगड़िये की जगह दो टांग वाला आया है परन्तु है जाट ही| तो अभी चौटाला साहब के बयान पर मान-मर्यादा-सभ्यता का उवाच करने वाले, यह मात्र 15 साल पहले की अपनी सभ्यता ना भूलें और "नई-नई डूमणी अल्लाह ही अल्लाह पुकारे" की तर्ज पर ज्यादा सभ्य दिखाने और वास्तविक सभ्य होने में क्या फर्क हैं यह समझ लें|

दूसरा हरयाणा में चौटाला शब्द लंगड़े का प्रतीक भी माना जाता है और इसको ऐसा पकाने में सबसे ज्यादा योगदान जाट समाज का ही है|

चौधरी बंसीलाल के जमाने में जब भी किसी के यहाँ भैंस को कटड़ा होता था तो सब कहते थे कि बंसीलाल हुआ है|

मेरे जुलाने हल्के व् जिंद जिले में हुए दादा दल सिंह को "पानी का बादल" व् "भिंडा झोटा" कहते थे|

और आज के दिन गली-गोरों पर घुमते आवारा सांडों को क्या गाम वाले और क्या शहर वाले सब देखते ही बोलते हैं "खट्टर आ गया"| ना बोलते हों शहरों वाले भी तो बता दो?

जहाँ तक व्यक्तिगत बदजुबानी की बात है तो खुद सीएम खट्टर का 3 साल पहले का वह बयान भूल गए क्या जिसमें उन्होंने कटाक्ष किया था कि "हरयाणवी कंधे से ऊपर कमजोर व् नीचे मजबूत होते हैं"? तब तो किसी मीडिया ने हल्ला नहीं मचाया था यूँ?

वैसे बता दूँ, हरयाणवी दोनों ही से मजबूत होता है| बस थोड़ा लोकतान्त्रिक ज्यादा होता है, जिसको आपने उसकी बौद्धिक कमजोरी समझ लिया है| आपकी समस्या क्या है कि आप सिर्फ बुद्धि से मजबूत हैं शरीर से नहीं, इसलिए आपको बुद्धि ही सब कुछ दिखती है| परन्तु ऐसा होता तो आरएसएस के संस्थापक गोलवलकर उनकी पुस्तक "बंच ऑफ़ थॉट्स" में यह नहीं लिखते कि, "हमें दिमाग व् शरीर दोनों की ताकत संचित करनी होगी, चाहिए होगी"| और आपको बचपन से शायद चिड़ यह लगी कि हरयाणवी मानुष गोलवलकर महाशय की इस परिभाषा पर बाई-डिफ़ॉल्ट सेट बैठते हैं| आपको अपने ही गुरु का दिया मंत्र याद नहीं रहता, आखिर क्यों? यह कौनसी कमजोरी की निशानी है, दिमागी या शारीरिक?

यहाँ बाँगरू का मजाक बागड़ी बनाते हैं और बागड़ी का खादरी व् खादरों का खड़ी बोली वाले व् खड़ी बोली वालों का ब्रज वाले व् ब्रज वालों का अहिरावती वाले और अहिरावती वालों का बाँगरू| और ख़ास बता दूँ, यह लेग-पुल्लिंग करने वाले भी सबसे ज्यादा हरयाणवी चाहे किसी भी बिरादरी के हों और सबसे ज्यादा नकल घड़ने वाले भी हरयाणवी|

यह विश्व की सबसे लोकतान्त्रिक धराओं में से एक है, यहाँ "अनाज के ढेर पर बैठा जाट, राजा को उसका हाथी के बेचे है के" कहते रहने का कल्चर रहा है| यहाँ जिसको आप-हम अल्ट्रा मॉडर्न एडवांस कॉर्पोरेट कल्चर में बैठ "सर/मैडम" की बजाये डायरेक्ट नाम से बोलने को सिविलाइज़ेशन कहते हैं, यह हरयाणवी कल्चर में सदियों से रहा है| इसलिए यहाँ "आ जाट के", "आ बाह्मण के" बोल के आपको एक चमार जाति वाला बुलाता रहा है और "आ धानक के", "आ कुम्हार के" बोल के झीमर व् जाट बुलाते रहे हैं| ग्लोबल गूगल (Google) कंपनी में जो "एम्प्लायर-एम्प्लोयी" की बजाये "वर्किंग पार्टनर" का कल्चर है वह हरयाणा में "सीरी-साझी" शब्द के नाम से सदियों-युगों से चलन में है|

तो यहाँ यह राजशाही/तानाशाही/वर्णवाद की उच्चता-नीचता ना तो ढूंढना, ना कभी एक्सपेक्ट करना और ना ही थोंपने की कोशिश करना| और यह संदेश इस मुद्दे को बेवजह इतना तूल दिए हुए मीडिया के गैर-हरयाणवी भांड अच्छे से समझ लें| इन बातों पर ऐसे-ऐसे लजवाना कांड हो जाते हैं जिनके बारे आज भी पंजाब-पटियाला में कहावत चलती है कि, "लजवाने रे तेरा नाश जाईयो, तैने बड़े पूत खपाये"| जब तक बिखरे चलते हैं चलते हैं परन्तु जब सर जोड़ते हैं तो कटटर दुश्मनी वाले दादा भूरा सिंह व् दादा निंघहिया सिंह की तरह जोड़ते हैं व् पूरी की पूरी रियासत के ग्रास का काल बन जाते हैं|

आप हमारा कल्चर सीखना नहीं चाहते, हमारी भाषा बोलना नहीं चाहते, इससे नफरत भी करते हैं तो भी हमारे लिए चलेगा| कोई भी हिंदुस्तानी नागरिक देश के किसी भी कोने में रोजगार कर सकता है रह सकता है सिर्फ इस तर्ज पर हरयाणा में अपने अस्तित्व व् रिहायश को जस्टिफाई करने वालो हमें कोई दिक्क्त नहीं आपसे, परन्तु याद रखना यही हिंदुस्तान का कानून हमें हमारे कल्चर-मान-मान्यता को बचाने-बढ़ने व् प्रचारित रखने का भी अधिकार देता है| आप हमारे मुँहों पर ऐसे पट्टी नहीं रख सकते|

और रखने का बहम भी कभी मत पालना| क्योंकि हम महाराजा सूरजमल के अंश हैं, सहते हैं जब तक सहते हैं और जब विदा करने पर आते हैं तो हम मुंबई के बाल ठाकरों व् राज ठाकरों की भांति पीटते नहीं, गुजरात वालों की तरह गाड़ियां भर के भी नहीं भेजेंगे, अपितु पानीपत की तीसरी लड़ाई वाले पेशवों की जैसे मरहमपट्टी करके धुर घर तक छुड़वाए थे ऐसे छुडवायेंगे| तब ना रो पाओगे और हंस पाओगे| हमारे कल्चर-मान-मान्यता के उपहास या इसको कुचलने व् खत्म करने के सपनों में सिर्फ ग्याभण ही हुए रह जाओगे|
इधर थोड़ा हरयाणवियों से भी अनुरोध है कि मीडिया या सरकार के हर एजेंडा में गंडासे में चढ़ते गैरे की ढाल मत चढ़ा करो| कुछ देर इनके तमाशे भी देखा करो, इनको फूं-फ़ां करके शांत होने का मौका दिया करो| उससे भी जरूरी, कोई मुद्दा कितना दूरगामी है वह आंकलन करके अपने स्टाइल में प्रतिक्रिया दी जाए तो बेहतर व् इनके शब्द अपने मुंह में रखे जाने से खुद को बचाया जाये|

जय यौद्धेय! - फूल मलिक

Sunday, May 26, 2019

अब गोळ लो, पहले नहीं गोळा तो!

जिस समाज की सामाजिक थ्योरी व् सरंचना धराशायी होनी शुरू हो जाए उस समाज को राजनीति करने से जरूरी अपनी इस सरंचना को दुरुस्त करना चाहिए| अख़बारों में देख ही रहे होंगे कि जाटलैंड पर फलानों का कब्जा, धकड़ों का कब्जा? पहले तो इनको कोई यह समझा दे कि जाट ने यूँ ही कब्जे करके सिर्फ अपने को ही ऊपर रखना होता तो अल्लाउद्दीन खिलजी के बाद सन 1300 से 1550 तक जब अधिकतर गामों के "दादा नगर खेड़े" बसाये तो जाट उसी जमाने से किसी अन्य को बसने नहीं देते और ना यह एरिया हिंदुस्तान का सबसे धनाढ्य व् हराभरा बन पाता|

कोई एक ऐसा गाम नहीं, जो जाट बाहुल्य हो व् उसमें बसने वाली अन्य जाति यह कह दे कि हम जाटों से पहले इस गाम में बसे| सब जाटों के पीछे-पीछे आये, जाट ने पहले गाम के "दादा नगर खेड़े" बांधे फिर अन्य कामगार-कास्तकार-मजदूर-व्यापारी वर्ग/जातियां आते गए और बसते गए| यह बसासती विरासत है मीडिया की परिभाषा में "जाटलैंड" कही जाने वाली इस धरती की| नवयुवा पीढ़ी के बालको भूलना मत इस बात को|

"बार्टर-सिस्टम", "सीरी-साझी वर्किंग कल्चर", "उदारवादी जमींदारी सभ्यता", "विधवा विवाह", "देहल-धाणी की औलाद माँ का गौत रखे", "शादी से पहले बाप के घर, शादी के बाद पति के यहाँ आजीवन सम्पत्ति अधिकार (पति पहले मर जाए तो भी, उसको पति की प्रॉपर्टी से बेदखल कर अन्यों की भांति विधवा आश्रमों में नहीं बैठाते जाट)" के विधानों के जनक हैं जाट| "धर्मस्थलों-पूजा में औरत को 100% लीडरशिप", "धर्मस्थलों में मर्दवाद वर्जित" रखने वाले हैं जाट| आज भी जाट को "दादा नगर खेड़ों पर धोक-पूजा इसके घर की औरतें लगवाती हैं, जबकि अन्य स्थलों पर मर्द खड़े होते हैं वह भी यह डंडा ले कर कि औरत कब इन धर्मस्थलों में घुसेगी और कब नहीं, यह उनके मर्द निर्धारित करेंगे| दुनिया की सबसे बड़ी व् पुरानी इंजीनियरिंग थ्योरी के जनक हैं जाट| कम्युनिटी गेदरिंग का इकलौता सिस्टम "परस-चौपाल-चुप्याड" जो सिर्फ जाटलैंड में पाई जाती हैं, पूरे इंडिया में, इस वर्ल्ड थ्योरी के भी जनक हैं जाट| अन्यथा जाटलैंड के बाहर पेड़ों के नीचे होती हैं कम्युनिटी सभाएं, जबकि जाटों के यहाँ इस फोर्ट्रेसनुमा हालों में| सबसे प्राचीन सोसाइटी मैनेजमेंट सिस्टम "बगड़" (जिसको मॉडर्न भाषा में RWA बोलते हैं) के जनक हैं जाट|

जाटों में जाटलैंड वाला गुरुर होता तो आज भी जाटलैंड, बिहार-बंगाल की भांति उजड़ी स्टेट होता वह भी बावजूद जाटलैंड की अपेक्षा बिहार-बंगाल की तरफ ज्यादा नदियां व् ज्यादा उपजाऊ जमीनें होने के| और जाटलैंड वाले बिहार-बंगाल जा रहे होते मजदूरी-दिहाड़ी-रोजगार करने ना कि वहाँ वाले यहाँ आ रहे होते|
तो सबसे पहले तो जाट इस मिथ्या प्रचार की अब कम-से-कम आलोचना करे जिसको पढ़-सुन-देख के यह फीलिंग आती है कि जैसे जाट तो यहाँ लठ के दम मात्र पर बसे हों व् इनके पास ना तो कभी कोई सोशल विज़न था, ना सोशल इंजीनियरिंग और ना जेंडर सेंसिटिविटी| इन चीजों को जिसको कि शायद आजतक जाट यह बोल के साइड करता आया है कि "के बिगड़े सै भोंकें जाएंगे"," कूण गोळे सै लिखे जांगे"; अब वक्त आ गया है कि इनकी आलोचना की जाए| वरना शर्म-शर्म में और "काका कहें काकड़ी नहीं मिला करती" वाली सूखी तर्ज की लय पर "भाईचारा-भाईचारा" चिल्लाते रहे तो ऐसे लिखने-बोलने-प्रचार करने वाले लोग तुम्हारे हारे की राख भी साहमर ले ज्यांगे|

यह वह लोग नहीं जिनके आगे तुम शर्म दिखाओ या चुप्पी साधो, तुम्हारी इस शर्म व् चुप्पी को ऐसे लोग "अगला शर्मांदा भीतर बड़ गया और बेशर्म जाने मेरे से डर गया" वाली लय पर अपनी जीत मानते हैं| और गंभीर समस्या यह है कि गाम तो गाम, शहरी व् एनआरआई जाट तक इन मुद्दों पर दड़ मारे चल रहा है| दड़ तोड़िये और हुई-हुई जायज बात पर तो कम से कम बोलिये, वर्ना क्या तो अपने बच्चों को दोगे कल्चरल विरासत के नाम पर और क्या ऊपर पुरखों को मुंह दिखाओगे?

मेरी विनती आरएसएस में बैठे जाटों से भी रहेगी कि वहां अपने सलूक-समीकरण-व्यवहार-संबंध का इस्तेमाल करें व् उनके जरिये मीडिया में बैठे अपने प्रभावशाली मित्रों से अनुरोध करवाएं कि जाट, जाटलैंड, जाट बनाम नॉन-जाट की यह बेवजह की छींटाकसी बंद करे मीडिया व् ऐसी मति के गैर-मीडिया लोग| आखिर हो तो आप भी उसी हिन्दू वर्ग का हिस्सा जिसके लिए आरएसएस दिनरात काम करने का दम भरती है? किसी भी सामाजिक-राजनैतिक संगठन में रह लो, अपनी जातीय पहचान से खुद को छुपा या बचा लोगे क्या? अंत दिन जाने तो जाट होने के नाम से ही जाओगे, चाहे बेशक आरएसएस में रहो या कहीं किसी अन्य संगठन में? और हर चीज राजनीति के लिए नहीं हुआ करती, कुछ समाज के लिए भी करना होता है|

मेरे से नहीं होगी राजनीती कभी ऐसे बिगड़े सामाजिक हालातों में, मैं तो इन बिगड़े हालातों को ही कुछ या पूरा ठीक कर जाऊं तो अगली पीढ़ियों में नामलेवा होऊं व् पुरखों को शक्ल दिखा सकूं| जाने कैसे हो चले हैं लोग जिनको ना आने वाली पीढ़ियों के प्रति अपनी जवादेही की चिंता ना पुरखों को मुंह दिखाने की फ़िक्र|

जय यौद्धेय! - फूल मलिक

Monday, May 6, 2019

बॉलीवुडिये गुंडे!

मोदी बाबू, जिन शौर्यपूर्ण हालातों में पूर्व पीएम राजीव गाँधी की शहादत हुई थी, आप तो उसका रिहर्शल यानि मॉक-ड्रिल भी करोगे तो पायजामा गीला कर बैठोगे! इतना तो छोडो आप राजीव गाँधी की तरह बिना सिक्योरिटी के दो ढंग ही पाड़ के दिखा दो अगर वास्तव में इतने लोकप्रिय हो तो? बताता चलूँ कि राजीव गाँधी ने बिना सिक्योरिटी के चलने का यह जज्बा ताऊ देवीलाल की शैली से प्रभावित होकर अख्तियार किया था| परन्तु ताऊ देवीलाल जी की हस्ती के बराबर जा बैठने की ललक में अपनी सिक्योरिटी हटवा बैठे और मानवबॉम्ब का शिकार हुए!

बाकी मोदी बाबू का इतना गिरा हुआ स्तर देखकर मुझे आज उस सवाल का जवाब मिल गया जो बॉलिवुड के विलेन्स को देखकर बचपन से जेहन में उठता था, कि आखिर यह ऐसे विलेन और ऐसे गुंडे वास्तव में होते कहाँ हैं| मुझे क्या पता था कि 1950 से यह बॉलिवुड वालों की कल्पना वाला गुंडा कच्छाधारी समाज तोड़ प्रयोगशाला में यूँ तैयार हो रहा था|

बाकी, जहाँ तक इसको या इस जैसों को ट्योटणे की बात है तो मेरे बचपन वाला हरयाणा अगर आज भी होगा तो उल्टे पैर लौटा देगा इनको|

बचपन वाला कैसे?: हुआ यूँ कि मेरे गाम का एक बणिया भैंस-व्यापारी बन गया| गाम के जाट-जमींदारों के रसूख की साख पर गाम-गुहांड की 30 के करीब भैंसे बिसाह ली, वह भी उधारी पर| दो भैंस म्हारी भी ले गया| बात 1990 के आसपास की हैं, उस वक्त दो भैंस के 24 हजार ठहरे थे, आज की कीमत में कम-से-कम 2.4 लाख| 30 भैसों का पैसा घुप्प करके गाम की उनकी दोनों हवेलियां छोड़ परिवार समेत पुणे जा बसा|

मेरे पापा पांच-छह बार गए परन्तु हर बार मन कर देता| एक बार तो पापा को पुणे से निडाना बीच रस्ते मरवाने तक की धमकी दे दी यह कहते हुए कि "अगर दोबारा आया तो ऐसा कर दूंगा"| हमारा परिवार नरमी खानिया परन्तु सारे थोड़े ही| एक और जाट जिसकी 4 भैंसे ले गया था, करीब 10 साल पैसे मिलने के इंतज़ार के बाद उन्होंने बणिये की एक हवेली पर कब्ज़ा कर लिया| पुणे में बनिये को पता लगा तो लेकर 4 मुम्बईया गुंडे आ गया हवेली खाली करवाने|

अमूमन हरयाणवी कल्चर ऐसा है कि ऐसी हालत में बणिया निर्दोष होता तो उसका साथ देता परन्तु किसी ने साथ नहीं दिया| वजह ऊपर वाले पहरों से आसानी से समझ सकते हो| जब गाम के युवकों को पता चली कि बणिया आया है वह भी मुंबईकर गुंडे लेकर तो सबने लठ और गंडास धर लिए निकाल के| ये जाटों के छोरे, जिनका खून इतना गाढ़ा कि खून दान देने जावें तो डॉक्टर की खून निकालने की सुई में ही न चढ़े, वजह अजी इसका तो खून गाढ़ा ही बहुत ज्यादा है| मेरे अंकल हैं गाम में, उनका तो आज भी इतना गाढ़ा है किसी डॉक्टर की सुई में चढ़ता ही नहीं|

तो जैसे ही बणिये के गुंडों ने कब्जा करने वाले परिवार पर हमला बोला, बालकों ने धरे चारों आगे ले के| छातों-छात चढ़ा दिए| एक गुंडा तो जान बचाता, छतों कूदता 20 घर दूर म्हारे घर की छात पर आ लिया| म्हारा घर तीन-मंजिला, आगे दो तरफ सदर गली, पीछे डॉक्टर की सुई में भी खून ना चढ़े इतने गाढ़े खून के उबाल में उसकी मौत बनके नाचता आ रहा म्हारा काका| गुंडा तो जान बचाने का मारा तीसरी मंजिल से सीधा गली में छलांग लगा गया| बेचारे की टांग टूट गई| बालकों ने चारों गुंडे और बणिया धर बंदी बनाये|

खैर, पंचायत हुई, बणिये को डांट लगी कि 30 तो भैंस ले कर भाज रह्या तू गाम-गुहांड की, 10 साल हो लिए एक की पाई ना लौटाई और ऊपर से यह गुंडे; दिखै पुणे में बॉलीवुड की घनी फ़िल्में देखण लाग गया? फिर भी पंचायत ने अपनी न्यायप्रियता दिखाते हुए कहा कि या तो 30 भैंस दे दे जिस-जिसकी ली हुई हैं या भैंसों की जो कीमत ठहरी थी उसका मूल ही दे दे, ब्याज नहीं भी देगा तो भी तेरी हवेली की सुरक्षा की गारंटी पंचायत की| 

बणिये ने वक्त माँगा, परन्तु मुड़ के फिर ना निडाना आया कभी|

अब उसी टाइप के गुंडे यह हैं, देखें हरयाणा वाले कितना झेलेंगे इनको|

जय यौद्धेय! - फूल मलिक