Friday, January 4, 2019

मदवि की कल की घटना से छात्रराजनीति को गलत ठहराने वाले, कृपया एक मिनट विचारें!

छात्रसंघ चुनाव पूरे विश्व का अटल सत्य हैं, एक मदवि की कल की अप्रिय घटना से इनका औचित्य मत आंकिये| आंकना है तो यह आंकिये कि हरयाणा में छात्रसंघ चुनाव का फॉर्मेट कितना गलत कितना सही| आंकना है तो यह आंकिये कि छात्रसंघ चुनाव जबसे बंद हुए, हरयाणा के ग्रामीण परिवेश व् कल्चर से लगाव रखने वाले कितने नेता बने, शायद एक भी ढंग का गिना सको| हमारे जमाने में जितेंद्र पहल होते थे, जगदीश खटकड़ होते थे जींद की छात्र-राजनीति के सितारे| उस वक्त के मुख्यमंत्री भजनलाल कांपते थे उनसे कोई भी उल्ट निर्णय या अप्रिय निर्णय लेने से| नरवाना के कृष्ण श्योकंद, अजय चौटाला आदि की गाड़ियां बीच हाईवे रुकवाने की ताकत रखते थे| कुल मिलाकर छात्रराजनीति तो होनी ही चाहिए| फ्रांस-अमेरिका-दिल्ली यूनिवर्सिटी कहाँ नहीं है छात्रराजनीति, जो हरयाणा में होने को बुरा बता रहे?

हरयाणा की ग्रामीण राजनीति का इतना बुरा हश्र क्यों हुआ पिछले एक-डेड दशक में? इसकी वजहें आंकेंगे तो छात्रसंघ चुनाव बंद होना उसकी मुख्य वजहों में से एक पाएंगे| झगड़े-फसाद किस सिस्टम का हिस्सा नहीं हैं? एक वक्त जींद में जगदीश खटकड़ की बाँधी बंधती थी, खुली खुलती थी| जींद की राजनीति के शहरी अड्डे तो थर-थर कांपते थे उससे| परन्तु उसको मारा जीतेन्द्र पहल ने (मैं उस वक्त तीसरी क्लास में होता था, मौत की खबर सुनते ही स्कूल की आधी छुट्टी हो गई थी)| उसके बाद यह नहीं हुआ कि नेतागिरी बंद हो गई| जीतेन्द्र पहल के रूप में ऐसा छात्र नेता उभरा कि भजनलाल मुख्यमंत्री तक की कुर्सी हिलती थी उसके भय से| सोचिये सीएम लेवल तक के राज जानता था वह बंदा, आज कितने युवा हैं जो सीएम तो छोड़िये एमएलए-एमपी या पार्षद स्तर तक के राज जानते हो युवा? यह छात्रराजनीति की ही जागरूकता थी कि जितेंद्र पहल को भजलनलाल तक के ऐसे राज पता थे| और इसी वजह से भजनलाल को षड्यंत्र रचवा कर जेल में मारना पड़ा था पहल को| फिर भी न्यूनतम एक दशक तक राज किया पहल ने जींद की छात्र राजनीती में|

पहल के बाद कृष्ण श्योकंद का उभार हुआ था| इनकी ताकत और रुतबा यह था कि चंडीगढ़ जाते हुए अजय चौटाला की कार को सिरसा-चंडीगढ़ हाईवे पर जहाँ रुकने की बोलते थे अजय को रुकना पड़ता था| परन्तु वह अपना पूरा उभार ले पाते उससे पहले ही 1996 में हरयाणा में छात्रसंघ के चुनाव ही बंद हो गए| बांगर की राजनीति के दबंग नेता जयप्रकाश (जेपी) इसी राजनीति की देन हैं|

इसलिए छात्रसंघ चुनाव के आपसी गुटबाजी वाले नुकसान हैं तो ग्रामीण कल्चर के रुतबे और रुवाब को कायम रखने के अपने फायदे भी हैं| वरना आज देख लो क्या हालत हो रखी है, बड़े-बड़े तुर्रमखां भी टुच्चे नेताओं के आगे-पीछे टूरते है|

यही हालत पानीपत-कुरुक्षेत्र साइड होती थी| छात्र राजनीति इतनी बढ़िया चलती थी कि क्या कहने| नरवाना वालों की विंग का ख़ास प्रभाव होता था कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी में| "जींद कंट्री" (Jind Country) वाले बोला जाता था, नरवाना-जींद वालों को वहां|

भगवान करे कि प्रदीप देशवाल जल्द से जल्द स्वस्थ हो करआवें| रोहतक में छात्रराजनीति की यह पहली वारदात नहीं हुई है| नब्बे के दशक में होते थे एक से एक अलाही| ऐसे अलाही जो बीच चौराहे भजनलाल की धोती खोल लिया करते थे और भजनलाल तब भी चूं नहीं कर पाते थे| आज कोई नेताओं की धोती खोलना तो दूर उनकी तहमद तक हाथ ही पहुंचा के दिखा दो|

और इतने भावुक होने से क्या काम चलता है? क्या विधानसभा-लोकसभा चुनावों में जिस तरह के दांवपेंच, सरफुडाई, कुटाई, लड़ाई, दंगे-फसाद होते हैं उनसे भी बुरे हैं छात्रचुनाव? नहीं, कदापि नहीं| अपितु छात्रचुनाव का अनुभव रहता है तो बड़ी राजनीति और अच्छे से समझ आती है, उसके लिए ट्रेनिंग हो जाती है| वरना बिना छात्रराजनीति के अनुभव के तो भगत बनाने वाली फैक्ट्रियों द्वारा आपके बच्चे लपक लिए जाते रहेंगे और कभी ट्रेंड कबूतरों से ज्यादा कुछ नहीं बन पाएंगे| कभी अपना स्वछंद रवैया, रुतबा कायम नहीं कर पाएंगे| ऐसे ही फिरेंगे भगत बने फलाने-धकड़ों की बिना सोची जय बोलते| वैसे भी छात्रराजनीति में वही भाग लेते हैं जिनका पॉलिटिक्स में इंटरेस्ट होता है, जिनको डॉक्टर-इंजीनियर-सीए वगैरह बनना होता है; वह छात्रराजनीति होने पर भी चुपचाप पढाई करते हैं|

इसलिए अगर हमें "ट्रेंड-कबूतर" टाइप की बजाये "स्वछंद रवैये-रुवाब" वाले भविष्य के नेता चाहियें तो छात्रराजनीति जरूरी है |

जय यौद्धेय! - फूल मलिक

Thursday, January 3, 2019

किस्सा हीर-राँझा!

देर रात काम करते-करते, यह रागणी याद हो आई!
बाबा जी तेरी श्यान पै बेहमाता चाळा करगी,
कलम-तोड़गी लिख दई पूँजी, रात दीवाळा करगी!
दिखे तेरे जैसे माणस नैं चाहियें थे हाथी-घोड़े,
तेरे ऊपर वार कें फेंकू, समझ कें मोती रोड़े!
रूप दिया तै भाग दिया ना, कर्म डाण नैं फोड़े,
बाबा जी तेरी शान देख कें, हाथ दूर तैं जोड़े!!
चाहियें थे सोने के तोडे, काठ की माळा करगी!
कलम-तोड़गी लिख दई पूँजी, रात दीवाळा करगी!
तेरे के से माणस के हों, पलटण-फ़ौज-रिसाले,
सुथरी बहु परोसे भोजन, भूख लागते ही खा ले!
अर्थ-मझोली, टमटम-बग्गी, जिब चाहे जुड़वा ले,
मेवा और मिष्ठान मिठाई, मोहन-भोग मसाले!!
चाहियें थे तैने शाल-दुःशाले, वा कंबळ काळा करगी,
कलम-तोड़गी लिख दई पूँजी, रात दीवाळा करगी!
दिखे लोहे की रित लगे बराबर, तू सोना अठमासी का,
किले-उजले घर चाहियें थे, बालम सोलह राशि का!
म्हारे के सी रह सेवा म्ह, रूप बना दासी का,
तेरे रूप की चमक इशी जाणु चाँद खिला परणवासी का!!
लख-चौरासी जीवजंतु, सहम रूखाळा करगी,
कलम-तोड़गी लिख दई पूँजी, रात दीवाळा करगी!
दिखे मांगेराम चाल पड्या घर तैं, लत्ते-चाळ ठान कें,
दुखी इसी मेरे जी म्ह आवै, मर ज्यां लिपट नाड कै!
और घनी दूर तैं देख लिया मैंने, अपनी नजर तार कें,
सारी दुनिया तोल लई सै, पक्के बाट हाड़ कैं!!
दिखे जिसने जाम्या पेट फाड़ कें, क्यों ना टाळा करगी,
कलम-तोड़गी लिख दई पूँजी, रात दीवाळा करगी!
बाबा जी तेरी श्यान पै बेहमाता चाळा करगी,
कलम-तोड़गी लिख दई पूँजी, रात दीवाळा करगी!
फूल मलिक

जब उदारवादी जमींदार को जानवरों पर बोलना होता है तो वह बोलता है, सिवाए इंसानी जानवरों के!

सबसे पहले: जमींदार दो तरह के होते हैं:

1) सामंतवादी जमींदार: इनकी पहचान "नौकर-मालिक वर्किंग कल्चर", "बंधुवा मजदूरी को बुरा नहीं मानते", "वर्णवादी व् जातिवादी ताकतों के सबसे बड़े पोषक होते हैं", "खेतों में खुद काम ना करके मजदूरों से करवाते हैं", "दलित-शूद्र का छुआ नहीं खाते-पीते, उसको पास बैठने नहीं देते", "गरीब-अमीर का अंतर् अव्वल दर्जे का होता है", "महिला क्या किसको कैसे कब पूजेगी इसका अधिकार मर्द समाज रखता है", "सोशल-मिल्ट्री-कल्चर नहीं होता", "सभाएं-पंचायतें पेड़ों के नीचे लगती हैं", "औलाद का गौत बाप का ही गौत होता है", "सोशल जस्टिस के नाम पर "जिसकी लाठी, उसकी भैंस" की रीत चलती है| बिहार-बंगाल-पूर्वांचल-झारखंड-उड़ीसा में सबसे ज्यादा यही जमींदारी पाई जाती है|

2) उदारवादी जमींदार: इनकी पहचान "सीरी-साझी वर्किंग कल्चर", "बंधुवा मजदूरी को बुरा मानते हैं", "वर्णवादी व् जातिवादी ताकतों से बचते हैं और विरोध करना पड़े तो वह भी करते हैं", "खेतों में मजदूर के साथ खुद भी काम करते हैं", "दलित-शूद्र, छुआछूत, ऊँचनीच लगभग ना के बराबर होता है", "गरीब-अमीर का अंतर् सबसे कम होता है अपेक्षाकृत बाकी के भारत के", "पूजा अर्चना का 100% अधिकार औरत के सुपुर्द होता है "दादा नगर खेड़ों के जरिये", "औलाद का गौत माँ का गौत भी हो सकता है", "सोशल मिल्ट्री कल्चर होता है", "सभाएं-पचायतें मिनी-फोर्ट्रेस टाइप की परस-चौपालों में होती आई हैं", "सोशल जस्टिस में दोनों पक्षों के झगड़े सुलझाने के बाद, उनके बीच भाईचारे को पुनर्स्थापित करना अहम् रहता है और ९९% होता भी है"| हरयाणा-वेस्ट यूपी-दिल्ली-पंजाब-उत्तरी राजस्थान में सबसे ज्यादा यही जमींदारी पाई जाती है|

लेख के शीर्षकानुसार बात उदारवादी जमींदारी की करेंगे| यह जमींदार फसल को औलाद की तरह पालते हैं (सामंती पलवाते हैं), फसल की आवारा जानवरों से रक्षा बड़े अच्छे से करते हैं| परन्तु जब यही फसल कट के इसको कैश करने की बात आती है तो इंसानी जानवरों के आगे धराशायी हो जाते हैं| यही बात उसकी औलाद रुपी फसल के बारे रहती है| शहरों में निकली उसकी औलादें, उसके कल्चर को, उसके आध्यात्म को, उसके सोशल इंजीनियरिंग को क्यों कायम नहीं रख पाते? 90% तो खुद को जमींदार की औलाद या जमींदार का वंश कहने तक से कतराते देखे हैं| औरों में तो धर्मों-जातियों-वर्णों को लेकर घृणा देखी जाती है, मगर यह तो बिलकुल इसी तरह की छोटा-बड़ा, ऊंच-नीच समझने की घृणा गाम में पीछे अपने ही पिछोके वालों से करते देखे हैं|

कमी कहाँ है? आखिर ऐसा क्यों होता है?

हरयाणा के बड़े शहरों का उदाहरण लेते हैं| चंडीगढ़-गुड़गामा-रोहतक-हिसार-पानीपत-पंचकूला-करनाल-सोनीपत| इन शहरों में देश के अलग-अलग कोनों से आ के बसे हुए लोग भी हैं| परन्तु पडोसी राज्यों या सुदूर देश के सैंकड़ों-हजारों किलोमीटर के कोनों से आये क्षेत्रों के यह लोग, जिस स्वछंदता व् सिद्द्त से अपने कल्चर-भाषा-पहनावा-रहन-सहन-खान-पान इत्यादि को साथ लिए रहते हैं, यही उदारवादी जमींदारी परिवेश से अपने गाम से मात्र १०-२०-५० किलोमीटर अपनी होम-स्टेट ही के शहरों में आन बसे लोग क्यों नहीं रख पाते? वजहें क्या इसकी?

ऊपर जो उदारवादी जमींदारी के चरित्र-पहचान बारे बिंदु बताये, ऐसे बिंदु सिर्फ यूरोप-अमेरिका आदि के डेवलप्ड देशों में मिलते हैं| फिर भी इनको अंगीकार करने को तैयार नहीं?

कुछ एक साल पहले की बात है, मेरी सगी बुआ का लड़का, एक मेरे गाम का मेरे बचपन का मित्र, पेरिस के "इंडिया हाउस" हॉस्टल में इकठ्ठे हुए| मैंने आदतवश रागणी लगा दी और साथ की साथ वह फेसबुक पर भी अपडेट कर दी| इतने भर पे मुझे नसीहत दे डाली गई कि तुम यहाँ आकर भी इनमें डूबे हुए हो, तुम्हारा कुछ नहीं हो पायेगा| हालाँकि उनको पता था कि वह किसको और किस बात पर नसीहत देने की गलती कर बैठे| इसलिए मेरे बोलने से पहले ही एक्सक्यूज़ लेने की कोशिश करने लगे| परन्तु मुझे खिन्न ने घेर लिया था| इसलिए छोटा सा जवाब दिया|

झन्नाते हुए से सर के साथ बालकनी से बाहर देखने लगा| नीचे सड़क पर जाते हुए एक सरदार जी दिखे| मैंने उसकी तरफ इशारा करके कहा कि क्या उन सरदार जी को जा के यही बात कहने की हिम्मत रखते हो कि, "पेरिस में आ के भी तुम पगड़ी बांधे फिरते हो, तुम्हारा कुछ नहीं हो पायेगा"? और शायद पंजाबी भंगड़े-गाने भी मेरे से तो कुछ ज्यादा ही शेयर किये होंगे सोशल मीडिया पर सरदार जी ने? "इंडिया हाउस" हॉस्टल में थोड़ी देर पहले मिले "शिमला-टोपी" पहने एक हिमाचली की याद दिलवाई और पूछा कि क्या तुम उसको कह सकते हो कि, "पेरिस में आ के भी शिमला-टोपी लगाए फिरते हो, तुम्हारा कुछ नहीं हो सकता"? दोनों मेरे को ऐसे देख रहे जैसे किसी ने पुचकार दिया हो|

फिर मैंने उनसे दूसरा सादा सवाल किया| यह बताओ यहाँ हम सिर्फ तीन हैं? तीनों हरयाणवी? तीनों एक जाति के भी हैं| गाम-खून-वंश में भी तीनों काफी नजदीकी हैं| फिर भी हम हमारी ही कल्चर की रीढ़ रागणी सुनने-शेयर करने पर सिर्फ इसलिए एकमत नहीं हैं कि हम पेरिस में बैठे हैं?

मैं उस सारी रात, इसकी वजह ढूंढता रहा|

मैंने आज तक यूरोपियन-अमेरिकन और हिंदुस्तानी उदारवादी जमींदारों की लाइफ व् कल्चरल फिलोसोफी में दसियों ऐसे समानताएं देश के सुप्रीम कोर्ट से लेकर लंदन की सभाओं और रिसर्च पेपर प्रेसेंटेशन्स में बताई और बढ़ाई हैं|

परन्तु आजतक इस पहेली का ऐसा माकूल हल नहीं निकाल पाया हूँ जिसके सहारे उदारवादी जमींदारों की शहरी व् ग्रामीण औलादों-वंशों को यह समझा सकूं कि पैसा कमाना, लाइफ स्टैण्डर्ड बेहतर करना, पावर कमाने का मतलब अपनी कल्चरल पहचान छुपाना, उससे दूरी बनाना तो कम-से-कम नहीं ही होता|

मैंने पेप्सी को की सीईओ इंदिरा नूई को अमेरिका में पब्लिक कांफ्रेंस में बैठ के खुद को "प्राउड साउथ इंडियन ब्राह्मण" कहते सुना-देखा है, यूट्यूब पर आज भी वह वीडियो पड़ी है; सर्च करके देख सकते हो|

तो फिर क्या-कैसी तो यह कमियां हैं और क्या-कैसे इसके हल होवें; ताकि उदारवादी जमींदारों के बीच की यह कमी समझी जा सके| कहीं ऐसा करते वक्त जेनेटिक उदारवाद हद से ज्यादा हावी होने वाली समस्या तो नहीं है; कि जिसके चलते दूसरे को कम्फर्टेबल स्पेस देने का गुण हावी हो जाता हो? अगर यही वजह है तो फिर इस पर तो यही कहूंगा कि "ना इतने मीठे बनो कि दुनिया निगल ले, और ना इतने कड़वे कि दुनिया उगल दे" वाली इस कहावत वाला मीठा कुछ ज्यादा ही हो रहा है|

और इसकी बलि एक ऐसा कल्चर चढ़ रहा है जो हिंदुस्तानी परिपेक्ष्यों में दूसरों की तुलना में सबसे अधिक लिबरल है, गणतांत्रिक है, लोकतान्त्रिक है और धर्म-आध्यात्म के मामले में तो इकलौती ऐसी थ्योरी जो पूजा के "दादा नगर खेड़ों" धामों में पूजा-विधान करने का पूरा अधिकार ही औरत को देकर रखता है| वह भी एक ऐसे देश में जिसकी तथाकथित सबसे पढ़ी-लिखी स्टेट में सबरीमला जैसा मंदिर औरतों के मंदिर प्रवेश अधिकार पर मर्दों से लड़ रहा है|

जरा सोचिये-विचारिये| ऊपर बताये अति-उदारवाद के साथ-साथ और कौनसे कारण हैं कि हम अपनी कल्चर-भाषा की पहचान को अन्य भारतियों की अपेक्षा कम विश्वास कैरी करते हैं?

हालाँकि मैं इसमें अपवाद हूँ और मुझे जो भी मिला और इस पहलु पर समझ पाया, वह या तो पहले से ही अपवाद था या हमारी संगत ने उसको अपवाद बना दिया| कुछ साथियों ने मिलके धरातल पर अभियान भी चलाया हुआ है परन्तु अपवाद हमारी मंजिल नहीं, जब तक कि इस अपवाद को संवाद ना बना दें|

आखिर कुछ तो है इस हरयाणे की हरयाणत उदारवादी जमींदारी में जो चेन्नई-मुंबई-गुजरात के पिटे हुए उत्तरी-पूर्वी भारतीय भी इस धरा को सेफ-हेवन मानते हैं और इधर रोजगार करने चले आते हैं| और तो और 1984 में जब पंजाब में आतंकवाद छिड़ा तो वहां के उजड़े भी यहीं बसे, कश्मीरी पंडित यहीं बसे| इतने गुण परन्तु फिर भी हम खुद को अपनों के बीच भी अपने कल्चर-आध्यात्म को लेकर सहज नहीं?

सबको सेफ-हेवन भी उदारवादी जमींदारी वाले हरयाणवियों का हरयाणा लगता है और नेशनल मीडिया के अनुसार देखो तो इससे खूंखार लोग और स्टेट भी कहीं की ना बताई? क्या यह बात इससे सुधर ना जाएगी, जिस दिन ऊपर बताई उदारवादी जमींदारी वाली परिभाषा हर सभा, हर मंच से गई सुनाई और गाई?

इंसानी जानवरों से रक्षा की बात अभी पूरी नहीं हुई है| कोई नी पहले इस लेख में उठाई बातों के कारण खोज लेवें, जानवरों से रक्षा वाले पहलु अगले लेख में लाऊंगा|

जय यौद्धेय! - फूल मलिक

Saturday, October 13, 2018

हरयाणवी सांझी, दशहरे, दुर्गा पूजा व् नवरात्रों (गरबों) में अंतर बताता मेरा तीन साल पुराना लेख!


Happy upcoming Sanjhi visarajn in advance!

दशहरे व् नवरात्रों के बारे तो मूलत: आप सभी जानते ही होंगे| आइए आपको बिलकुल सेम तारीखों में मनाये जाने वाले हरयाणा-हरयाणवियों के ठेठ त्यौहार "सांझी" बारे बताते हैं|

सांझी सिर्फ एक त्यौहार ही नहीं अपितु "खाप सोशल इकनोमिक साइकिल" का एक नायाब सिंबल भी रहा है|

मूल हरयाणवी परम्पराओं और समाज में हर त्यौहार को मनाने के आर्थिक इकॉनमी को चालू रखने के कारण प्रमुखता से होते आये हैं| उदारवादी जमींदारी सभ्यता से बाहुल्य इस समाज में हर त्यौहार या तो आर्थिक लाभ-हानि, लेन-देन से जुड़ा होता आया है या फसल चक्र से या फिर सामाजिक व् वास्तविक मान-मान्यता त्योहारों के जरिये सीखने-सिखाने के तरीकों से जुड़ा होता आया है| काल्पनिक कहानियों के आधार पर घड़े हुए त्योहारों से हरयाणा मुक्त ही रहा है|

अभी पड़ोसी राज्यों के शरणार्थी और विस्थापित भाई-बहनों के हमारे यहां पलायन के चलते और खुद हम कट्टर प्रवृति के ना होते हुए इन त्योहारों को मनाने लगे| परन्तु हमें अपने मूल त्यौहार भी कभी नहीं भूलने चाहियें|

जैसे कि हमारे यहां गुजरात के गरबों (नवरात्रों) व् सांझी विसर्जन के साथ-साथ सांझी विसर्जन की दशमीं की रात तमाम पुराने मिटटी के बने पानी रखने के लिए प्रयोग होने वाले बर्तन गलियों में फेंक के फोड़े जाया करते थे, जैसे मटका, माट आदि| और इसका कुम्हार की इकॉनमी से जुड़ा कारण हुआ करता| साल में एक बार यह पुराने हो चुके बर्तन फोड़ते आये हैं हम| क्योंकि इसी वक्त कुम्हार के चाक से बने नए बर्तन पक के तैयार हो जाया करते और उसकी बिक्री हो इसलिए हर घर पुराने बर्तन तोड़ दिया करता था|

हालाँकि सारे बर्तन नहीं तोड़े जाया करते, परन्तु कुम्हार को उसकी इकॉनमी चलाने हेतु सिंबॉलिक परम्परा बनी रहे, इसलिए हर घर कुछ बर्तन या जो वाकई में जर्जर हो चुके होते, उनको जरूर फोड़ा करता| और कुम्हार को उसके बिज़नेस की आस्वस्तता जरूर झलकाया करता|

खुद मैंने बचपन में मेरी बुआओं के साथ घर के पुराने मटके गलियों में फोड़ते देखा भी है और फोड़े भी हैं| इसको "जाटू सोशल इकनोमिक साइकिल" भी कहा करते हैं| मुझे विश्वास है कि जो चालीस-पचास की उम्र के हरयाणवी फ्रेंड मेरी लिस्ट में हैं वो मेरी इस बात से सहमत भी करेंगे|

ठीक इसी प्रकार हमारे यहां खेतों में गन्ना पकने के वक्त पहला गन्ना तोड़ के लाने पे दिए जलाये जाते थे, परन्तु इसको अवध-अयोध्या से इम्पोर्टेड दिवाली के साथ रिप्लेस करवा दिया गया|

बसंत-पंचमी तो सब जानते हैं कि सरसों पे पीले फूल आने की ख़ुशी में मनता आया है|

बैशाखी गेहूं की फसल पकने की ख़ुशी में मनती आई है|

आइये अब ठेठ-हरयाणवी भाषा में जानते हैं कि कैसे सांझी का त्यौहार इकनोमिक साइकिल के साथ-साथ कल्चरल लर्निंग्स भी देता है:

सांझी का पर्व: सांझी सै हरयाणे के आस्सुज माह का सबतैं बड्डा दस द्य्नां ताहीं मनाण जाण आळा त्युहार, जो अक ठीक न्यूं-ए मनाया जा सै ज्युकर बंगाल म्ह दुर्गा पूज्जा, या गुजरात म्ह गरबा अर अवध म्ह दशहरा दस द्यना तान्हीं मनाया जांदा रह्या सै|

हरयाणवी कल्चर में पराणे जमान्ने तें ब्याह के आठ द्य्न पाछै भाई बेबे नैं लेण जाया करदा अर दो द्य्न बेबे कै रुक-कें फेर बेबे नैं ले घर आ ज्याया करदा। इस ढाळ यू दसमें द्य्न बेबे सुसराड़ तैं पीहर आ ज्याया करदी। इसे सोण नैं मनावण ताहीं आस्सुज की मोस तैं ले अर दशमी ताहीं यू उल्लास-उत्साह-स्नेह का त्युहार मनाया जाया करदा। अर इस्ते नई पीढ़ी के बालकों ताहिं इस कस्टम की बारीकी खेल-खेल में सीखा दी जाया करती|

आस्सुज की मोस तें-ए क्यूँ शरू हो सै सांझी का त्युहार: वो न्यूं अक इस द्य्न तैं ब्याह-वाण्या के बेड़े खुल ज्यां सें अर ब्याह-वाण्या मौसम फेर तैं शरू हो ज्या सै। इस ब्याह-वाण्या के मौसम के स्वागत ताहीं यू सांझी का दस द्य्न त्युहार मनाया जाया करदा/जा सै। ब्याह-वाण्याँ का मौसम इसलिए क्योंकि इस वक्त जमींदार-किसान अपने खेती-बाड़ी से फ्री वक्त में होता था, या तो फसल पकाई पे आ चुकी होती थी या कट चुकी होती थी| तो घर में धन की उपलब्धता भी और वक्त भी दोनों होते थे| प्रैक्टिकल और व्याहारिक वजहें बता दी हैं, इसकी वजहें खामखा तंत्र-पंत्रों में जोड़ के देखने की जरूरत ना है|

के हो सै सांझी का त्युहार: जै हिंदी के शब्दां म्ह कहूँ तो इसनें भींत पै बनाण जाण आळी न्य्रोळी रंगोली भी बोल सकें सैं| आस्सुज की मोस आंदे, कुंवारी भाण-बेटी सांझी घाल्या करदी। जिस खात्तर ख़ास किस्म के सामान अर तैयारी घणे द्य्न पहल्यां शरू हो ज्याया करदी।

सांझी नैं बनाण का सामान: आल्ली चिकणी माट्टी/ग्यारा, रंग, छोटी चुदंडी, नकली गहने, नकली बाल (जो अक्सर घोड़े की पूंछ या गर्दन के होते थे), हरा गोबर, छोटी-बड़ी हांड़ी-बरोल्ले। चिकनी माट्टी तैं सितारे, सांझी का मुंह, पाँव, अर हाथ बणाए जाया करदे अर ज्युकर-ए वें सूख ज्यांदे तो तैयार हो ज्याया करदा सांझी बनाण का सारा सामान|

सांझी बनाण का मुहूर्त: जिह्सा अक ऊपर बताया आस्सुज के मिन्हें की मोस के द्य्न तैं ऊपर बताये सामान गेल सांझी की नीम धरी जा सै। आजकाल तो चिपकाणे आला गूंद भी प्रयोग होण लाग-गया पर पह्ल्ड़े जमाने म्ह ताजा हरया गोबर (हरया गोबर इस कारण लिया जाया करदा अक इसमें मुह्कार नहीं आया करदी) भींत पै ला कें चिकणी माट्टी के बणाए होड़ सुतारे, मुंह, पाँ अर हाथ इस्पै ला कें, सूखण ताहीं छोड़ दिए जा सैं, क्यूँ अक गोबर भीत नैं भी सुथरे ढाळआँ पकड़ ले अर सुतारयां नैं भी। फेर सूखें पाछै सांझी नैं सजावण-सिंगारण खात्तर रंग-टूम-चुंदड़ी वगैरह लगा पूरी सिंगार दी जा सै।

सांझी के भाई के आवण का द्यन: आठ द्यन पाछै हो सै, सांझी के भाई के आण का द्य्न। सांझी कै बराबर म्ह सांझी के छोटे भाई की भी सांझी की ढाल ही छोटी सांझी घाली जा सै, जो इस बात का प्रतीक मान्या जा सै अक भाई सांझी नैं लेण अर बेबे की सुस्राड़ म्ह बेबे के आदर-मान की के जंघाह बणी सै उसका जायजा लेण बाबत दो द्य्न रूकैगा|

दशमी के द्य्न भाई गेल सांझी की ब्य्दाई: इस द्यन सांझी अर उनके भाई नैं भीतां तैं तार कें हांड़ी-बरोल्ले अर माँटा म्ह भर कें धर दिया जा सै अर सांझ के बख्त जुणसी हांडी म्ह सांझी का स्यर हो सै उस हांडी म्ह दिवा बाळ कें आस-पड़ोस की भाण-बेटी कट्ठी हो सांझी की ब्य्दाई के गीत गांदी होई जोहडां म्ह तैयराण खातर जोहडां क्यान चाल्या करदी।

उडै जोहडां पै छोरे जोहड़ काठे खड़े पाया करते, हाथ म्ह लाठी लियें अक क्यूँ सांझी की हंडियां नैं फोडन की होड़ म्ह। कह्या जा सै अक हांडी नैं जोहड़ के पार नहीं उतरण दिया करदे अर बीच म्ह ए फोड़ी जाया करदी|

भ्रान्ति: सांझी के त्युहार का बख्त दुर्गा-अष्टमी अर दशहरे गेल बैठण के कारण कई बै लोग सांझी के त्युहार नैं इन गेल्याँ जोड़ कें देखदे पाए जा सें। तो आप सब इस बात पै न्यरोळए हो कें समझ सकें सैं अक यें तीनूं न्यारे-न्यारे त्युहार सै। बस म्हारी खात्तर बड्डी बात या सै अक सांझी न्यग्र हरयाणवी त्युहार सै अर दुर्गा-अष्टमी बंगाल तैं तो दशहरा अयोध्या व् थाईलैंड का त्युहार सै। दुर्गा-अष्टमी अर दशहरा तो इबे हाल के बीस-तीस साल्लां तैं-ए हरयाणे म्ह मनाये जाण लगे सें, इसतें पहल्यां उरानै ये त्युहार निह मनाये जाया करदे। दशहरे को हरयाणे म्ह पुन्ह्चाणे का सबतें बड्डा योगदान राम-लीलाओं नैं निभाया सै|

आप सभी को शुद्ध हरयाणवी त्यौहार सांझी की बधाई के साथ-साथ, गुजरात के गरबा, बंगाल की दुर्गा पूजा (नवरात्रे), अवध व् थाईलैंड के दशहरे की भी शुभकामनाएं|

जय योद्धेय! - फूल मलिक




Tuesday, June 12, 2018

दुलीना-गोहाना-मिर्चपुर-भगाना से दूबलधन-मोखरा तक!

दुलीना-गोहाना-मिर्चपुर-भगाना से दूबलधन-मोखरा तक:

यानि दलितों को जाटों से भिड़ाने या जाटों को दलितों का दुश्मन दिखाने या जाटों का भाईचारा तोड़ने से ट्राई करके अब ओबीसी के साथ वही एपिसोड दोहराने की इन कोशिशों में जाट ही सॉफ्ट-टारगेट क्यों है, जाट ही कॉमन क्यों है?

दलितों को आज के दिन यह चीज समझ आ चुकी है कि जाट उनका दुश्मन नहीं, बल्कि ऐसा दिखाने के षड्यंत्र किये गए थे| देखें ओबीसी को यह बात कब तक समझ आती है कि जाट दुश्मन उनका भी नहीं, परन्तु उनको कब तक यह बात समझ आती है, देखें|

चार-पांच साल से यह बदलाव देखा आपने?

दुलीना-गोहाना-मिर्चपुर-भगाना की बजाये दूबलधन-मोखरा रचने-रचवाने की साजिशें सामने आ रही हैं? इतना समझ लीजिये कि दोनों के पीछे ताकत एक ही है| वक्त रहते ही पहचान लीजिये|

दलित तो जाट के साथ प्रोफेशनल रिश्ते के तहत खेतों में काम करता रहा है, इसलिए यह बात समझ भी आ सकती थी कि उन प्रोफेशनल रिश्तों की कड़वाहट को जाट के दुश्मन दुलीना-गोहाना-मिर्चपुर-भगाना के जरिये भुना गए| परन्तु ओबीसी के साथ किस बात के मनमुटाव बढ़ाने के षड्यंत्र आजमाए जा रहे हैं, दूबलधन व् मोखरा के जरिये? अभी तक शुक्र है कि यह कांड हुए नहीं, परन्तु ऐसा करवाने की मंशा लिए लोग यहीं पर रुक जायेंगे इसकी कोई मियाद नहीं|

एक नाई ने बाल काटे तो जाट ने बदले में पैसा-तूड़ा-अनाज-हरा चारा दिया जाता रहा|
एक कुम्हारी ने मिटटी के बर्तन दिए तो जाट ने बदले में पैसा-तूड़ा-अनाज-हरा चारा दिया जाता रहा|
एक लुहार ने औजार बनाये तो जाट ने बदले में पैसा-तूड़ा-अनाज-हरा चारा दिया जाता रहा|
एक जुलाहे ने कपड़े-लत्ते-गाब्बे सीए तो जाट ने बदले में पैसा-तूड़ा-अनाज-हरा चारा दिया जाता रहा|
एक माली ने फल-फूल दिए तो जाट ने बदले में पैसा-तूड़ा-अनाज-हरा चारा दिया जाता रहा|

यहाँ तक कि एक बाहमण (वैसे आर्य-समाजी होने के कारण अधिकतर जाट यह कार्य खुद ही कर लिया करते थे, हाँ आजकल चलन में बदलाव जरूर है, परन्तु बदलाव अब वापिस जड़ों की तरफ मुड़ने भी लगा है) ने फेरे करवाए तो जाट ने बदले में पैसा-खाना दिया जाता रहा|

ना जाट ने कभी इनको चतुरवणीर्य व्यवस्था के तहत छूत-अछूत की तरह ट्रीट किया| ना जाट ने कभी देवदासियों की भाँति कभी किसी दलित-ओबीसी की बेटी का सार्वजनिक स्थल में सामूहिक बलात्कार किया (अब यहाँ पर्दे के पीछे होने या पाए जाने वाले अवैध संबंधों को जुल्म मत कह दीजियेगा, क्योंकि जो अवैध होता है वह जुल्म नहीं सहमति से होता है या किसी लोभ-प्रलोभन-लालच में होता है)| ना कभी किसी ओबीसी-दलित को बिहार-बंगाल के ओबीसी-दलित की भांति वहां के सवर्णों की भांति जाट ने इतना सताया कि उनसे तंग आकर मात्र बेसिक दिहाड़ी के लिए वह लोग हरयाणा-पंजाब में जैसे मारे-मारे फिरते हैं, ऐसे यहाँ का ओबीसी-दलित को कभी हरयाणा-पंजाब से बाहर जाना पड़ा हो (हाँ स्वेच्छा से बड़े व्यापार-नौकरी के चलते बेशक कोई गया हो, वह तो जाट भी जाते रहते हैं)|

जाट ने तो बल्कि चतुर्वर्णीय व्यवस्था को धत्ता बताते हुए, "गाम-गुहांड-गौत" के कांसेप्ट दिए| "छतीस बिरादरी, सर्वधर्म की बेटी सबकी बेटी" के सिद्धांत दिए और सिद्द्त से निभाए| आज भी बारातें जहाँ जाती हैं, वहां अपने गाम की छतीस बिरादरी की बेटी की मान बराबरी से करके आती हैं|

तो फिर क्यों ओबीसी को जाट का पीड़ित दिखाने की साजिशें अंजाम दिलवाने की दूबलधन व् मोखरा के जरिये कोशिशें हो रही हैं?

यह वक्त है जाट बुद्धिजियों, यौद्धेयों, खाप चौधरियों के जाग जाने का, और सोशल मीडिया व् ग्राउंड पर इन हकीकतों से हर ओबीसी को वाकिफ करवाने का, करवाए रखने का|

वरना रोहतक-झज्जर में जो यह करवाने को एंटी-जाट विचारधारा मंडरा रही है इसका अंत परिणाम यह होगा कि बैठे-बिठाये बिना किसी दोष के ओबीसी भी आपसे कट लेगा (हाँ समझेगा जरूर, जैसे दलित ने समझा; परन्तु तब तक बहुत देर हो चुकी होगी) और खाजकुमार खैनी जैसों के जरिये तो ओबीसी का वोट ले जायेंगे और ठगपाल कालिख के जरिये जाटों का| हुड्डा-चौटाला आदि को भी अगर अपने क्षेत्र के इन हालातों की खबर है तो चुप ना बैठें| इस लेख की बातें अपने कैडर के जरिये ग्राउंड तक आप भी ले जा सकते हैं, ले जा सकते हैं कि इससे पहले देर हो जाए| और खैनी के जरिये ओबीसी का और कालिख के जरिये जाटों का वोट एंटी-जाट सोच के लोग ले उड़ें|

जय यौद्धेय! - फूल मलिक

Saturday, January 6, 2018

कहलवा दो दिल्ली के नवाब को, "जाट सूरमे आये हैं और राणी हिंडौली को साथ लाये हैं! देखें वह राणी ले जाता है या हरदौल को देने घुटनों के बल आता है"!

महाराजाधिराज सूरजमल सुजान की पुण्यतिथि (25 दिसंबर 1763) को समर्पित !

1) दुर्दांत इतना कि जब सब अब्दाली के भय से दुबके हुए थे, वह बेख़ौफ़ अब्दाली के दुश्मनों यानि तीसरे पानीपत युद्ध के घायल बाह्मण पेशवा व् उनकी सेना की मरहमपट्टी कर रहा था!

2) दयालु इतना कि उसी को 'दुशाला पाट्यो भलो, साबुत भलो ना टाट, राजा भयो तो का भयो रह्यो जाट-गो-जाट' का तंज कसने वाले पेशवा सदाशिवराव भाऊ की घायल फ़ौज को अपने रोहतक से ले जयपुर तक फैले राज्य में शरण-रशद व् दवा-दारु देने का आदेश दे देता है|

3) कूटनैतिक ऐसा कि पानीपत युद्ध के घायल पेशवाओं की मदद करने से उससे क्रुद्ध अब्दाली ने जब उसे धमकाने की कोशिश करी तो ऐसा कुटिल जवाब दिया कि अब्दाली की भरतपुर पर हमला करके जाटों को सबक सिखाने की धरी-की-धरी रह गई|

4) वर्णवाद और जातिवाद से रहित ऐसा कि अपना खजांची चमार बनाया हुआ था और सेनापति-दूत गुज्जर को|

5) धर्मनिरपेक्ष इतना कि एक पाले मस्जिद बनवाता था तो दूसरे पाले मंदिर|

6) कौम समाज की इज्जत का इतना सरोकार कि दिल्ली नवाबों की कैद में पड़ी बाह्मण बेटी हरदौल को अपनी बेटी मानते हुए, अफलातूनी अंदाज में जब, "अरे आवें हो भरतपुर के जाट, दिल्ली के हिला दो चूल और पाट" का हल्कारा बोलता हुआ छुड़ाने निकला तो मुग़ल कह उठे, "तीर-चलें-तलवार-चलें, चलें कटारें इशारों तैं! अल्लाह मियां भी बचा नहीं सकदा जाट भरतपुर वाले तैं!!"

7) दबंग और आत्मविश्वासी इतना कि हरदौल को छुड़ाने वाले युद्ध में रानी हिंडौली को भी नवाब की ख्वाइस पर साथ ले गया था और गुड़गांव में डाल के पड़ाव संदेशा दिया कि, "कह दो नवाब को, जाट सूरमे आये हैं और राणी हिंडौली को साथ लाये हैं! देखें वह राणी ले जाता है या हरदौल को देने घुटनों के बल आता है!"

8) चतुर व् पारखी इतनी कि बाजीराव पेशवा व् सदाशिवराव भाऊ दोनों की उसको बंदी बनाने की, उसकी सेना का इस्तेमाल करने की चालें भांप, उनको चकमा दे तुरंत शिविर से बच निकला|

9) युद्ध कौशल का माहिर ऐसा कि बागरु (मोती-डूंगरी) की लड़ाई में मुग़ल-पुणे पेशवा-राजपूतों की 330000 की 7-7 सेनाओं को मात्र 20000 की छोटी सी फ़ौज के साथ 3-3 दिन रण में छका के हरा देता था|

10) मैत्री इतना कि जयपुर का ताज किसके सर सजेगा इसका फैसला हाथों-हाथ कर देता था और माधो सिंह के सर से ताज उतार राजा ईश्वरी सिंह के सर सजा देता था|

11) उसी की हृदय-विशालता ने समाज को "बिन जाटों किसने पानीपत जीते", "जाट मरा तब जानिये जब तेरहवीं हो ले" की कहावतें दी|

12) जिसकी दूरदर्शी सोच व् भवन निर्माण कला ने समूचे भारत का ऐसा किला लोहागढ़ दिया कि जिसको अंग्रेज भी 13-13 हमले करके जीत नहीं पाए और आखिरकार 'ट्रीटी ऑफ़ फ्रेंडशिप एंड इक्वलिटी' करनी पड़ी|
हिन्दू-हिन्दू चिल्लाने से हिंदुत्व नहीं आने वाला, असली हिन्दू-हीरों को सम्मान देना सीखो! उनकी महानताओं को बराबरी से गाना और उठाने का जज्बा रखो|

और आज के दिन नोट करो कि इस "एशियाई ओडियसस" व् "जाटों के प्लेटो" के नाम से मशहूर हुए अफलातून को कौन-कौन याद करने की हिम्मत जुटा पाता है| वरना छोड़ दो दोगलों के पीछे दुम हिलाना क्योंकि, 'यूँ व्यर्थ में काका कहें काकड़ी आज तक किसी को मिली हो तो तुम्हें मिलेगी!'

जय यौद्धेय! - फूल मलिक

ब्रज व् हरयाणा के उदारवादी जमींदारों की वह क्रांति जिसने उत्तर भारत का इतिहास बदल के रख दिया!

समरवीर अमरज्योति गॉड-गोकुला जी महाराज के बलिदान दिवस (01/01/1670) पर उन ज्योतिपुंज को कोटि-कोटि गौरवपूर्ण नमन!

गॉड-गोकुला के नेतृत्व में चले इस विद्रोह का सिलसिला May 1669 से लेकर December 1669 तक 7 महीने चला और अंतिम निर्णायक युद्ध तिलपत में तीन दिन चला| यह भारत के उस वर्ग की कहानी है जिसमें मिलिट्री-कल्चर पाया जाता है|

हे री मेरी माय्यड़ राणी, सुनणा चाहूँ 'गॉड-गोकुला' की कहाणी,
गा कें सुणा दे री माता, क्यूँकर फिरी थी शाही-फ़ौज उभाणी!
आ ज्या री लाडो, हे आ ज्या मेरी शेरणी,
सुण, न्यूं बणी या तेरे पुरखयां की टेरणी!
एक तिलपत नगरी का जमींदार, गोकुला जाट हुया,
सुघड़ शरीर, चुस्त दिमाग, न्याय का अवतार हुया!
गूँज कें बस्या करता, शील अर संतोष की टकसाल हुया,
ब्रजमंडल की धरती पै हे बेबे वो तै, जमींदारी का सरताज हुया!!
यू फुल्ले-भगत गावै हे लाडो, सुन ला कैं सुरती-स्याणी!

1) यह खाप-समाजों में पाए जाने वाले मिलिट्री-कल्चर की वजह से सम्भव हो पाता है कि जब-जब देश-समाज को इनके पुरुषार्थ की जरूरत पड़ी, इन्होनें रातों-रात फ़ौज-की-फौजें और रण के बड़े-से-बड़े मैदान सजा के खड़े कर दिए| आईये जानें उसी मिलिट्री कल्चर से उपजी एक ऐतिहासिक लड़ाई की दास्ताँ, जिसकी अगुवाई करी थी आज ही के दिन शहीद हुए 'गॉड-गोकुला जी महाराज' ने|

2) यह हुई थी औरंगजेब की अन्यायकारी किसान कर-नीति के विरुद्ध ‘गॉड गोकुला’ की सरपरस्ती में| जाट, मेव, मीणा, अहीर, गुज्जर, नरुका, पंवारों आदि से सजी सर्वखाप की हस्ती में||

3) राणा प्रताप से लड़ने अकबर स्वयं नहीं गया था, परन्त "गॉड-गोकुला” से लड़ने औरंगजेब तक को स्वयं आना पड़ा था।

4) हल्दी घाटी के युद्ध का निर्णय कुछ ही घंटों में हो गया था| पानीपत के तीनों युद्ध एक-एक दिन में ही समाप्त हो गए थे, परन्तु तिलपत (तब मथुरा में, आज के दिन फरीदाबाद में) का युद्ध तीन दिन चला था| यह युद्ध विश्व के भयंकरतम युद्धों में गिना जाता है|

5) अगर 1857 अंग्रेजों के खिलाफ आज़ादी का पहला विद्रोह माना जाए तो 1669 मुग़लों की कर-नीतियों के खिलाफ प्रथम विद्रोह था|

6) एक कविताई अंदाज में तब के वो हालत जिनके चलते God Gokula ने विद्रोह का बिगुल फूंका:
सम्पूर्ण ब्रजमंडल में मुगलिया घुड़सवार, गिद्ध, चील उड़ते दिखाई देते थे|
हर तरफ धुंए के बादल और धधकती लपलपाती ज्वालायें चढ़ती थी|
राजे-रजवाड़े झुक चुके थे; फरसों के दम भी जब दुबक चुके थे|
ब्रह्माण्ड के ब्रह्मज्ञानियों के ज्ञान और कूटनीतियाँ कुंध हो चली थी|
चारों ओर त्राहिमाम-2 का क्रंदन था, ना इंसान ना इंसानियत के रक्षक थे|
तब उन उमस के तपते शोलों से तब प्रकट हुआ था वो महाकाल का यौद्धेय|
उदारवादी जमींदार समरवीर अमरज्योति गॉड-गोकुला जी महाराज|

7) इस युद्ध में खाप वीरांगनाओं के पराक्रम की साक्षी तिलपत की रणभूमि की गौरवगाथा कुछ यूँ जानिये:
घनघोर तुमुल संग्राम छिडा, गोलियाँ झमक झन्ना निकली,
तलवार चमक चम-चम लहरा, लप-लप लेती फटका निकली।
चौधराणियों के पराक्रम देख, हर सांस सपाटा ले निकलै,
क्या अहिरणी, क्या गुज्जरी, मेवणियों संग पँवारणी निकलै|
चेतनाशून्य में रक्तसंचारित करती, खाप की एक-2 वीरा चलै,
वो बन्दूक चलावें, यें गोली भरें, वो भाले फेंकें तो ये धार धरैं|

8) God Gokula के शौर्य, संघर्ष, चुनौती, वीरता और विजय की टार और टंकार राणा प्रताप से ले शिवाजी महाराज और गुरु गोबिंद सिंह से ले पानीपत के युद्धों से भी कई गुणा भयंकर हुई| जब God Gokula के पास औरंगजेब का संधि प्रस्ताव आया तो उन्होंने कहलवा दिया था कि, "बेटी दे जा और संधि (समधाणा) ले जा|" उनके इस शौर्य भरे उत्तर को पढ़कर घबराये औरंगजेब का सजीव चित्रण कवि बलवीर सिंह ने कुछ यूँ किया है:
पढ कर उत्तर भीतर-भीतर औरंगजेब दहका धधका,
हर गिरा-गिरा में टीस उठी धमनी धमीन में दर्द बढा।

9) राजशाही सेना के साथ सात महीनों में हुए कई युद्धों में जब कोई भी मुग़ल सेनापति God Gokula को परास्त नहीं कर सका तो औरंगजेब को विशाल सेना लेकर God Gokula द्वारा चेतनाशून्य उदारवादी जमींदारी जनमानस में उठाये गए जन-विद्रोह को दमन करने हेतु खुद मैदान में उतरना पड़ा| और उसको भी एक के बाद एक तीन हमले लगे थे उस विद्रोह को दबाने में|

10) आज भारतीय संस्कृति व् उदारवादी जमींदारी की रक्षा का तथा तात्कालिक शोषण, अत्याचार और राजकीय मनमानी की दिशा मोड़ने का यदि किसी को श्रेय है तो वह केवल 'गॉड-गोकुला' को है।

11) 'गॉड-गोकुला’ का न राज्य ही किसी ने छीना लिया था, न कोई पेंशन बंद कर दी थी, बल्कि उनके सामने तो अपूर्व शक्तिशाली मुग़ल-सत्ता, दीनतापूर्वक, संधी करने की तमन्ना लेकर गिड़-गिड़ाई थी।

12) हर धर्म के खाप विचारधारा (सिख धर्म में मिशल इसका समरूप हैं) को मानने वाले समुदाय के लिए: बौद्ध धर्म के ह्रास के बाद से एक लम्बे काल तक सुसुप्त चली खाप थ्योरी ने महाराजा हर्षवर्धन के बाद से राज-सत्ता से दूरी बना ली थी (हालाँकि जब-जब पानी सर से ऊपर गुजरा तो ग़ज़नी से सोमनाथ की लूट को छीनने, पृथ्वीराज चौहान के कातिल मोहम्मद गौरी को मारने, कुतबुद्दीन ऐबक का विद्रोह करने, तैमूरलंग को हराकर भारत से भगाने, राणा सांगा की मदद करने हेतु खाप समाज अपनी नैतिकता निभाता रहा)| जो शक्तियां आज खाप थ्योरी के समाज पर हावी होना चाह रही हैं, तब इनकी इसी तरह की चक-चक से तंग आकर राजसत्ता इनके भरोसे छोड़, खुद कृषि व् संबंधित व्यापारिक कार्य संभाल लिए थे| परन्तु यह शक्तियां कभी भारत को स्वछंद व् स्वतंत्र नहीं रख सकी| और ऐसे में 1669 में जब खाप थ्योरी का समाज "गॉड-गोकुला" के नेतृत्व में फिर से उठा तो ऐसा उठा कि अल्पकाल में ही भरतपुर और लाहौर जैसी अजेय शौर्य की अप्रतिम रियासतें खड़ी कर दी| ऐसे उदाहरण हमें आश्वस्त करते हैं कि खाप विचारधारा में वो तप, ताकत और गट्स हैं जिनका अनुपालन मात्र करते रहने से हम सदा इतने सक्षम बने रहते हैं कि देश के किसी भी विषम हालात को मोड़ने हेतु जब चाहें तब अजेय विजेता की भांति शिखर पर जा के बैठ सकते हैं|

13) हर्ष होता है जब कोई हिंदूवादी या राष्ट्रवादी संगठन राणा प्रताप, शिवाजी महाराज व् गुरु गोबिंद सिंह जी के जन्म या शहादत दिवस पर शुभकामनाओं का आदान-प्रदान करते हैं| परन्तु जब यही लोग "गॉड गोकुला" जैसे अवतारों को (वो भी हिन्दू होते हुए) याद तक नहीं करते, तब इनकी राष्ट्रभक्ति थोथी लगती है और इनकी इस पक्षपातपूर्ण सोच पर दया व् सहानुभूति महसूस होती है| दुर्भाग्य की बात है कि भारत की इन वीरांगनाओं और सच्चे सपूतों का कोई उल्लेख, दरबारी टुकडों पर पलने वाले तथाकथित इतिहासकारों ने नहीं किया। हमें इनकी जानकारी मनूची नामक यूरोपीय यात्री के वृतान्तों से होती है। अब ऐसे में आजकल भारत के इतिहास को फिर से लिखने की कहने वालों की मान के चलने लगे और विदेशी लेखकों को छोड़ सिर्फ इनको पढ़ने लगे तो मिल लिए हमें हमारे इतिहास के यह सुनहरी पन्ने| खैर इन पन्नों को यह लिखें या ना लिखें (हम इनसे इसकी शिकायत ही क्यों करें), परन्तु अब हम खुद इन अध्यायों को आगे लावेंगे| और यह प्रस्तुति उसी अभियान का एक हिस्सा है|

जय यौद्धेय! - फूल मलिक

आने वाले कल के नवदलित बन जायेंगे भारत के उदारवादी जमींदार अगर इन बातों पर गौर नहीं फ़रमाया तो!

धरती पर धन अर्जित करने के जरियों को मुख्यत: चार भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है:

1) धर्म के धंधों के जरिये
2) वस्तुओं व् मानवीय सेवाओं के व्यापार के जरिये
3) जमींदारी व् इससे संबंधित व्यापारों के जरिये
4) मजदूरी/कर्मचारी/नौकरी के जरिये

भारतीय जमींदारी में भी दो प्रकार हैं| एक सामंतवादी जमींदारी और एक उदारवादी जमींदारी| उत्तरी-पश्चिमी भारत में मुख्यत उदारवादी जमींदारी होती है, बाकी भारत में सामंतवादी जमींदारी होती है| दोनों में मुख्य अंतर् यह है कि सामंती जमींदारी छूत-अछूत,शूद्र-स्वर्ण व् ऊंच-नीच के भेद से चलती है जबकि उदारवादी जमींदारी सीरी-साझी यानि सुख-दुःख-आमदनी के वर्किंग पार्टनर कल्चर के मानवीय सिद्धांत पर| जहाँ-जहाँ देश में वर्णवादी व् शूद्र-स्वर्ण व्यवस्था हावी रही है वहां-वहां सामंती जमींदारी चली आई है और जहाँ-जहाँ सीरी-साझी संस्कृति रही है वहां उदारवादी जमींदारी|

इसको कुछ यूँ भी समझ लीजिये कि जहाँ-जहाँ उदारवादी जमींदारी है वहां के मजदूर को सिंपल दिहाड़ी करने हेतु भी इस क्षेत्र से कभी बाहर नहीं जाना पड़ा, उदाहरण के तौर पंजाब-हरयाणा-वेस्ट यूपी| और जहाँ-जहां सामंतवादी जमींदारी है वहां के मजदूर इतने पीड़ित-प्रताड़ित होते आये हैं कि उनको सम्मान व् इज्जत की बेसिक दिहाड़ी कमाने हेतु भी उदारवादी जमींदारी की धरती पर आना पड़ता रहा है, जैसे कि पंजाब-हरयाणा-वेस्ट यूपी में आने वाले प्रवासी मजदूर|

आज के दिन उदारवादी जमींदारी बाकी सबके निशाने पर है और इसको बचाये रखना है तो बाह्मण-राजपूत (इन दोनों का वह हिस्सा जो उदारवादी जमींदारी के तहत खेती करता है) जाट-गुज्जर-अहीर-सैनी-धानक-चमार आदि के तहत जो भी उदारवादी जमींदारी करने वाली जातियां हैं इनको समझना होगा कि जैसे धर्म के धंधे में बाह्मण वर्ण में भी सैंकड़ों जातियां होने के बावजूद यह लोग धर्म के जरिये अर्थ कमाने के उद्देश्य को ही सर्वोपरी रखते हैं|

जैसे बनिया-अरोड़ा-खत्री-जैनी-सिंधी आदि वस्तुओं व् मानवीय सेवाओं के व्यापार के जरिये धन कमाने के रास्ते में इनकी जातियों की भिन्नता को साइड रख, धन कमाने के मिनिमम कॉमन एजेंडा को आगे रख काम करते हैं|

और ऐसे ही मजदूरी/कर्मचारी/नौकरी, यह वर्ग भी अपनी न्यूनतम दिहाड़ी-तनख्वाह वगैरह के लिए जाति साइड में रख अर्थ की न्यूनतम सुनिश्चितत्ता किये रखते हैं|

ऐसे ही उदारवादी जमींदारी जातियों को भी दो वजहों से उनके बीच दिनप्रतिदिन बढ़ते जा रहे जातीय जहर को साइड करना होगा| दो वजह यानि एक तो खुद की निष्क्रियता, मिथक व् अज्ञान के चलते पैदा हुए मतभेद व् दूसरा धार्मिक व् व्यापारिक ताकतों द्वारा डाल दिए गए मतभेद|

जब तक इन दोनों को समझ के व् इनको अपनी जगह दिखाते हुए, अपने आर्थिक हितों पर ध्यान नहीं दिया जायेगा तो समझ लीजियेगा कि आने वाले समय के नवदलित आप ही होने वाले हो| चौड़े मत होना और किसी बहम में मत रहना, फिर बेशक उदारवादी जमींदार होते हुए आपकी जाति चाहे बाहमण ही क्यों ना हो, जाट, राजपूत, धानक चमार चाहे कुछ भी क्यों ना हो| जमींदार हो, शहरों में बसते हो तो भी आप आने वाले कल के नवदलित बनने वाले हो अगर समय रहते इस जातीय ईर्ष्या को साइड करके, उदारवादी जमींदारी जातियों का मिनिमम कॉमन एजेंडा बना के नहीं चले तो|

वैसे भी यह ईर्ष्या की बीमारी विगत सालों तक वर्णीय आधार पर तो देखने को मिल जाती थी परन्तु अब ऐसा लगता है कि यह 'खुद के सुवाद खुद ही लेने' जैसी जो एक बिमारी सी उदारवादी जमींदारों में लग चली है, अगर वक्त रहते इससे बाज नहीं आये तो यह जहर वर्णीय जहर से भी घातक होने वाला है| वर्णीय जहर जब तक था तब तक आप लोग कम से कम जातीय स्तर पर तो एक थे| अब तो आप खुद ही इसको खत्म करवाते जा रहे हो, कुछ 'खुद के सुवाद खुद लेने' के चक्रों में और बाकी धर्म-व्यापार-अंतरराष्ट्रीय ताकतों जैसी जो ताकतें मिलके आपको पीस रही हैं वह तो पीस ही रही हैं| और उनका यह पीसना तभी रुकेगा, जब आप इनके ही आपके बीच फेंके इस जातीय जहर के पाश को तोड़ने हेतु 'खुद के सुवाद खुद लेना' बंद नहीं करोगे| कर दो और मिनिमम कॉमन एजेंडा बना लो, वरना वही बात फिर तैयार रहो आने वाले वक्त के नवदलित कहलाने को|

अगर चाहते हो कि कल को प्रवासी मजदूरों की भांति आपको भी कहीं और से बेसिक दिहाड़ी कमाने जाना ना पड़े तो सतर्क हो जाईये| अपने पुरखों की विरासत में दी इस उदारवादी जमींदारी सिस्टम की सौगात और सोहरत पहचानिये कि सामंती जमींदारी के सताये लोग भी आपके यहाँ रोजगार और इज्जत पाते हैं| परन्तु अगर आपने ही इसकी पैरोकारी करनी छोड़ दी तो फिर कहीं खुद के ही उट-मटीले ना उठ जाएँ, दूसरों के सतायों को रोजगार देने तो सपनों की गर्भगाह जा ठहरेगी|

जय यौद्धेय! - फूल मलिक

जमीन-फैक्ट्री-मंदिर और दलितों की इच्छा!

लेख का निचोड़: किसी भी अवांछित व् अनजाने टकराव की जगह बचाव की राह पर चलना होगा, खासकर उदारवादी जमींदार को|

पहले तो यही समझते हैं कि जमीन-फैक्ट्री-मंदिर बनते कैसे हैं:

जमीन: ऐतिहासिक परिवेश से शुरू करें तो किसान के पुरखों ने जंगल-पहाड़ों-पत्थरों-रेही-बंजर जमीनें तोड़-काट के सर्वप्रथम खेती करने के लायक बनाई| इस काम में दिहाड़ी पर मजदूर लिए तो अधिकतर ने फसल पक के घर आने का इंतज़ार किये बिना दिन-के-दिन दिहाड़ियाँ दी| इसके बाद जितनी मेहनत इनको जमीन को खेती के लायक करने में लगी, उससे ज्यादा नानी याद दिलाई समय-समय पर हुए राजे-रजवाड़े-मुग़ल-अंग्रेज-सेठ-साहूकार-सरकारों आदि द्वारा कभी भूमिकर, तो कभी भारी माल-दरखास (टैक्स) भरवा के| कई बार यह टैक्स इतने भारी तक होते थे किसानों को कभी औरंगजेब के खिलाफ गॉड गोकुला की सरप्रशती में सशत्र विद्रोह करने पड़े तो कभी अंग्रेजों के खिलाफ जींद रियासत में लजवाना काण्ड जैसे विद्रोह करने पड़े, कभी गोहद की किसान क्रांति करनी पड़ी तो कभी वर्णवाद व् शुद्रवाद वाले चचों-दाहिरों-पुष्यमित्रों के खिलाफ युद्ध लड़ने पड़े| जाट जैसी जातियों ने तो इसकी रक्षा हेतु ऐसे बलिदान दिए कि इनके जमीन से प्यार को देखते हुए व् ऐसे भीषण अकालों में, शासनकालों में जब सेठ-साहूकार भी जमीनें सुन्नी छोड़ दिया करते तब भी जाटों ने अपने घर-ढोर तक गिरवी रख टैक्स भर जमीनें बचाई तो कहावत चली कि "जमीन जट्ट दी माँ हुंदी ए"! जहाँ-जहाँ उदारवादी जमींदारी थी वहां तो दलितों मजदूरो को फसल पक के घर आने का इंतज़ार किये बिना दिन-के-दिन दिहाड़ियाँ दी, परन्तु जहाँ सामंतवादी जमींदारी थी वहां-वहां बंधुवा मजदूरी ने दलितों को इतना परेशान किया कि दलित जमींदारों को दुश्मन समझने लगे| सामंती जमींदारी में तो पता नहीं परन्तु उदारवादी जमींदारी में जिन मजदूरों ने खेती को समझा उन्होंने अपनी लग्न व् मेहनत से खुद के खेत भी बनाये और जमींदार भी कहलाये|

फैक्ट्री: लगाने वाला मालिक एक होता है, इसमें काम करने वाले सैंकड़ों-हजारों दलित-ओबीसी-स्वर्ण तमाम तरह की जातियों के मजदूर| जिन मजदूरों ने इनसे सीखा उन्होंने मजदूरी छोड़ खुद की फैक्टरियां खड़ी कर ली|
यानि जमीन हो या फैक्ट्री, रिस्क, मेहनत-दिहाड़ी और इन्वेस्टमेंट मालिक की व् दिहाड़ी मजदूर की| अब आते हैं तीसरे पे|

मंदिर: यहाँ पे इन्वेस्टमेंट क्या है जमीन-फैक्ट्री व् दिहाड़ी वाले द्वारा दिया गया तथाकथित दान, परन्तु मालिक कौन, इस इनकम पर आधिपत्य किसका, पुजारी का|

अब समझते हैं दलितों की जमीन की मांग: अगर दलित जमीन मेहनत से कमाने हेतु मांग रहे हैं तो सरकार ने पहले भी जमीनें दलितों को दी हैं| उदाहरण के तौर पर लगभग 3-4 दशक पहले हरयाणा के लगभग हर गाम में 1.75 एकड़ जमीन कुछ दलित जातियों को प्रति परिवार दी थी| इनमें जो मेहनती और लग्न वाले थे वह इस 1.75 की डबल-ट्रिप्पल व् इससे भी ज्यादा बना चुके हैं, बाकी अधिकतर बेच चुके हैं| इससे पहले सर छोटूराम की सरकार में तीन लाख एकड़ के करीब खाली व् बंजर जमीन मुल्तान की तरफ वाले पंजाब में दी गई थी| वहां अब कितनी दलितों के पास व् कितनी किधर जा चुकी, इसका कोई पता नहीं लग सकता क्योंकि उसके बाद से वह एक अलग देश बन चुका है| परन्तु आज कई दलित ऐसे भी हैं जो जैसे जाट पंजाब-हरयाणा-वेस्ट यूपी में छोटी पड़ती जोत को देखते हुए मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में पट्टे पे या अन्य तरह के कॉन्ट्रैक्ट्स पर जमीनें लेकर वहां की पथरीली जमीनों को अपने पुरखों की भांति समतल बना खेती कर रहे हैं, ऐसे ही यह दलित भाई भी कर रहे हैं| और मेहनत करके जमींदार बनने की चाह रखने वाले हर जाट-दलित या अन्य जाति के किसान के पास यह एक खुला रास्ता है|

तो जमीन और फैक्ट्री तो ऐसा सिस्टम है कि इन पर तो मलकियत मेहनत के सरल रास्ते पर चलते हुए बड़ी आसानी से पाई जा सकती है|

परन्तु इन तीनों में मंदिर चीज ऐसी जो बनती सर्वसमाज की कमाई से है लेकिन इनसे होने वाली आमदनी पर एकछत्र कब्ज़ा पुजारी वर्ग का चल रहा है| इसके लिए दलित अगर आवाज उठावें तो इसमें कोई कानूनी दांवपेंच भी नहीं क्योंकि यह किसानों व् फैक्ट्री वालों की भांति अधिकतर केसों में टैक्स भी नहीं भरते हैं, सिवाय कुछ 1-2% सरकार द्वारा अधिग्रहित मंदिरों को छोड़ कर| और जिनमें टैक्स भरा जाता है उनमें भी बाकी की इनकम पुजारी वर्ग अकेला हजम करता है जबकि बँटनी वह सर्वसमाज में बराबरी से चाहिए| या सर्वसमाज के कार्यों में सर्वसमाज से पूछ कर लगनी चाहिए| परन्तु दोनों ही काम नहीं होते|

अब मैं इस बात पर तो नहीं जाना चाहूंगा कि यह सिर्फ जमीन चाहियें वाली बातें ही क्यों उठ रही हैं और कौन उठा या उठवा रहा है| परन्तु ऐसी आवाजों को चाहिए कि सबसे पहले मंदिरों के चंदे-चढ़ावे की सर्वसमाज में बराबरी से बंटवारे बारे आवाज उठावें| क्योंकि जमीन-फैक्ट्री वाला तो इस बात के कानूनी कागज भी पेश कर देगा कि उसने या उसके पुरखों ने वह जमीन या फैक्ट्री मेहनत से बनाई है, दान-चंदे के चढ़ावे से नहीं| इसलिए अगर ऐसी आवाज उठानी या उठनी ही है तो ऐसी सर्वसमाज की प्रॉपर्टी व् इनकम के लिए उठे जो बनती सबके योगदान से है परन्तु उसको भोगता सिर्फ पुजारी वर्ग है|

विभिन्न किसानी संगठनों (खासकर उदारवादी जमींदारी वाले) से अनुरोध रहेगा कि एक तो सबसे पहले इस नाजुक पहलु पर मिनिमम कॉमन एजेंडा के तहत इकठ्ठे होईये (मेरे ख्याल से इस पर किसी भी संगठन की दो राय या दो रास्ते नहीं होंगे) और इस पर मिलकर काम कीजिये| दलितों के बीच जाईये और उनसे पूछिए आप जमीन मेहनत करके पाना चाहते हैं ना? अन्यथा इससे पहले कि देर हो जाए और स्थिति विकराल रूप ले ले, इस लेख की भांति अपना पक्ष उनके आगे रखिये| मुझे आशा ही नहीं उम्मीद है कि दलित आपके मर्म को समझेंगे और जिससे वास्तव में ऐसे हक़ मांगने चाहियें यानि मंदिर, उनसे ही आमदनी में हिस्सेदारी बारे आवाज उठाएंगे और इसमें फिर उदारवादी जमींदारी को दलितों का साथ देना पड़े तो पीछे नहीं हटना चाहिए|

वरना फंडी ऐसी आवाजों के जरिये दलित-किसान जातियों के बीच एक और भीषण महासंग्राम की तैयारी करवा रहा है जिसको समय रहते व् सूझ-बूझ से जल्द-से-जल्द नहीं सुलझाया गया तो दलित-किसान तो आपस में माथा फोड़ेंगे ही, समानांतर में उधर फंडी इसके जरिये अगली 2-4 पीढ़ियों का तो न्यूनतम बैठ के खाने का जुगाड़ बना जायेंगे| इस मुद्दे पर दलित से नफरत मत कीजिये, भय मत खाईये; इन भाईयों के बीच जाईये बात कीजिये, अन्यथा फंडी-पाखंडी तो चाहता ही है कि आप लोग इस मुद्दे पर बिना बात किये बस कोरी नफरत के आधार पर आपस में कट-मरो| और ऐसा करोगे तो फिर आप चिंतक-विचारक किस नाम के हुए? इसलिए जागरूक व् लॉजिकल दलित और किसान इस नाजुक मुद्दे पर आगे आवें और न्यायकारी हल निकाला जाए| क्योंकि फंड-पाखंड व् वर्णवाद का भुग्तभोगी अकेला दलित नहीं अपितु उदारवादी जमींदार भी रहा है|

जय यौद्धेय! - फूल मलिक

Wednesday, May 31, 2017

पंजाब केसरी अख़बार नहीं मानता जाटों को हिन्दू!

अरे रलदू, भाई जरा पहुँचाना इस बात को "हिन्दू एकता और यूनिटी" चिल्लाने वाले अंधभक्तों तक; उनमें भी खासकर जाट अंधभक्तों तक तो जरूर से जरूर पहुँचवा भाई! जिन्होनें हिंदुत्व के नाम पर इनके गलों-पेटों व् दान-पेटियों में अपने घर के घर उड़ेल दिए| और पुछवा कि पंजाब केसरी की इस "हिन्दू एकता" तोड़ने वाली बात के विरोध में कितने आरएसएस वालों ने, कितने अन्य हिन्दू संगठनों ने पंजाब केसरी के कौनसे-कौनसे दफ्तर के आगे धरना दिया या इसका खंडन ही किया?

यही देश का चौथा स्तम्भ होने का दायित्व होता है क्या इन अखबारों का?

फिर लोग यह भी पूछ बैठते हैं कि जाट-जाट क्यों चिल्लाते हो; ऐसे लोग भी देख लो, जाट-जाट, जाट नहीं चिल्लाता बल्कि यह लोग चिल्लाते हैं| पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा भी नहीं होगा कि वो जाट हैं, यह तो इन्हीं को मिर्ची लगी हुई जाट को हिन्दू नहीं बता के सिर्फ जाट बताने की| 

जय यौद्धेय! - फूल मलिक


100 % आरक्षण की मांग और किसानी मुद्दों को उठाना ही सही मार्ग रहेगा जाटों के लिए!

जिस कूटनीतिक तरीके से मोर्चेबंदी चल रही है ऐसे हालातों में अकेले आरक्षण के मुद्दे पर डटे रहने से जाट-समाज को आगे की राह नहीं मिलने वाली| आगे की राह मिलेगी किसानी मुद्दों को उठाने से जिसके लिए शायद अहीर-गुज्जर-मीणा व् अन्य किसानी जातियाँ भी जाटों की बाट जोह रही हैं कि कब जाट इस आरक्षण के मुद्दे से निबटें (या इसके समानांतर किसानी मुद्दे भी उठावें) और कब किसानों के मुद्दों को लेकर एकजुट हो किसानी-युग की वापसी करवाई जाए| हालाँकि अहीर-गुज्जर-मीणा व् अन्य किसानी जातियों की तरफ से फ़िलहाल ऐसा कोई संकेत भी नहीं आया है कि वो किसानी मुद्दों पर लड़ने को तैयार हैं| परन्तु इसकी संभावना ज्यादा है कि यह जातियां जाटों द्वारा किसानी मुद्दों पर आगे बढ़ने की इशारा मिलने वाली भाषा का इंतज़ार कर रही हों|

यह तो तय है कि चाहे कोई जाटों से कितना ही चिढ़ता रहे और कोई कितना ही कुछ कह ले; परन्तु उत्तरी भारत में किसानी मुद्दों पर जब जब कोई क्रांति या आवाज उठी; जाट सर्वदा से उसका अग्रमुख रहे हैं| कोई भी किसी अन्य किसान जाति का नेता अपने झूठे अहम् की तृप्ति हेतु कितना ही जाटों से किसान जातियों को तोड़ने के प्रयास कर ले, परन्तु किसान का हित जिस दिन चाहेगा; बिना जाट सोच ही नहीं पायेगा| और यह बात जाट के अलावा अन्य किसान जातियों को भी सोचनी होगी कि अपने जातिगत नेताओं के झूठे दम्भ पालने हेतु अपने किसानी हक यूँ ही बलि चढ़ाते रहोगे या इन नेताओं को यह भी कहोगे कि अगर किसान के भले की बात करके, सब किसान जातियों को साथ नहीं उठाते हो तो घर बैठो; कौम की आर्थिक बदहाली की कीमत पर तुम्हें और कितना पालें?

दूसरी बात, बीजेपी जाटों को आरक्षण देगी तो 2019 के चुनावों के आसपास देगी, वो भी इलेक्शन से 2-3 महीने पहले और 2-3 महीने बाद तक| और फिर वही स्टेटस-कवो मेन्टेन कर दिया जायेगा जाट-आरक्षण का जो आज है|

मेरा मानना है कि जाटों को अब वर्तमान व्यवस्था के तहत आरक्षण मांगने की अपनी रणनीति में दोहरा बदलाव लाना होगा| फ़िलहाल जो आरक्षण मिल रहा है वो लेने की मुहीम के साथ-साथ, इसके समानांतर "जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी!" की तर्ज पर अन्य समाजों-वर्गों के साथ 100% आरक्षण की मांग का नया मोर्चा अभी से खड़ा करना शुरू करना होगा| या कम-से-कम नीचे-नीच उसकी नींव रखनी शुरू करनी होगी, ताकि जाट बनाम नॉन-जाट रचने वालों को इस मुद्दे पर तमाम 100% आरक्षण चाहने वाले वर्गों को एकजुट कर जवाब दिया जा सके|

आरक्षण को 100 % वाली लाइन पर लाना ही होगा और अन्य किसानी जातियों के साथ किसान मुद्दों पर जुड़ना शुरू करना होगा; वर्ना अनाचारी व् किसान कौम के दुश्मन लोगों ने आरक्षण के नाम पर जाट कौम में ही कुछ ऐसे गुर्गे फिट कर रखे हैं जो आपको जाट-जाट में उलझाए रखेंगे| यह गुर्गे चंदे का हिसाब भी नहीं दे रहे और हिसाब मांगने पर त्योड़ी चढ़ा रहे हैं और घुर्रा भी रहे हैं| इनको आदेश है कि ना खुद दूसरे मुद्दे उठाएंगे और ना आपको उन मुद्दों को उठाने की ध्यान आने देंगे, जिससे जाट अन्य समाजों से तो जुड़ेगा ही; साथ ही जाट बनाम नॉन-जाट के मुद्दे को भी गौण करने में मदद करेगा|

और यही आरएसएस और बीजेपी चाहती है कि यह जाट-जाट का अलाप 2019 के चुनाव तक भी कायम रहे ताकि दूसरे समाज खुद भी इनसे डरते रहें और रहे-सही मीडिया मैनेजमेंट के माध्यम से डराए जाते रहें; और ऐसे जाट के अलावा सबके वोट अपनी झोली में ले 2019 की सरकार फिर से परवान चढ़वा ली जाए|

हरयाणा में किसान राजनीति का दम भरने वाली राजनैतिक पार्टियों को भी यह समझना होगा कि राजनैतिक पार्टी के उठाने से मुद्दे आमजन के नहीं बना करते| लेकिन अगर राजनैतिक पार्टियां अपने कैडर को जनता का रूप दे, जनता के बीच उतार और जनता के गैर-राजनैतिक संगठनों की पीठ थपथपा किसानी मुद्दों को उठवावें और फिर उस माहौल में खुद उनकी आवाज बनें तो रास्ता सरल होगा|

जय यौद्धेय! - फूल मलिक

Saturday, May 27, 2017

"आम आदमी पार्टी" भी दावों के बावजूद चंदे के हिसाब में जो ट्रांसपेरेंसी नहीं दिखा पाई, वो दिखाई "सर्वखाप पंचायत" ने!



फरवरी जाट आंदोलन 2016 के पीड़ितों की मदद हेतु "जाट सर्वखाप" ने ट्रस्ट बना कर जो "4 करोड़ 59 लाख" रूपये (राउंड फिगर, डिटेल्स देखें सलंगित वेबपेज पर) चंदा एकत्रित किया था, व् इसके अतिरिक्त ज्ञात सूत्रों से जो कुल "12 करोड़ 91 लाख रूपये" (राउंड फिगर, डिटेल्स देखें सलंगित वेबपेज पर) चंदा आया; 26 मई 2017 को रोहतक में प्रेस कांफ्रेंस कर उसकी "पाई-पाई का हिसाब" समाज के समक्ष रख; अपनी उस सदियों पुरानी नि:स्वार्थ सेवा व् समाज के प्रति निष्ठां और जवाबदेही की छवि को पेश किया जो अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी तक में दावों के बावजूद देखने को नहीं मिली|

खाप-चौधरियों की मुख्य भूमिका वाले “जाट-समाज राहत कोष ट्रस्ट” का यह सम्पूर्ण हिसाब-किताब देने का कुलीन कार्य इस बात का फिर से साक्षी बन गया कि क्यों खापें सदियों से लगातार आज भी क्यों वाजिब हैं|

इस चंदे के बैंक अकाउंट, CA की ऑडिट रिपोर्ट्स, चंदा आवंटन की वर्गीकृत रिपोर्ट्स समेत तमाम रोचक तथ्य देखें इस लिंक से: http://www.khapland.in/khaplogy/jsrkt-donation-report/

जय यौद्धेय! - फूल मलिक


Sunday, May 21, 2017

यह गहनता से समझने की बात है कि भारत में दो तरह की जमींदारियां होती आई हैं!

एक सामंती जमींदारी और दूसरी मेहनती जमींदारी|

सामंती जमींदारी यानी जो खुद खेत में काम नहीं करते, परन्तु खेत के किनारे या हवेली के अटारे खड़े हो सिर्फ आदेशों के जरिये ओबीसी, दलित, महा-दलित मजदूरों से खेती करवाते आये हैं| यह जमींदारी बिहार-बंगाल-उड़ीसा-पूर्वी यूपी से ले मध्य-दक्षिण व् पश्चिम भारत तक भी रही है और आज भी है|

दूसरे रहे हैं मेहनती जमींदार यानि वो जो खेत में मजदूर के साथ खुद भी खटते रहे हैं| यह जमींदारी मुख्यत: पंजाब-हरयाणा-दिल्ली-वेस्ट यूपी-उत्तराखंड व् उत्तरी राजस्थान के क्षेत्रों में पाई जाती है|

दोनों में समानता कुछ नहीं सिवाय इसके कि जमीन के मालिक होते हैं| हाँ, असमानताएं इतनी है कि गिनने चलो तो साफ़ स्पष्ट समझ आ जायेगा कि मेहनती जमींदारी वाली खापलैंड की धरती, बाकी के भारत की धरती से ज्यादा समृद्ध-सम्पन्न-विकसित व् खुशहाल क्यों रही है|

नंबर एक अंतर: सामंती कभी दलित-मजदूर की अपने पर परछाई तक नहीं पड़ने देता| जबकि मेहनती जमींदार उसके साथ ना सिर्फ खेत में खटता है अपितु एक ही पेड़ के नीचे बैठ के खाना भी खाता है और एक ही बर्तन से पानी भी पीता रहा है| हाँ, कुछ एक अपवाद मेहनती जमींदारी में भी तब बन जाते हैं जब अगर जमींदार जातिवाद व् वर्णवाद की मानसिकता से ग्रसित हो तो|

नंबर दो अंतर: सामंती जमींदारों के एरिया नदियों-धरती के पानियों की भरमार होने पर भी कभी देश को अन्न देने वाले अग्रणी राज्य नहीं बन सके| लेकिन मेहनती जमींदारी क्षेत्र वाले दो-दो हरित-क्रांतियों से ले श्वेत क्रांति तक के धोतक रहे|

नंबर तीन अंतर: सामंती जमींदारी वाली धरती के दलित-महादलित-ओबीसी को बेसिक दिहाड़ी-मजदूरी वाली आजीविका कमाने हेतु भी मेहनती जमींदारों वाली धरती पर आना पड़ता है| जबकि मात्र बेसिक दिहाड़ी के लिए मेहनती जमींदारी की धरती का कोई मजदूर सामंती जमींदारी वाली धरती वालों के यहाँ नहीं जाता|

नंबर चार अंतर: सामंती जमींदारी का जमींदार हद से आगे तक मानसिक गुलाम प्रवृति का रहा है, इसलिए अपने नीचे गुलाम रखने की रीत चलाई| जबकि मेहनती जमींदारी का जमींदार सदियों से कच्चे-पक्के कॉन्ट्रैक्ट्स के तहत सीरी रखता आया है|

नंबर पांच अंतर: सामंती जमींदारी में दलित मजदूर को नए कपड़े तक पहनने से पहले दस बार सोचना पड़ता है| जबकि मेहनती जमींदारी वाली धरती पर दलितों तक के घर-मकान जमींदारों की टक्कर तक के होते आये हैं|

नंबर छह अंतर: सामंती जमींदारी में या तो बेहद गरीब हैं या बिलकुल अमीर| जबकि मेहनती जमींदारी की धरती पे गरीब-अमीर का अंतर सबसे कम रहा है|

नंबर सात अंतर: सामंती जमींदारी में दलित-मजदूर की बहु-बेटी अपनी बहु-बेटी नहीं मानी गई| जबकि मेहनती जमींदार की धरती पर दलित-स्वर्ण सब छत्तीस बिरादरी की बेटी पूरे गाम की बेटी मानी गई|

नंबर आठ अंतर: सामंती जमींदारी में ब्याहने गए गाम में अपने गाम की बेटी की मान करने की कोई रीत नहीं मिलती| जबकि मेहनती जमींदारी सिस्टम की धरती पर, जिस गाम में बारात जाती रही है, वहां उनकी 36 बिरादरी की बेटी की मान करके आने की रीत रही है|

नंबर नौ अंतर: सामंती जमींदारी में जमींदार खलिहान से अन्न अपने घर पहले ले जाता है और बाकियों का हिसाब बाद में करता है| जबकि मेहनती जमींदारी सिस्टम की धरती पर जमींदार खलिहान से ही लुहार-कुम्हार-नाई-खात्ती आदि का हिस्सा अलग करके तब अन्न घर ले जाता आया है|

नंबर दस अंतर: सामंती जमींदारी अधिनायकवाद पर चलती है, जबकि मेहनती जमींदारी लोकतांत्रिकता व् गणतन्त्रिकता के सिद्धांत पर|

नंबर ग्यारह और सबसे बड़ा अंतर: सामंती जमींदारी का जमींदार मजदूर के साथ नौकर-मालिक का रिश्ता रखता है| जबकि मेहनती जमींदारी का जमींदार मजदूर के साथ सीरी-साझी यानि पार्टनर्स का वर्किंग कल्चर रखता आया है|

जय यौद्धेय! - फूल मलिक