Saturday, July 25, 2015

जाट पर से 'बोलना ले सीख' का टैग कैसे हट सकता है?


जाट, दलितों के मामले में शास्त्र-ग्रन्थ-पुराण की भाषा का इस्तेमाल करना छोड़ दें तो यह टैग रातों-रात हट सकता है।

नीच, तुच्छ, गिरा हुआ, अछूत, अस्पृश्य, कमीण, शूद्र, चांडाल आदि-आदि यह शब्द शास्त्र-ग्रन्थ-पुराणों की भाषा हैं, उनका दलितों के लिए सम्बोधन है।

और इसको कई जाट नादानी-वश तो कई जानबूझकर दलित भाईयों के मामले में प्रयोग करते हैं। ऐसे में होता यह है कि इसको लिखने-रचने-बनाने वाले खुद इनका इस्तेमाल करते हुए भी खुद तो बचकर निकल जाते हैं और उल्टा आपको ही इन शब्दों के प्रयोग करने पर 'जाटों को बोलना नहीं आता', जाट असभ्य हैं', 'जाट गंवार हैं', 'जाट झगड़ालू हैं' जैसे टैग फिर यही लोग आपको देते हुए मिलते हैं, ताकि आपके और दलित के बीच भाईचारे को फलने-फूलने ना दें।

तो भाई ऐसी भाषा क्यों प्रयोग करना जिससे हमारा ही ह्रास हो?

इसकी जगह अपनी शुद्ध जाट फिलोसोफी की 'सीरी-साझी' वाली सब जाति-सम्प्रदाय को बराबर मानते हुए भाई को भाई, चाचा को चाचा, ताऊ को ताऊ और दादा को दादा कहने वाली भाषा दलितों से व्यवहार करते वक्त प्रयोग करो।

अत: इनकी दोहरी स्याणपत को बाए-बाए कर दो (वैसे भी कहा गया है कि घणी स्याणी दो बै पोया करै, यहाँ यह लोग आपसे दो नहीं वरन कई बार पूवाते हैं), और दलित-मजदूर को अपनी खुद की सोशल फिलोसोफी के तहत नेग (रिश्ते) से बोलो!

जय यौद्धेय! - फूल मलिक

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