Wednesday, August 12, 2015

पादने हेतु टांग उठाने को भी जिसे नौकर चाहिए ऐसे तथाकथित राष्ट्रभक्तों से देश-धर्म की सुरक्षा नहीं हुई कभी और ना ही आगे होगी!


सांतवीं कक्षा में मेरे हिंदी अध्यापक होते श्री नारायण दत्त शर्मा, वैसे तो बड़े कड़क और खडूस होते थे, हम सब विधार्थी उनसे ही सबसे ज्यादा डरते थे| परन्तु जब वो मूड में होते थे तो चुटकुले भी धांसू सुनाते थे| एक बार चुटकुला सुनाया कि एक दुकानदार शरीर से इतना भारी था कि उसको पाद आता तो अपनी पाद की गैस को रास्ता देने हेतु खुद की टाँग भी नहीं उठा सकता था| ऐसे में उसने क्या किया कि रामू नाम का नौकर रख लिया| और जब भी उसको पाद आता उसको पुकारता, "हैड डामु, कित मैडगा; टांग ठा दे पादुन्गा!" और हम खूब जोर से हंसा करदे, यहां तक कि कई बार उनको इसी चुटकुले को फिर से सुनाने को कहा करते थे क्योंकि जब वो "हैड डामु" बोलते तो उनके मुंह के एक्सप्रेशन डबल कॉमेडी फ्लेवर देते|

हालाँकि उस ज़माने में जब यह चुटकुला सुनाया गया था, चुटकुले की भावना से ही सुनाया था गुरु जी ने, परन्तु आज के हालात में यह सटीक बैठा हुआ है|

तो भाईयो यें जितने भी आज कल नए-नए राष्ट्रवादी बने फिरें सें ना, अधिकतर इसी केटेगरी के हैं| इनको तो खुद दूसरे का सहारा चाहिए, यें किसके दुश्मन के मैदान लड़ेंगे या मोर्चे लेंगे| मुज़फ्फरनगर की ढाळ, 'ला के बण में आग दमालो की ढाळ दूर जा खड़े होंगे|' और मुड़ के संभालेंगे भी नहीं कि किन राह्यां तुम जिए और किन हलातां तुम्हारे घर वाले| खाम्खा थारी इसी-तिसी करनी है इन्होनें और वो भी न्याम-श्याम (फ्री-फोकट में)।
सोमनाथ का मंदिर लूटा तब इनसे कुछ हुआ हो तो आज होगा| यें सिर्फ दो काम कर सकें हैं, एक तो थारे को भिड़ा देंगे, दूसरा थारे को बीच-मैदान अकेला छोड़ भाग खड़े होंगे|

समझ जाओ और दुश्मन पिछाण के संभल जाओ| और फिर भी ना रहा जाता तो कम से कम फ्री में तो जूती ना तुड़वाओ, वरना थारे से तो वो रामू भी स्याणा कहलावेगा जो इनको पद्वाने हेतु भी सर्विस चार्ज करता है|

जय यौद्धेय! - फूल मलिक

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