इस कहावत में 'जट्ट' शब्द ही क्यों है, जानने हेतु अंत तक पढ़ें!
हरयाणी भाषा में 'मेख' व् पंजाबी भाषा में 'वैसाखी' की आप सभी को लख-लख बधाईयाँ!
जलियांवाला बाग़ शहीदी दिवस भी आज ही है - प्रणाम शहीदां नूं!
खालसा पंथ स्थापना दिवस आज भी ही है, अंतर्राष्ट्रीय जाट दिवस भी आज ही है - बधाई हो दोनों की!
थम मात्र किसान नहीं सो, उदारवादी जमींदार सो; और इसी से सम्बोधन दिया करो अपने लिए - खासकर अगर पूर्वोत्तर व् पश्चिम-दक्षिण के सामंती-जमींदार से अपने-आपको अलग दिखाना है तो! और यह अलग दिखाना इसलिए जरूरी नहीं है कि इसमें कोई अहम्-बहम-भरम-घमंड का प्रदर्शन करना है, अपितु इसलिए ताकि खुद को सामंतियों की नस्लीय-हेय व् वर्णीय उच्च-नीचता से पृथक रख के, अपने सीरियों-साझियों को संदेश दे सको कि हमने आपके साथ जो बरतेवा किया वह भाईचारे का किया, बंधुवा का नहीं! और यह दिखाना इसलिए भी जरूरी है ताकि सर छोटूराम की भाषा वाला फंडी आपको 'जोहड़-लेट में सन के आई म्हास की तरह अपने में ना लबेड के दिखा पाए'| यहीं से ऐसा करके ही वह आप पर पोलिटिकल माइलेज लेने की कोशिश करता है; इसको यहीं रोक दो तो 35 बनाम 1 से 90% बचाव तो इतने भर से हो जाए! कहो कि होंगी कमियां उदारवादी जमींदारी में भी परन्तु सामंतियों से दिन-रात के अंतर् जितने बेहतर रहे हैं आप अपने सीरी-साझियों से बरतेवे को ले के!
और यही वजह है कि इस शीर्षक की कहावत में 'जट्ट' शब्द है; क्योंकि आपके मिसललैंड व् खापलैंड से बाहर जाते ही उदारवादी जमींदारा नहीं है; व् क्योंकि आपके पुरखे इस कांसेप्ट के संस्थापक-पोषक रहे; इससे उनकी 'आर्गेनिक-मार्केटिंग' हुई व् उससे उनकी यह आर्गेनिक ब्रांड बनी व् वह ऐसी कहावतों में ऑर्गेनिक्ली स्वीकृत हुए! आर्गेनिक यानि स्वत: गुण से सर्व द्वारा स्वीकार्य; कृत्रिम यानि manipulated नहीं कि जिसको खड़ा करने को propagandas लगें!
जय यौधेय! - फूल मलिक
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