Saturday, 20 June 2026

आज राम-मंदिर में चोरी के मसले पर एक बात याद आई:-

होता जो "खाप-खेड़े-खेतों-खाड़ों के दर्शनशास्त्र वाला उतना ही जागरूक समाज कि जितना 1870-1875 में था, तो उसको कन्विंस करने को कोई महर्षि दयानंद लाए जाते व् मूर्ती-पूजा को व्यर्थ बताते हुए लिख के लाते कि, "जब राम, अपने चंदे की ही रक्षा नहीं कर सकता तो मेरी क्या रक्षा करेगा?"


दादा नगर खेड़ों/बैयों/भूमियों से मूर्ती-पूजा नहीं करने के कांसेप्ट को बिना उसको क्रेडिट दिए, उसको कॉपी कर, उसका आधार बना के आर्य-समाज की स्थापना करते हुए, 'सत्यार्थ-प्रकाश' में यही तो लिख के लाए थे कि, 'वह व् उनके पिता शिवजी की पूजा कर रहे थे; उनकी मूर्ती के आगे से चूहा प्रसाद खा गया तो उनको ज्ञान हुआ कि, "जब यह मूर्ती खुद अपने प्रसाद की रक्षा नहीं कर सकती, तो मेरी क्या क्या करेगी"? बिना क्रेडिट दिए कॉपी करने की बात इसलिए कि 'आर्य-समाज' का कांसेप्ट जहाँ के वह थे, वहां तो फैला नहीं यानि गुजरात में; यह इस खापलैंड पर ही क्यों अंगीकार हुआ; क्योंकि मूर्ती-पूजा नहीं करने की मति दादा नगर खेड़ों के जरिए यहाँ पहले से ही मौजूद थी|


अब समझने की बात यह देखें कि इसमें "आर्य" शब्द जो जोड़ा वह तो ईरान का है; तो यही ईरान से आए हुए किसको माना जाता है जिनमें आर्य-समाज इतना ज्यादा फैला? क्यों सत्यार्थ-प्रकाश के ग्यारहवें सम्मुलास में "जाट जी" बोल-बोल के, "खाप-खेड़ा-खेत-खाड़ा दर्शनशास्त्र" के सबसे बड़े समूह की इतनी स्तुति की गई व् बाकियों की क्यों नहीं की गई? क्योंकि 1761 में जब पेशवा-लोग पानीपत हारे, तो इनको आभास हुआ कि तुमको जाट को सताने का श्राप लगा जो तुम्हारी पानीपत में हार हुई| Read Maharaja Surajmal and Peshwa meetin in Gawalior for coming together to fight Panipat - read how this episode went. तो उस श्राप से मुक्ति पाने हेतु आर्य-समाज लाने से पहले, जाट को, शिवजी का रूप बता, 1761 से 1870 तक शिवाले बना-बना जाट को उसका रूप बता उसकी स्थापना के प्रयास जब सिरे नहीं चढ़े तो फिर आर्य-समाज आता है|


खैर, आज फिर से "शिवजी का प्रसाद" चूहे द्वारा खाने किस्म की ही घटना हुई है, परन्तु इस बार चूहे के जगह असली इंसान हैं व् शिवजी की जगह राम| मतलब मूर्तिपूजा की व्यर्थता वही है जो 1875 में 'आर्य-समाज' के जरिए बताई गई व् आर्य-समाज से भी पहले मूर्ती व् मर्द-पुजारी रहित 100% औरत की धोक-ज्योत लीडरशिप वाले दादा नगर खेड़ों/बैयों/भूमियों के जरिए आपके-हमारे पुरखे सदियों से स्थापित कर, प्रैक्टिस करते आए|


सिर्फ यही क्यों, नाथ व् साध परम्परा, रामपाल कांसेप्ट, रामरहीम कांसेप्ट, राधा-स्वामी कांसेप्ट, निराकार-कांसेप्ट, दिनौद कांसेप्ट - सभी तो मूर्ती-पूजा रहित कांसेप्ट हैं? तो क्यों नहीं यह मूर्ती-पूजा नहीं मानने-करने वाले आपस में सरजोड़ के व् तालमेल करके चल रहे?


यह आपसी तालमेल व् सरजोड़ कर लेवें तो यह अधिकतर बदलाव अपनी naturality में वापिस आ जाएंगे व् भटकन मिट जाएंगी! इसको ले कर प्रयास कीजिए, अगर हर प्रकार की राजनीति पर वही प्रभाव व् पकड़ चाहिए तो जो खाप-खेड़ा-खेत-खाड़ा के दर्शनशास्त्र के पुरखों की रही व् रहती आई!


जय यौधेय! - फूल मलिक

Friday, 19 June 2026

फिरोज़ शाह तुगलक और खाप पंचायत!

फिरोज़ शाह तुगलक और खाप पंचायत 

1352 ईशवी की घटना है जब दिल्ली के बादशाह फिरोजशाह तुगलक ने धार्मिक प्रतिबंध और जजिया जैसे कर आम जनता पर लगा दिए थे, साथ ही साथ बादशाह के बिगड़ैल सैनिकों और अधिकारियों ने चारों तरफ लूट मचा रखी थी। हरयाणा में सर्वखाप पंचायत का एलान हुआ। याद रखियेगा के हरयाणा में दिल्ली ग्रामीण, आज का पश्चिम उत्तरप्रदेश भी शामिल था। सर्वखाप पंचायत ने हरेक बिरादरी से ज्ञानी योद्धा चुने, जातिगत संख्या के अनुरूप। 
इसमें ब्राह्मण (25), जाट (66), अहीर (15), गुज्जर (15), राजपूत (15), वैश्य बनिया (10), चमार (5), धानक (4), बढई (8), लुहार (6), सैनी (5), जुलाहे (5), तेली (5), कुम्हार (4), खटीक बाल्मीकि (4), रोड (4), रवे (3), धोबी (3), नाई (2), जोगी (2), गोसाई (2), कलाल (2) 
कुल 210 वीरों को तैयार किया जुल्मी सत्ता से बात करने के लिए। सही समय पर वो लोग तुगलक के दरबार पहुंचे। पंचायत रिकॉर्ड के अनुसार 150 और आदमी तैयार करके भेजे ताकि दिल्ली की एक एक खबर पंचायत तक पहुंचे।
बादशाह की तरफ से आदेश हुआ के सिर्फ 5 आदमी ही बादशाह से बात करेंगे। किसी भी योद्धा को तलवार, भाला या अन्य हथ्यार ले कर जाने की अनुमति नहीं थी । खैर 5 वीर जाने को तैयार हुए। 
हरभजन जाट, सदाराम बाह्मण, रुड़ामल बनिया, अंतराम गुज्जर और बाबरा बाल्मीकि। 
बाकि 205 वीर बाहर जयकारे लगाने लगे। 

हरभजन जाट ने बादशाह से कहा... जजिया हटाया जाए, मंदिर और धार्मिक कामों में कर और दखलंदाजी बन्द हो। 

बादशाह के काज़ी मुइउदुदीन ने कहा ... इस्लाम कबूल करलो, तुम्हारी बातें मान ली जाएंगी। 

हरभजन जाट ने अपने साथियों की तरफ देखा और काजी को कहा... धर्म का सम्बंध आत्मा से है। हरेक को अपने धर्म अपने पंथ को मानने की आज़ादी है। यही हमारे पूर्वजों और खाप पंचायतों का न्याय है। इसमें कोई ज़बरदस्ती नहीं हो सकती।।

काजी ने कहा ... क्या तुम अपने धर्म के लिए अपने प्राण दे सकते हो?

हरभजन के साथ साथ पांचों साथियों ने कहा... बिल्कुल दे सकते हैं। 

बादशाह के काज़ी ने बादशाह के आदेश पर महल के बाहर एक बहुत बड़े खड्डे में आग लगवाई और कहा के... प्रमाण दो तुम सब के तुम्हे धर्म और आज़ादी प्राणों से प्यारे हैं।।

पांचों योद्धा एक एक करके अग्नि में कूद गए। उसके बाद काज़ी ने बाकियों से पूछा के ... क्या तुम लोग भी सबूत दोगे या इस्लाम कबूल करोगे?

वहीं मुसलमान फकीर बालूशाह ने काज़ी को रोकने का प्रयास किया और काजी को कहा के ये खुदा की तौहीन है। हर इंसान को अपने ईमान पर रहने का हक़ है। लेकिन काजी के साथ तकरीबन तकरीबन सारे मुल्ला मौलवियों ने इस काम को शरीयत अनुसार जायज़ ठहराया। बाकि 205 योद्धा भी अग्नि में कूद गए। 


Source: सर्वखाप पंचायत रिकॉर्ड, श्री जगदेव शास्त्री जी का लेख, बलिदान विशेष अंक, पेज 151-152

(कितने किस्सों को हमसे छिपाया गया, क्यों नहीं ये इतिहास पढ़ाया गया)

Sunday, 7 June 2026

जाटों में लड़की और बहु में फर्क होता था!

यह सच है कि शरणार्थियों ने ही आकर हमें रहना सिखाया है। आज हरियाणा के जाटों में लड़कियां इंस्टाग्राम पर कुल्ले मटकाती हैं और बाप पैसे चुग रहा है । बाप को इंस्टाग्राम की तरफ से आया कोई मोमेंटो टाइप दिखा रही हैं कि देखो मैंने नाच नाच कर बगड़ फोड़ दिया , इंस्टा ने मुझे फर्स्ट क्लास टैक्सी घोषित कर दिया है और बाप प्राउड फील कर रहा है । किसने सिखाया यह जाटों को ? क्या यह जाटों का सामाजिक व्यवहार था ? किस जाति में बेटी की उम्र की लड़की की बॉडी को कॉम्प्लीमेंट दिये जाते हैं ? यह इतना खुलापन जाटों में कौन लेकर आया ? कोई बोहर गाम का पैसे वाला नांदल है , कोई डीघल का अहलावत है , कोई हिसार का दुहन है , लड़कियां मुंह मारती घूम रही हैं और इंस्टा पर खुलेआम प्राउड फील कर रहे हैं उनपर । बड़ी बात है कि कौम के बड़े चिंतक और लिखाड़ उनका विरोध नहीं कर रहे क्योंकि सरकारी आदेश है कि जबतक जाटों के आखिरी घर में मलाइका अरोड़ा पैदा न हो जाए, यह सिलसिला चलते रहना चाहिए । अगर विरोध किया तो नेता नहीं बनने दिए जाओगे ।

जाटों में लड़की और बहु में फर्क होता था, दूर से देखने पर ही पता लग जाता था कि गाम की छोरी है या गाम की बहु है । लेकिन आज जाटों की लड़कियां अपने ही गांव में खुद को एक चीज की तरह पेश करने वाली ड्रेस पहनती हैं। बहुएं थोड़ा बहुत लाली सुर्खी लगा लिया करतीं , अब लड़कियों ने हद कर रखी है । पंद्रह साल की होते ही इनमें जाट की जाटनी बनने की इच्छा किस कौम ने पैदा की ? खुले बाल किस कौम में लड़कियां रखतीं थी ? शरणार्थियों में तो रखतीं थीं , अब जाटों वालियों में होड़ लगी है , किसने सिखाया इन्हें ? 

सबसे बड़ी बात हरियाणा के जाट अरोड़ा खत्रियों का मजाक बना रहे हैं कि ये मामा बुआ की लड़की से शादी करते हैं , यह हमारा कल्चर नहीं । अरे भाई तुमने तो अपने घर की लड़कियों तक को नहीं छोड़ा। सगी बहन के साथ जिम में तंग कपड़ों के साथ व्लोग बना रहे हो , यह किसने सिखाया तुम्हें ? 


यह सच है शरणार्थियों  ने तुम्हें अपना रहना सहना  सिखा दिया जबकि  मेजॉरिटी होते हुए तुम उन्हें अपना रहन सहन और तौर तरीके नहीं सिखा पाए ।


इससे साबित होता है बेहद हल्के और बड़बोले लोग हो तुम । और यह जो भाईचारा भाईचारा शब्द बोल रहे हो , भाईचारा भी उन्हीं शरणार्थियों  ने निभाया है कि सरकार उनके साथ थी फिर भी तुम्हारी तसल्ली बख्श गुल्लक नहीं तोड़ी और इस बिकाऊ और सेंटर की गुलाम लीडरशिप की गुलामी से बाहर नहीं आए तो क्या पता ये लोग भाईचारा भी तोड़ दें ।


Ashish Rana