जब कबीलाई किसानो ने गाँव आबाद किये अपने पूरखो के आशीर्वाद स्वरूप एक दादा खेडा बनाया मिट्टी और ईटो से
फिर उन्हे जरूरत हुई कुए से पानी निकालने की और कुए खोदने की तो वो अपने गांवो मे ओढ लेकर आये जो तालाब बनाते थे बावडी बनाते थे और चिणाई का काम किया करते थे ।
फिर इन्हे जरूरत हुई मिट्टी के बर्तनो की फिर ये उन्हे गाँव मे लेकर आये जिन्हे मिट्टी से बर्तन बनाने आते थे तो कुम्हारो को गाँवो मे बसाया।
फिर इन्हे जरूरत हुई खेत मे काम करने के लिए हल कस्सी जेली गंडासे हथोडी की तो ये उन्हे ले आये जिन्हे लोहे का काम आता था तो ऐसे इनके गाँव मे लोहार आबाद हो गये ।
फिर इन्हे जरूरत पडी खेतो मे मजदूरो के रूप मे काम करने की सीजन के समय क्योकि उस समय काम ज्यादा था माणस कम थे तो ये मेहनती कौम कश्यपो को गाँव मे लेकर आये
फेर इन्हे बुग्गी खाट खटोले दरबाजे खिडकी की जरूरत हुई तो ये बाडीयो को ले आये
फिर बिमारी के कारण इनके पशु मर रहे थे तो इन्हे पता नही था की इन पशुओ को कैसे ठिकाने लगाये तो ये उन्हे गाँव मे लेकर आये जिन्हे चमडे से जूते चप्पल बनाने आते थे जिन्हे चमडे की अच्छी जानकारी थी । जो चमडे का व्यापार करते थे ।
इस समय भी पुरी दुनिया मे सबसे महंगे ब्रेन्ड जेसै डेयोर के बैग भी चमडे से बनते है ये काम छोटा नही था मगर पंडो ने इस काम को शुद्रो की श्रेणी मे रखा तो इन्हे शुद्र कहा जाने लगा और ये भी गाँवो मे आबाद हो गये ।
फिर जैसे जैसे अनाज के बदले समान लेने के स्थान पर सोने के सिक्के चले तो ये अपने गांवो मे सुनारो को ले आये जिन्हे सोने की नालेज थी । जिससे ये समान खरीद व बेच सकते थे ।
इसी तरह से नाथ सम्प्रदाय का प्रचार अपने जोरो पर था 14-18 वी शताब्दी तक तो गाँवो मे एक दो परिवार जोगी बन गये भक्तिकाल मे ।
ऐसे ही जिन्हे बाल काटने दाढी बनाने की नालेज थी उन्हे भी गाँव मे बसाना जरूरी था तो उन्हे भी गाँवो मे लाकर आबाद किया गया
ऊपर जितने भी नाम लिखे है किसान कबीलाई लोग इन्हे साल मे हर फसल के बाद अनाज देते थे ताकी इनका भी गुजारा हो सके इनके बच्चे पेट भरके सौ सके ।
2005 तक भी हरियाणवी देहात मे ऐसा ही कल्चर चलता रहा
ये हरियाणे की सरंचना थी हर जाति का इतिहास कुछ ऐसा ही है ।
अब आता हूँ मुद्दे की बातो पर । आज ये लोग किसान कबीलाई कौम के खेतो के काम पर निर्भर नही है । क्योकि जमाना पिछले 20-30 साल मे हद से ज्यादा बदल चुका है । अब लोगो को अनाज की इतनी जरूरत नही रही । क्योकि लोगो ने नौकरी करना शुरू कर दिया । लोग पढ लिख गये । अब लोगो को ऐसा फील होता है मै किसी के नीचे क्यो काम करू ।
ठीक जमीदारो के बच्चो का भी यही हाल है मै खेती क्यो करू
तो हरियाणवी देहात मे कबीलाई किसान व अन्य वर्ग खेती से दूर हो चुके है । अब दोनो के पास आगे बढने का बराबर मौका है ।
जो सालो से आपके नीचे काम करते रहे हो और वो कल को आपसे आगे निकल जाए तो किसी को भी अच्छा नही लगता ठीक ऐसे ही हरियाणा मे बडे बडे किसान कबीलाई लोगो को
इनका आगे बढना अच्छा नही लगता।
ऊपर से सोशल मीडिया आ चुकी है । जिनके मुठीभर पूरखे सदियो से शोषण करते थे महिला वर्ग का अब उन्ही शोषण करने वालो की लडकिया इन्सटाग्राम पर मूजरे करके दिखा रही है ।
ये खाई कैसे भरेगी उनको तुम्हारी जरूरत नही
तुम्हे उनकी जरूरत नही है । तभी शहरो मे पलायन हो रहे है ।
क्योकि गाँवो मे गाँव जेसा कुछ बचा ही नही है ।
जिस काम के लिए गाम आबाद हुए थे वो काम अब बिहारी सस्ते रेटो पर करने आते है । तो ये पुरा स्ट्रक्चर ढहने वाला है ।
जो जरूरत के पिलरो पर टीका हुआ था ।
जरूरत खत्म तो भाईचारा खत्म ।
न्यू वर्ल्ड ओर्डर ऐसे ही थोडी आया है 19 वी शताब्दी मे बहुत सोच समझकर इसे डिजाईन किया गया था । लोगो को शहरो मे बडे बडे कबूतरखाने रूपी फ्लेटो मे कैद किया जाएगा
देखते जाओ अगले 15-20 सालो मे ज्यादातर गाँव के लोग शहरो मे आबाद हो चुके होगे । ये जाति के नाम पर लडाई झगडे हद से ज्यादा बढने वाले है क्योकि लोगो के पास बराबर का हक नही है ।
बडे बडे किसान कबीलाई जातियो को आप जितना मर्जी गाली दो उल्टा बोलो उनकी जाति को आपको कुछ नही होगा
मगर वो आपको बोलेगे तो आपके पास उन्हे भीतर करने का कानून है । ये समानता नही है । ये उस खाई को बढावा देता है जो इंसानियत को रोन्द देती है ।
हरियाणा मे हर किसान जाति को उल्टे शब्दो से बोला जाता है हर जाति के उल्टे नाम निकाल रखे है मगर संविधान मे इनके पास हक नही है कोई इन्हे कुछ भी बोले ये चाहकर भी कुछ नी कर सकते
इसी वजह से ये लोग संविधान का सम्मान नही करते इसी वजह से ये लोग संविधान से खुश नही है।
देश मे बराबरी हो सबका सम्मान हो उसका एक ही तरीका से स्कूल कालेजो से जाति व्यवस्था को हटाना जाति के नाम पर स्पेशल फील कराना। अगर 100 बच्चो मे 20 को VIP फील दी जाएगी तो 80 खुद ही उनके खिलाफ रहेगे। ये समानता कभी नही आयेगी । जब वो बच्चे बडे होगे तो उनके दिमाग मे जातिवाद कभी खत्म नही होगा ।
जाति व धर्म के नाम पर एक दूसरे को कोसना बंद करो मिलकर रहो जैसे पहले रहते थे ।
Amit Rod
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