हरियाणा की पहली विदेशी बहू महारानी ओलिव
साल 1900 की साल थी। नाभा रेलवे स्टेशन पर स्कर्ट में एक विदेशी लडकी अपनी मां के साथ चहलकदमी कर रही थी और देखने वाले हर आंख उस पर टिक जाती थी। उस दौर में स्कर्ट पहने विदेश लडकी का यूं घुमना कम हैरानी वाला नहीं था और ऊपर से वो बला की खूबसूरती वाली विदेशी लडकी जो ठहरी।
उस लडकी का नाम था ओलिव और रेलवे स्टेशन पर वह अपनी मां मिसेज हॉर्डिंग और भाई ह्यूगेन मोनलिस्कय के साथ घूम रही थी। वो एक सर्कस कंपनी में काम करती थी जो देश दर देश अपना खेल दिखाते चले आ रहे थे।
उसी समय स्टेशन पर एक गाडी पहुंची और उसी गाडी में जींद स्पेशल के डिब्बे भी जुडे हुए थे। जींद स्पेशल मसूरी से आ रही थी और उसमें बैठे थे जींद के राजा रणबीर सिंह जो अपनी विशेष गाडी में राजधानी संगरूर लौट रहे थे।
राजा की नजर ओलिव पर पडी तो उन्होंने अपने कर्मचारियों को उनकी मौजूदगी के बारे में जानकारी लेने को कहा। सर्कस की जानकारी मिलने पर राजा ने सर्कस को संगरूर आकर अपने करतब दिखाने का मौका दिया।
जल्द ही सर्कस पार्टी संगरूर पहुंची और सर्कस ने एक अनोखा करतब दिखाया जो उस समय किसी ने ना देखा था और ना सुना था। आजकल को हॉट एयर बैलून सबने देखे हैं लेकिन 1900 में ऐसे करतब भला किसने देखे होंगे। गुब्बारा आसान में उठा और उसमें खडी ओलिव को हाथ हिलाते देख न केवल पूरे संगरूर की जनता बल्कि राजा रणबीर सिंह का मन भी हवा भी उड चला।
पांच छह मील दूर जंगल में वह गुब्बारा गिरा तो महाराजा के घुडसवारों ने जमीन पर गिरने से पहले ही ओलिव को थाम लिया। राजा ने बहुत सारे इनाम दिए और इसके साथ ही ओलिव की मां को एक पेशकश भी कर दी कि उस लडकी का विवाह उनसे कर दिया जाए। एक इकरारनामा लिखा गया और वो ओलिव के पास ही रखा गया।
शादी की रस्म अदा की जा रही थी जब मुख्यमंत्री मिर्जा उमराव बेग और सरदार शमशेर सिंह जैसे अधिकारियों ने इससे दूर रहना ही उचित समझा। रात को सिक्ख रीति रिवाजों से विवाह संपन्न हुआ और रानी का नाम रखा गया ओलिव जसवंत कौर। शादी तोपों ने दुनिया को बता दिया कि राजा रणवीर सिंह ने शादी कर ली है।
ओलिव की मां और भाई ने सर्कस की नौकरी छोड दी ओर राजमहल की ऐशोआराम की जिंदगी जीना शुरू कर दी। ओलिव के भाई को राजा ने अपना निजी सचिव बना लिया। ओलिव से 5 सितंबर 1901 को एक बेटा भी हुआ था जो छह महीने का होकर चल बसा। एक फरवरी 1904 को रानी ओलिव ने एक पुत्री को जन्म दिया और उसका नाम रखा गया डौरोथी। इसी के नाम पर दादरी में एक राजकीय इमारत का नाम डौरोथी विला रखा गया जो आजकल शायद गेस्ट हाउस है दादरी में।
राजा ओलिव को दिलोजान से चाहते थे और इस दौरान अंग्रेस सरकार ने 1918 में युद्ध में राजा के योगदान को देखते हुए उनको राजेंद्र बहादुर का खिताब दिया दो तोप निजी और दो तोप पुश्तैनी में बढोतरी की गई। राजा रणबीर सिंह अब महाराजा बन चुके थे ओर औलिव महारानी।
हर दरबार के षडयंत्र महाराजा जींद के दरबार में भी चल रहे थे लेकिन किसी ने महाराजा को यह खबर पहुंचा दी कि महाराजा से विवाह होने से पहले ओलिव एक बार गर्भवती हुई थी और एक नाजायज बच्चे को भी जन्म दिया था। ये खबर जांच पडताल में सच निकली तो महाराजा का दिल टूट गया। वो इसको अपने अंदर पी गए लेकिन खिन्न रहने लगे और महारानी से जी उचाट हो गया।
इसी बीच उनकी मुलाकात कुमाऊं की एक पंद्रह साल की बाला से करवाई गई जो बहुत बुद्धिमान और व्यवहारकुशल थी। पांच फरवरी 1917 को महाराजा रणबीर सिंह ने उससे विवाह कर लिया और उसे नाम दिया गुरचरण कौर। शादी की रस्म रात को दादरी में नवाब बहादुरजंग खां के किले के दीवानखाने में हुई। उस समय महारानी ओलिव अपनी पुत्री डौरोथी के संग डौरोथी विले के ड्राइंगरू में बैठी थी और अपने बेटी को बता रही थी आज एक नई महारानी आ रही है। इसी के साथ दोनों के दिलों में दूरियां भी बठती रही।
1921 की गर्मियों में महाराजा दोनों महारानियों व बच्चों के साथ विदेश में छुट्टियां मनाने गए। छोटी महारानी तब तब दो राजकुमारियों और एक राजकुमार को जन्म दे चुकी थी। कुछ अंग्रेज महाराजा से मिलने आए तो उन्होंने ओलिव से दूसरी महारानी के बारे में पूछा तो ओलिव ने कहा कि वह महाराजा की रखैल है। बस ये लडाई इतनी बढी कि महाराजा और महारानी को हमेशा के लिए विदा होना पडा।
ओलिव इंग्लैंड में ही रही उसके खर्च (प्रिवी पर्स) का हिस्से उसे इंग्लैंड के एक बैंक में हर महीने मिलता रहा। जब तक वह जीवित रही वह उसे निकलवाती रही और बहुत आराम की जिंदगी 1954 में आखिरी सांस तक उसने जी।
डारौथी को महाराज अपने साथ भारत ले आए थे। समय आने पर उसका विवाह कर दिया लेकिन डारौथी ने जो गुल खिलाए उनका जिक्र करेंगे राजा रणबीर सिंह की रूह को भी अशांति प्राप्त होगी।
खैर ये थी महाराजा रणबीर सिंह और महारानी ओलिव की प्रेम और अलगाव की कहानी। चूंकि जींद रियासत की बहू थी महारानी ओलिव तो उनको पहली विदेशी बहू का दर्जा भी दिया जा सकता है, आजकल एक सीरियल भी चल रहा है विदेशी बहू।
अप्रैल 1997 के हरियाणा संवाद में यह लेख राव विजय प्रकाश सिंह ने प्रकाशि करवाया था
Dharmendra Kanwari!
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