होता जो "खाप-खेड़े-खेतों-खाड़ों के दर्शनशास्त्र वाला उतना ही जागरूक समाज कि जितना 1870-1875 में था, तो उसको कन्विंस करने को कोई महर्षि दयानंद लाए जाते व् मूर्ती-पूजा को व्यर्थ बताते हुए लिख के लाते कि, "जब राम, अपने चंदे की ही रक्षा नहीं कर सकता तो मेरी क्या रक्षा करेगा?"
दादा नगर खेड़ों/बैयों/भूमियों से मूर्ती-पूजा नहीं करने के कांसेप्ट को बिना उसको क्रेडिट दिए, उसको कॉपी कर, उसका आधार बना के आर्य-समाज की स्थापना करते हुए, 'सत्यार्थ-प्रकाश' में यही तो लिख के लाए थे कि, 'वह व् उनके पिता शिवजी की पूजा कर रहे थे; उनकी मूर्ती के आगे से चूहा प्रसाद खा गया तो उनको ज्ञान हुआ कि, "जब यह मूर्ती खुद अपने प्रसाद की रक्षा नहीं कर सकती, तो मेरी क्या क्या करेगी"? बिना क्रेडिट दिए कॉपी करने की बात इसलिए कि 'आर्य-समाज' का कांसेप्ट जहाँ के वह थे, वहां तो फैला नहीं यानि गुजरात में; यह इस खापलैंड पर ही क्यों अंगीकार हुआ; क्योंकि मूर्ती-पूजा नहीं करने की मति दादा नगर खेड़ों के जरिए यहाँ पहले से ही मौजूद थी|
अब समझने की बात यह देखें कि इसमें "आर्य" शब्द जो जोड़ा वह तो ईरान का है; तो यही ईरान से आए हुए किसको माना जाता है जिनमें आर्य-समाज इतना ज्यादा फैला? क्यों सत्यार्थ-प्रकाश के ग्यारहवें सम्मुलास में "जाट जी" बोल-बोल के, "खाप-खेड़ा-खेत-खाड़ा दर्शनशास्त्र" के सबसे बड़े समूह की इतनी स्तुति की गई व् बाकियों की क्यों नहीं की गई? क्योंकि 1761 में जब पेशवा-लोग पानीपत हारे, तो इनको आभास हुआ कि तुमको जाट को सताने का श्राप लगा जो तुम्हारी पानीपत में हार हुई| Read Maharaja Surajmal and Peshwa meetin in Gawalior for coming together to fight Panipat - read how this episode went. तो उस श्राप से मुक्ति पाने हेतु आर्य-समाज लाने से पहले, जाट को, शिवजी का रूप बता, 1761 से 1870 तक शिवाले बना-बना जाट को उसका रूप बता उसकी स्थापना के प्रयास जब सिरे नहीं चढ़े तो फिर आर्य-समाज आता है|
खैर, आज फिर से "शिवजी का प्रसाद" चूहे द्वारा खाने किस्म की ही घटना हुई है, परन्तु इस बार चूहे के जगह असली इंसान हैं व् शिवजी की जगह राम| मतलब मूर्तिपूजा की व्यर्थता वही है जो 1875 में 'आर्य-समाज' के जरिए बताई गई व् आर्य-समाज से भी पहले मूर्ती व् मर्द-पुजारी रहित 100% औरत की धोक-ज्योत लीडरशिप वाले दादा नगर खेड़ों/बैयों/भूमियों के जरिए आपके-हमारे पुरखे सदियों से स्थापित कर, प्रैक्टिस करते आए|
सिर्फ यही क्यों, नाथ व् साध परम्परा, रामपाल कांसेप्ट, रामरहीम कांसेप्ट, राधा-स्वामी कांसेप्ट, निराकार-कांसेप्ट, दिनौद कांसेप्ट - सभी तो मूर्ती-पूजा रहित कांसेप्ट हैं? तो क्यों नहीं यह मूर्ती-पूजा नहीं मानने-करने वाले आपस में सरजोड़ के व् तालमेल करके चल रहे?
यह आपसी तालमेल व् सरजोड़ कर लेवें तो यह अधिकतर बदलाव अपनी naturality में वापिस आ जाएंगे व् भटकन मिट जाएंगी! इसको ले कर प्रयास कीजिए, अगर हर प्रकार की राजनीति पर वही प्रभाव व् पकड़ चाहिए तो जो खाप-खेड़ा-खेत-खाड़ा के दर्शनशास्त्र के पुरखों की रही व् रहती आई!
जय यौधेय! - फूल मलिक
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