Wednesday, 22 July 2026

साँगवान खाप का युद्ध जींद राजा के साथ (हरियाणा )

(सन् 1863–64) हरियाणा

'तारीखे-फूलनाम रियासत जीन्द में लिखा हुआ है कि सन् 1857 के बाद अंग्रेजों ने दादरी का इलाका राजा जीन्द को, सन् 1857 के विद्रोह में ब्रिटिश सरकार की सेवा के बदले में, पुरस्कार के रूप में दे दिया। उस समय सांगवान खाप का सरदार हीरासिंह जी थे। उसने चरखी में उस फैसले को मानने से इनकार कर दिया। राजा जीन्द ने सन् 1863–64 में वास्तविक अधिकार करने के लिए चरखी पर चढ़ाई कर दी थी। सांगवान, श्योराण और फौगाट किसानों की खापों ने सरदार हीरासिंह को अपना नायक चुना लिया था। उसने राजा के विरुद्ध लड़ाई लड़ी। वह लड़ता हुआ चरखी के खेतों शहीद हो गया था । उसके स्थान पर लड़ाई की कमान झोजू कलां के ही चौधरी चन्द्रभान को दी गई बाद में । युद्ध के दूसरे अवसर पर बौंद के पंवार राजपूतों का सतगांवां भी किसानों के साथ आ गया मिल गया ,
👉👉 परन्तु बींद खुर्द के ठाकुर नौरंगसिंह ने दुश्मन पक्ष का साथ दिया। उस युद्ध में राजा जीन्द हारकर भाग लिया। किसानों ने उसका बौंद तक पीछा किया।
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फिर जीन्द और पटियाला राज्यों की मिली जुली सेना ने दोबारा आक्रमण किया। दिल्ली से ब्रिटिश आफिसर टोनकिन तोपें लेकर आए। दूसरी बार लड़ाई झोजू कलां में हुई। टोनकिन ने गांव पर तोपों से गोले मारे। आज भी दो चौपाल गोलाबारी से क्षतिग्रस्त पड़ी हैं। इलाके को तबाह कर दिया। लोगों में भगदड़ मच गई। लोग जान बचाने के लिए और पहाड़ी मोर्चे लेने के लिए मानकवास की पहाड़ियों में जा छुपे। चौ० चन्द्रभान बीकानेर भाग गया।
चौ. अनन्तराम फौगाट मौडी के विख्यात आदमी थे। उसके बीकानेर राज-घराने से अच्छे सम्बन्ध थे। चौ० अनन्तराम ने सन् 1857 के विद्रोह में अंग्रेजों को पनाह दी थी। चौ० अनन्तराम के कहने पर राजा बीकानेर ने बीच में आकर चौ० चन्द्रभान और राजा जीन्द में सन्धि करा दी। जीन्द में उस समय रघबीर सिंह राजा था। ग्राम पूठी (सीमान) जिला हिसार के स्थान पर सन्धि हुई। चौ० चन्द्रभान ने जीन्द राज्य की अधीनता स्वीकार करली। राजा ने चौ० चन्द्रभान को सरोपा पेश किया। उसको 250 रुपया सालाना का वजीफा और एक ग्राम रामबास भी जागीर में दे दिया।
सरदार हीरासिंह की सम्पत्ति को सन् 1863 में जब्त बहक सरकार कर लिया गया। उसकी हवेली पर आज भी सरकारी मोहर लगी हुई है। ताला लगा हुआ है। हीरासिंह की औलाद ग्राम चौधराण में बसी हुई है। झोजू के चौ० वेगराज ने राजा जीन्द से पगड़ी बदल दोस्ती कर ली। वे फिर जीन्द दरबार में ही रहे।
ठाकुर नौरंगसिंह बौंद खुर्द निवासी अंग्रेज मेटकाफ साहब के मित्र थे। टाकुर साहब ने पहले समय में ऊंटों पर बिठाकर सुरक्षित भिवानी और हिसार पहुंचाया था। उस सेवा के बदले में और चरखी, बौंद की लड़ाई में अंग्रेजों की सहायता करने के कारण मेटकाफ साहब ने ठाकुर नौरंगसिंह को एक सिफारशी सनद दी और उसे छुछकवास (झज्जर) के बीड़ में 4000 बीघे और खातीवास (झज्जर) में 500 बीघे जमीन पुरस्कार में दे दी। वहां राजपूतों का बराणी गांव बसा हुआ है।
धर्मेंद्र कंवारी जी की वॉल से सह धन्यवाद