Wednesday, 26 August 2026

सुल्तान-उल-कौम नवाब जस्सा सिंह अहलूवालिया और महाराजा जवाहर सिंह भरतपुर

 

सुल्तान-उल-कौम नवाब जस्सा सिंह अहलूवालिया और महाराजा जवाहर सिंह भरतपुर
🛡️क्या आप जानते हैं कि 18वीं सदी में जब विदेशी आक्रांताओं और दिल्ली सल्तनत ने जुल्म की हदें पार कर दी थीं, तब सिख (जाट) और हिन्दू(जाट) वीरों ने आपसी एकता की एक ऐसी बेमिसाल इबारत लिखी थी जिसने इतिहास का रुख बदल दिया?
यह कहानी है सिखों के महान सेनापति नवाब जस्सा सिंह अहलूवालिया और भरतपुर के प्रतापी महाराजा जवाहर सिंह जाट के अटूट गठबंधन की!⚔️ जब न्याय के लिए एक साथ उठीं तलवारें (1764-1765)
⚔️महाराजा सूरजमल जी की धोखे से हुई शहादत के बाद, उनके वीर पुत्र महाराजा जवाहर सिंह ने दिल्ली के नजीबुद्दौला (मीर बख्शी) से बदला लेने की प्रतिज्ञा की।
इस धर्मयुद्ध में उन्हें एक ऐसी ताकत की जरूरत थी जो मुगलों और उनके मददगार मराठाओं अफगानों के छक्के छुड़ा सके।
उन्होंने दल खालसा के सिपहसालार नवाब जस्सा सिंह अहलूवालिया से साथ मांगा ।
🤝 जट्ट-जाट एकता का शंखनाद:
नवाब जस्सा सिंह अहलूवालिया ने बिना किसी हिचकिचाहट के महाराजा जवाहर सिंह के प्रस्ताव को स्वीकार किया। और क़ौम की एकता का परिचय दिया
दल खालसा के हजारों जाट योद्धा भरतपुर की जाट सेना के साथ कंधे से कंधा मिलाकर दिल्ली फतह के लिए कूच कर गए।
इस संयुक्त गठबंधन ने मुगलों की राजधानी दिल्ली को घेर लिया और लाल किले के मुहाने पर नजीबुद्दौला की सेना को धूल चटा दी।
🔥 लाल किले पर फतह और ऐतिहासिक लोहा:
इस संयुक्त संघर्ष का परिणाम इतना भीषण था कि नजीबुद्दौला और मराठाओं को पीछे हटना पड़ा। महाराजा जवाहर सिंह ने दिल्ली के लाल किले से अष्टधातु के ऐतिहासिक किवाड़ (दरवाजे) उखाड़कर भरतपुर के किले (लोहागढ़) पर लगाए, जो आज भी इस ऐतिहासिक जीत और जट्ट-जाट पराक्रम का प्रतीक हैं।
✨ इस इतिहास से हमें क्या सीख मिलती है?यह केवल दो सेनाओं का मिलन नहीं था, बल्कि यह जाट' भाईचारे, सांझी संस्कृति और दमन के खिलाफ एकजुट होने की अटूट मिसाल थी। इतिहास गवाह है कि जब-जब ये दोनों ताकतें एक साथ आई हैं, तब-तब बड़ी से बड़ी हुकूमतों को घुटने टेकने पड़े हैं।
आइए, अपने इस गौरवशाली इतिहास और पुरखों की एकता को याद रखें और समाज में आपसी भाईचारे को और मजबूत करें!
इसका वर्तमान का जीता जागता उदाहरण है दिल्ली का किसान आंदोलन
अतेंद्र फौजदार 🙏



Thursday, 20 August 2026

जब दादा सर छोटूराम जी ने स्पेशल अमेंडमेंट करके 38 साल के लम्बे इंतज़ार व् टसल के बाद दिलवाया, "गौड़-ब्राह्मण, चौहान, कुरैशी व् जांगड़ा (जिसके तहत पांचाल, सैनी व् विश्वकर्मा सब-ग्रुप्स भी आते हैं) को 'Statutory/Notified Agriculturists Tribes' का स्टेटस:

बात सन 1900 की है, अंग्रेज Punjab Alienation of Land Act (1900) बना रहे थे, इसके तहत तब के यूनाइटेड पंजाब की 'Agriculturists Tribes' चिन्हित की जा रही थी; इसके तहत दस जातियां चिन्हित की गई, जो थी - जाट, जट्ट, राजपूत, गुज्जर, अहीर, माली, पठान, सैयद, बिलोच व् मुग़ल! परन्तु अंग्रेजों ने गौड़-ब्राह्मण, चौहान, कुरैशी व् जांगड़ा को इस लिस्ट में नहीं जोड़ा|


फिर जब यूनियनिस्ट पार्टी की सरकार आती है व् दादा सर छोटूराम जी 'रेवेन्यू-मिनिस्टर' बनते हैं तो इस एक्ट में दो Amendments लाते हैं Punjab Alienation of Land (Amendment) Act of 1938 और Punjab Alienation of Land (Second Amendment) Act of 1938/1939 व् गौड़-ब्राह्मण, चौहान, कुरैशी व् जांगड़ा (जिसके तहत पांचाल, सैनी व् विश्वकर्मा सब-ग्रुप्स भी आते हैं) को भी इसमें जोड़ देते हैं| 


इस एक्ट की ख़ास बात यह थी कि इसके तहत आने वाली जातियों की जमीन इस ग्रुप से बाहर कोई खरीद-बेच नहीं सकता था!


इसी से संबंधित सलंगित है एक लिटरेरी रिफरेन्स! इस रिफरेन्स के आधार पर गूगल-जैमिनी से पूछा तो उसने और विस्तृत डिटेल्स निकाल के दे दी!


जय यौधेय!




Monday, 17 August 2026

ये विभाजन की विभीषिका लाने वाले गद्दार थे कौन ?

क्या ये सही हिस्ट्री हैं

ये विभाजन की विभीषिका लाने वाले गद्दार थे कौन?
एक बार फिर इतिहास खंगाला जाएं।
भारत विभाजन का पहला वक्तव्य हिंदू महासभा के 19वें अधिवेशन में सावरकर ने 1937 में दिया ! भारत विभाजन का पहला अधिकारिक प्रस्ताव श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने सिंध संसद में जिन्नाह के साथ पास किया । द्विराष्ट्र सिद्धान्त देने वाला सावरकर ही था । जब देश आजादी की अंतिम लड़ाई लड़ रहा था तब सावरकर और जिन्नाह बंगाल, सिंध, और NWFP {आज का बलोचिस्तान} में गठबंधन सरकारे चला रहे थे ।
सावरकर ने 1942 में हिन्दूमहासभा के 24वें अधिवेशन में क्रान्तिकारियों को जेल डालने और ब्रिटिश को सहयोग करने की अपील की , जिन्ना पहले देश विभाजन के खिलाफ था, बाद में सावरकर ने उसे हिन्दू और मुस्लिम राष्ट्र के फायदे समझा कर गुमराह किया, सावरकर ने ही जिन्ना को मुस्लिम लीग में जाने को उकसाया ।
सावरकर ने आजाद हिंद फौज के खिलाफ ब्रिटिश के साथ मिल कर मिलिट्री कैम्प लगाये, सुभाष चन्द्र बोस और गांधी की हत्या का कुचक्र रचा । हिन्दूवादियों ने मिल कर हजारों आजाद हिन्द फौजियों की हत्या करवाई ।
2 जुलाई 1942 को श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने लार्ड हर्बर्ट को चीट्ठी लिख कर कांग्रेस नेताओं और भारत छोड़ो आन्दोलन को कुचलने की अपील की ।
गोलवलकर ने भी ब्रिटिश के समर्थन की घोषणा की थी, आरएसएस के अधिवेशन में बोला कि ब्रिटिश ही हमारे भाग्यविधाता है ।
आडवानी ने खुद बताया था कि आरएसएस के निर्देश पर आजादी के आन्दोलन में कभी में हिस्सा नही लिया, हां अलवर के दंगों में आडवाणी ने खूब नाम कमाया ।
अटल बिहारी ने क्रांतिकारी लीलाधर वाजपेयी के खिलाफ मुखबीरी कर उन्हें 3 साल की जेल करवाई, अटल बिहारी विभाजनकारी शक्तियों को नमन करने मीनार ए पाकिस्तान गया , अटल जिन्नाह की मजार पर सर झुकाने वाला पहला संघी है ।
देश आजाद होने के तीसरे साल ही संघ ने एक और साजिश रची । आर्मी चीफ जनरल करिअप्पा को कत्ल करने की साजिश, संघ ने पहले उत्तर भारत और दक्षिण भारत का ध्रुवीकरण किया फिर करिअप्पा की हत्या की कोशिश की । इस मामले में 6 लोगों को सजा हुई थी ।
गांधी जी की हत्या करने के बाद आरएसएस ने लड्डू बांटे, आरएसएस पर बैन लगा ।
भारत की आजादी के दिन आरएसएस के मुखपत्र द ऑर्गेनाइजर ने अपने संपादकीय में भारत के तिरंगे झंडे का विरोध किया, और घोषणा की थी कि हिंदू इस झंडे को न कभी अपनाएंगे, न कभी इसका सम्मान करेंगे ।
आजादी के दिन जब देश तिरंगा फहरा रहा था तो संघी तिरंगा जला रहे थे , पैरों से कुचल रहे थे ।
स्वतंत्रता के 75 वें साल में डरपोक संघी ने सडकों पर गढ्ढे खुदवाऐ , सडकों पर कीलें बिछाईं , देश की राजधानी को बंधक बनाया
एैसे में दंगाइयों का #विभाजन_दिवस मनाना तो बनता है क्यों कि उनके डीएनए, में विभाजन ही था ,विभाजन ही है ,और विभाजन ही रहेगा विभाजन को बिसात बनाकर राजनीति करना इनकी पैतृक गुणवत्ता में शामिल है इसमें नया कुछ नहीं है ।

By: Satish Singh Tomar









Wednesday, 12 August 2026

खूंटी पर टंगे खंडवे और डोगे

 खूंटी पर टंगे खंडवे और डोगे

पंडित जवाहर लाल नेहरू से झज्जर विधानसभा की सीट मांगकर लाए थे पंडित भगवत दयाल शर्मा जी। पंडित नेहरू ने कहा था कि पंडित जी वहां से प्रोफेसर शेर सिंह चुनाव लडते हैं, वहां तो मैं भी चुनाव लडूं तो हार जाऊंगा। पंडित जी ने कहा कि टिकट तो यहीं की चाहिए और पंडित भगवत दयाल शर्मा जी प्रोफेसर शेर सिंह कादियान के सामने चुनाव में आ डटे।

प्रोफेशर शेर सिंह अलग मिजाज के नेता थे लेकिन पंडित जी के मिजाज देखकर बात कर लेने के उस्ताद थे। मुकाबला कांटें का तब्दील होता गया और धीरे धीरे जातीय रंग लेने लगा। इस पर पंडित जी ने अंतिम चोट मारी और कहा मैं चौधरियों के खंडवे डोगे खूंटी पर टंगवा दूंगा और प्रोफेशर शेर सिंह चुनाव हार गए।

चुनाव के बाद समर्थकों में मार काट की स्थिति बनीं तो प्रोफेशर शेर सिंह बडी सी मुस्कान चेहरे पर लेकर मतगणना स्थल से बाहर निकले और कहा कि हम जीत गए। समर्थकों ने कंधे पर उठा लिया और वहां से चले गए और इस तरीके से जाति की कडवाहट पर समझदारी की जीत हो गई।

आजकल भाजपा की प्रदेश अध्यक्ष डॉ अर्चना गुप्ता जी राजनीति के तवे पर 1967 वाली रोटी सेंकना चाहती हैं लेकिन वो ये बात भूल जाती हैं वो मुकाबला दो राजनीतिज्ञ लोगों में था। दोनों चुनाव के बाद गले मिले और बात खत्म। जीवन भर वो लोगों के बीच में रहे और कभी अपने सम्मान समारोह आयोजित नहीं करवाए। सम्मान दोनों को ही मिला लेकिन लोगों ने अपने दिल से किया। लोगों को बोलकर कंधों पर लोई नहीं डलवाते थे पहले नेता।

वक्त की बात है जब पंडित जी बुजुर्ग हुए तो दिल्ली में रहने लगे। एक दिन उनका बेटा पडोस के करियाणा स्टोर पर कुछ सामान लेने गया तो विवाद हो गया और उन्होंने पंडित जी के बेटे की पिटाई कर दी। स्वतंत्रतता सेनानी पंडित भगवत दयाल शर्मा जी भी वहां पहुंचे तो उनको भी धक्के मारे गए। पुलिस तो मुकदमा तक दर्ज नहीं कर रही थी लेकिन भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने जब ये मामला लोकसभा में उठाया तब जाकर पंडित जी ओर उनके बेटे को इंसाफ मिला। एक हरियाणा ये भी है।

हरियाणा में जाति एक कडवी सच्चाई है लेकिन फिर भी लोग अपने बाप को बाप ही कहते हैं मां का लोग नहीं। राजनीति में भी एक शिष्टाचार होता है, अपने से ज्यादा समाज की सोचनी होती है। जहर की बीज की फसल का कडवापन वो लोग भी लेते हैं जिनका उस फल से कोई सरोकार नहीं होता है।

हरियाणवी समाज को भी अब अब जात पात से आगे बढकर ये सोचना चाहिए कि हम अपने परिवार का उत्थान कैसे करें? कैसे हरियाणा आगे बढे? कैसे भ्रष्टाचार खत्म हो? कैसे अच्छे नेता चुनाव जीतें?

क्या आपने देश के किसी भी मंत्री के बेटे को कांवड लाते देखा है?

खैर भगवान उनको सद्बुद्धि दे - By Dharmendra Kanwari

Wednesday, 5 August 2026

करनाल 1764 से पहले ना शहर था ना कोई बस्ती

 करनाल 1764 से पहले ना शहर था ना कोई बस्ती। करनाल क्षेत्र पानीपत जिले का हिस्सा था और तहसील घरोंडा थी।

करनाल शहर पहली बार महाराजा जींद श्री गजपत सिह ने 1764 मे बसाया गया। उससे पहले करनाल के मिट्टी के टीले के उत्तर पश्चिम भाग मे वजीरपुर नाम की एक सराय और छोटी बस्ती थी जिसे अब दयालपुरा कहा जाता है और इस टीले के बाकि हिस्से पर कही-कही अव्यवस्थित कच्ची बस्तीया थी

By: Virender Lather