Saturday, 5 September 2026

1919 से 1945: किसान राजनीति से भाखड़ा तक—चौधरी छोटूराम का सफर

1919 के चेम्सफोर्ड सुधारों के बाद भारत में संवैधानिक राजनीति का नया दौर शुरू हुआ और 1920 में पंजाब में पहला विधान परिषद चुनाव हुआ। इसके बाद ग्रामीण पंजाब के कृषक हितों को राजनीतिक शक्ति देने की प्रक्रिया तेज हुई।

1923 में यूनियनिस्ट पार्टी का उभार हुआ। मियां फ़ज़ल-ए-हुसैन और चौधरी छोटूराम इसके प्रमुख संस्थापक नेताओं में थे। 1923 के चुनाव में यूनियनिस्टों ने 71 में से 33 सीटें जीतीं। चौ० छोटूराम भी निर्वाचित हुए और 1924 में पंजाब सरकार में Agriculture Minister बने और कुछ महीनों बाद Education Department का भी दायित्व उनके पास आया। 1925 में फ़ज़ल-ए-हुसैन के वायसराय की कार्यकारिणी में जाने के बाद चौ० छोटूराम को पंजाब के Education Department का पोर्टफोलियो दिया गया था; वे लगभग दो वर्षों तक Agriculture, Industries और Education से जुड़े रहे। 1926 में यूनियनिस्ट पार्टी के MLC राव पोहप सिंह ने शिक्षा मंत्री चौ० छोटूराम को रेवाड़ी में ब्रेन अहीर स्कूल के जलसे में मुख्यातिथि आमंत्रित किया था। जहां चौ० छोटूराम ने इस स्कूल की कमेटी द्वारा स्कूल को अपग्रेड करने का प्रस्ताव स्वीकार किया।
चौ० छोटूराम की राजनीति का केंद्र केवल सत्ता नहीं, बल्कि किसान, खेती, सिंचाई और ग्रामीण अर्थव्यवस्था थी। वे समझते थे कि पंजाब के सूखे इलाकों की असली समस्या पानी है।
इसी सोच का बड़ा उदाहरण भाखड़ा परियोजना थी। भाखड़ा की योजना उनसे पहले के वर्षों में सरकारी स्तर पर विकसित हो चुकी थी, लेकिन चौ० छोटूराम ने इसे आगे बढ़ाने में निर्णायक राजनीतिक भूमिका निभाई। नवंबर 1944 में पंजाब सरकार और बिलासपुर के राजा के बीच समझौते की प्रक्रिया आगे बढ़ी और 8 जनवरी 1945 को चौ० छोटूराम ने पंजाब सरकार की ओर से भाखड़ा परियोजना की स्वीकृति संबंधी फाइल पर हस्ताक्षर किए। यह उनके जीवन का अंतिम हस्ताक्षर था—अगले ही दिन, 9 जनवरी 1945 को उनका निधन हो गया।
इसके बाद भारत शासन अधिनियम 1935 के तहत 1937 में प्रांतीय चुनाव हुए। पंजाब में 5 अप्रैल 1937 को सर सिकंदर हयात खान की यूनियनिस्ट सरकार बनी। चौधरी छोटूराम को विकास मंत्री बनाया गया और फिर 1941 में राजस्व विभाग की जिम्मेदारी मिली—किसान हित में उनके ऐतिहासिक सुधारों का यही निर्णायक दौर था। इस दौर में चौधरी छोटूराम द्वारा बनाए गए कानून –
किसानों को कर्ज और साहूकारी के जाल से निकालने के लिए 1934 का ऋण मुक्ति कानून, 1936 का Debtors’ Protection Act, 1938 में साहूकार पंजीकरण और गिरवी जमीन वापसी कानून तथा 1939 का कृषि मंडी कानून—इनका लक्ष्य किसान की जमीन, मेहनत और उपज की रक्षा करना था। पंजाब के इतिहास में इन्हें चौधरी छोटूराम के ‘गोल्डन लॉ’ के नाम से भी जाना जाता है।
इसलिए चौ० छोटूराम को केवल एक राजनेता के रूप में देखना अधूरा है। किसान की जमीन से लेकर पानी की समस्या तक—उनकी राजनीति का केंद्र ग्रामीण पंजाब था। भाखड़ा उनकी इसी दूरदृष्टि की सबसे बड़ी विरासतों में से एक है।

By: Rakesh Sangwan



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