सुल्तान-उल-कौम नवाब जस्सा सिंह अहलूवालिया और महाराजा जवाहर सिंह भरतपुर
यह कहानी है सिखों के महान सेनापति नवाब जस्सा सिंह अहलूवालिया और भरतपुर के प्रतापी महाराजा जवाहर सिंह जाट के अटूट गठबंधन की!
जब न्याय के लिए एक साथ उठीं तलवारें (1764-1765)
इस धर्मयुद्ध में उन्हें एक ऐसी ताकत की जरूरत थी जो मुगलों और उनके मददगार मराठाओं अफगानों के छक्के छुड़ा सके।
उन्होंने दल खालसा के सिपहसालार नवाब जस्सा सिंह अहलूवालिया से साथ मांगा ।
नवाब जस्सा सिंह अहलूवालिया ने बिना किसी हिचकिचाहट के महाराजा जवाहर सिंह के प्रस्ताव को स्वीकार किया। और क़ौम की एकता का परिचय दिया
दल खालसा के हजारों जाट योद्धा भरतपुर की जाट सेना के साथ कंधे से कंधा मिलाकर दिल्ली फतह के लिए कूच कर गए।
इस संयुक्त गठबंधन ने मुगलों की राजधानी दिल्ली को घेर लिया और लाल किले के मुहाने पर नजीबुद्दौला की सेना को धूल चटा दी।
इस संयुक्त संघर्ष का परिणाम इतना भीषण था कि नजीबुद्दौला और मराठाओं को पीछे हटना पड़ा। महाराजा जवाहर सिंह ने दिल्ली के लाल किले से अष्टधातु के ऐतिहासिक किवाड़ (दरवाजे) उखाड़कर भरतपुर के किले (लोहागढ़) पर लगाए, जो आज भी इस ऐतिहासिक जीत और जट्ट-जाट पराक्रम का प्रतीक हैं।
आइए, अपने इस गौरवशाली इतिहास और पुरखों की एकता को याद रखें और समाज में आपसी भाईचारे को और मजबूत करें!
इसका वर्तमान का जीता जागता उदाहरण है दिल्ली का किसान आंदोलन
अतेंद्र फौजदार
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