भूरा (या भूरा सिंह) और निगाहिया (निघांईया/निंगाहिया) को जींद के राजा स्वरूप सिंह ने 1856 के अंत में फांसी दी थी। ये दोनों लजवाना कलां (अब हरियाणा के जींद जिले के जुलाना क्षेत्र में) गांव के दलाल गोत्र के जाट नंबरदार थे।
घटना की पृष्ठभूमि
गांव में 13 नंबरदार थे। भूरा और तुलसीराम (निघांईया के बड़े भाई) मुख्य नंबरदार थे, लेकिन दोनों कुटुंबों में वैमनस्य था। कारण था—तुलसीराम ने भूरा की चाची से दूसरा विवाह कर लिया था (जाट रिवाज के अनुसार), जो भूरा को पसंद नहीं था।
एक दिन लगान भरने के बाद वापसी पर तुलसीराम ने अपनी नई पत्नी की तारीफ की, जिससे भूरा नाराज हो गया। भूरा के कुटुंबियों ने तुलसीराम की हत्या कर दी। बदले में निघांईया के लोगों ने भूरा के उन नौजवानों को मार दिया जो हत्या में शामिल थे। दोनों पक्षों में खून का बदला खून से लेने का सिलसिला चल पड़ा। दोनों ने राजा के पास शिकायत नहीं की, क्योंकि जाट परंपरा में अदालत जाना हार माना जाता था।
तहसीलदार की हत्या और विद्रोह
उन्हीं दिनों राजा स्वरूप सिंह जमीन की चकबंदी करवा रहे थे। एक रौबीला वैश्य तहसीलदार (कंडेला गांव में) लगान वसूली के लिए सख्ती कर रहा था। किसी किसान ने ताना मारा कि “दम है तो लजवाना जाकर दिखाओ, जहां की धरती कटखानी है।” तहसीलदार इसे अपमान समझकर लजवाना पहुंचा, चौपाल में नंबरदारों को धमकाया और साफे उतरवाने का हुक्म दिया।
भूरा और निघांईया (जो एक-दूसरे के दुश्मन थे) ने जाकर आपसी दुश्मनी भुला दी और तहसीलदार के खिलाफ एकजुट हो गए। चौपाल में निघांईया ने तहसीलदार को ललकारा। तहसीलदार एक घर में छिप गया। वहां बालम कालिया की बेटी भोली ने बल्लम से तहसीलदार और उसके साथ आए 16 पुलिसकर्मियों को मार डाला। तभी से कहावत चल पड़ी—“सेर बाजरा झोली में 16 मारे भोली ने।”
छह महीने का युद्ध
राजा को खबर मिली तो उन्होंने गांव को तोड़ने का आदेश दिया। भूरा-निघांईया ने स्त्री-बच्चों को सुरक्षित भेजकर मोर्चेबंदी की, खाई खोदी, तोपची तैनात किए और इलाके की मदद मांगी। राजा की फौज से छह महीने तक छापामार युद्ध चला। राजा ने नाभा और पटियाला रियासतों से मदद मांगी, लेकिन सफलता नहीं मिली। अंत में ब्रिटिश रेजिडेंट/फौज की मदद ली गई। ब्रिटिश दबाव और तोपों की मार से गांव धराशायी हो गया।
फांसी का कारण
भूरा और निघांईया पकड़े गए। राजा उन्हें माफ करना चाहते थे (क्योंकि राजा ने खापों से भूरा और निघांईया के साथ अच्छे आचरण का वादा किया था), लेकिन ब्रिटिश रेजिडेंट अफसर के दबाव के कारण दोनों को 1856 के अंत में कालवा (जींद रियासत का गांव) में फांसी पर लटका दिया गया। गांव वालों को गांव छोड़ने का आदेश मिला। लोग चारों ओर फैल गए और सात छोटे गांव बसाए, जो आज भी “सात लजवाने” के नाम से जाने जाते हैं (जैसे चुडाली, मेहरड़ा आदि)।
यह घटना हरियाणा के जाट इतिहास में वीरता और बलिदान की मिसाल मानी जाती है। पटियाला में भी लोकगीत बने—“लजवाने, तेरा नाश जाइयो, तैने बड़े पूत खपाए।” खूनी चौपाल आज भी गांव में मौजूद है।
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