क्या ये सही हिस्ट्री हैं
ये विभाजन की विभीषिका लाने वाले गद्दार थे कौन?
एक बार फिर इतिहास खंगाला जाएं।
भारत विभाजन का पहला वक्तव्य हिंदू महासभा के 19वें अधिवेशन में सावरकर ने 1937 में दिया ! भारत विभाजन का पहला अधिकारिक प्रस्ताव श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने सिंध संसद में जिन्नाह के साथ पास किया । द्विराष्ट्र सिद्धान्त देने वाला सावरकर ही था । जब देश आजादी की अंतिम लड़ाई लड़ रहा था तब सावरकर और जिन्नाह बंगाल, सिंध, और NWFP {आज का बलोचिस्तान} में गठबंधन सरकारे चला रहे थे ।
सावरकर ने 1942 में हिन्दूमहासभा के 24वें अधिवेशन में क्रान्तिकारियों को जेल डालने और ब्रिटिश को सहयोग करने की अपील की , जिन्ना पहले देश विभाजन के खिलाफ था, बाद में सावरकर ने उसे हिन्दू और मुस्लिम राष्ट्र के फायदे समझा कर गुमराह किया, सावरकर ने ही जिन्ना को मुस्लिम लीग में जाने को उकसाया ।
सावरकर ने आजाद हिंद फौज के खिलाफ ब्रिटिश के साथ मिल कर मिलिट्री कैम्प लगाये, सुभाष चन्द्र बोस और गांधी की हत्या का कुचक्र रचा । हिन्दूवादियों ने मिल कर हजारों आजाद हिन्द फौजियों की हत्या करवाई ।
2 जुलाई 1942 को श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने लार्ड हर्बर्ट को चीट्ठी लिख कर कांग्रेस नेताओं और भारत छोड़ो आन्दोलन को कुचलने की अपील की ।
गोलवलकर ने भी ब्रिटिश के समर्थन की घोषणा की थी, आरएसएस के अधिवेशन में बोला कि ब्रिटिश ही हमारे भाग्यविधाता है ।
आडवानी ने खुद बताया था कि आरएसएस के निर्देश पर आजादी के आन्दोलन में कभी में हिस्सा नही लिया, हां अलवर के दंगों में आडवाणी ने खूब नाम कमाया ।
अटल बिहारी ने क्रांतिकारी लीलाधर वाजपेयी के खिलाफ मुखबीरी कर उन्हें 3 साल की जेल करवाई, अटल बिहारी विभाजनकारी शक्तियों को नमन करने मीनार ए पाकिस्तान गया , अटल जिन्नाह की मजार पर सर झुकाने वाला पहला संघी है ।
देश आजाद होने के तीसरे साल ही संघ ने एक और साजिश रची । आर्मी चीफ जनरल करिअप्पा को कत्ल करने की साजिश, संघ ने पहले उत्तर भारत और दक्षिण भारत का ध्रुवीकरण किया फिर करिअप्पा की हत्या की कोशिश की । इस मामले में 6 लोगों को सजा हुई थी ।
गांधी जी की हत्या करने के बाद आरएसएस ने लड्डू बांटे, आरएसएस पर बैन लगा ।
भारत की आजादी के दिन आरएसएस के मुखपत्र द ऑर्गेनाइजर ने अपने संपादकीय में भारत के तिरंगे झंडे का विरोध किया, और घोषणा की थी कि हिंदू इस झंडे को न कभी अपनाएंगे, न कभी इसका सम्मान करेंगे ।
आजादी के दिन जब देश तिरंगा फहरा रहा था तो संघी तिरंगा जला रहे थे , पैरों से कुचल रहे थे ।
स्वतंत्रता के 75 वें साल में डरपोक संघी ने सडकों पर गढ्ढे खुदवाऐ , सडकों पर कीलें बिछाईं , देश की राजधानी को बंधक बनाया
एैसे में दंगाइयों का #विभाजन_दिवस मनाना तो बनता है क्यों कि उनके डीएनए, में विभाजन ही था ,विभाजन ही है ,और विभाजन ही रहेगा विभाजन को बिसात बनाकर राजनीति करना इनकी पैतृक गुणवत्ता में शामिल है इसमें नया कुछ नहीं है ।
By: Satish Singh Tomar





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